जनवरी 1956…
बौंसी, बांका, बिहार का छोटा-सा कस्बा।
सुबह की धूप जैसे अक्सर पुरानी लकड़ी के टीन के दरवाज़ों से छनकर आती थी, वैसे ही एक नौ वर्ष का छोटा-सा बच्चा–रत्नेश, अपनी नींद से जागता था। चेहरे पर चिर-परिचित भोली-सी मुस्कान, आँखों में स्थायी चमक और मन में दुनिया को देखने की अबोध प्यास।
रत्नेश केवल छठी कक्षा में था, पर जीवन ने उससे बड़े-बड़ों जैसा धैर्य पहले ही मांग लिया था।
सिर्फ छह वर्ष की उम्र में, उसके माता-पिता—कौशल्या देवी और सत्यनारायण जी—एक सड़क हादसे में दुनिया छोड़ गए थे।
उस दिन से वह अपने संरक्षक, अपने सहारे, अपने दूसरे पिता समान बिरबल के साथ रह रहा था।
बिरबल साधारण आदमी था, पर दिल का राजा। उसने रत्नेश के आँसुओं को अपने कंधे पर सोखकर उसे विपत्तियों से लड़ना सिखाया था।
लेकिन रत्नेश के भीतर एक आग थी।
एक सपना था।
एक इच्छा थी—बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर से मिलना।
उसे नहीं पता था कि बाबा साहेब कितने बड़े नेता हैं।
उसे यह भी नहीं पता था कि वे संविधान निर्माता हैं।
उसे बस इतना पता था कि—
“जो आदमी जाति से ऊपर उठकर सभी मनुष्यों को इंसान समझता है, वह जरूर भगवान जैसा होता होगा।”
और रत्नेश उस भगवान जैसे इंसान से मिलना चाहता था।
4 दिसंबर 1956 — एक यात्रा शुरू होती है
उस दिन भोर ही भोर, बिरबल ने देखा कि रत्नेश अपने छोटे-से टीन के ट्रंक को बंद कर रहा है।
कपड़े साफ़-सुथरे रखे थे, बिस्कुट का एक पैकेट था और हाथ में था—
एक नीली जिल्द वाली नोटबुक, जिसमें रत्नेश ने बाबा साहेब के लिए अपने सवाल लिखे थे।
“बाबा साहेब, लोग एक दूसरे से नफ़रत क्यों करते हैं?”
“हम सब बराबर कब होंगे?”
“मैं बड़ा होकर क्या बनूँ ताकि आपको गर्व हो?”
बिरबल ने पूछा,
“कहाँ चल दिए बाबू?”
रत्नेश बोला,
“दिल्ली! बाबा साहेब से मिलने! भागलपुर से ट्रेन मिलेगी।”
बिरबल का दिल काँप गया।
पर उसने रोका नहीं—
क्योंकि कई यात्राएँ बच्चे के कदमों से नहीं, उसके दिल के साहस से शुरू होती हैं।
इसलिए उसने अपना पुराना ऊनी गमछा रत्नेश के कंधे पर डाल दिया और बोला …
“जा बेटा… भगवान तेरे साथ रहे।”
उन्होंने रत्नेश और अपने लिए भागलपुर स्टेशन से नई दिल्ली तक का टिकट बुक किया।
और शाम तक—
रत्नेश और बीरबल दिल्ली जाने वाली ट्रेन में बैठ गए थे।
उसे नहीं पता था कि आगे क्या होगा।
उसे बस अपनी मासूम चाहत पता थी–
“मैं बाबा साहेब को देख लूँगा… बस एक बार।”
5 दिसंबर 1956 — यात्रा का दूसरा दिन..
ट्रेन की धक-धक, इमरजेंसी चेन की हल्की गूँज, डिब्बे में चाय वालों की आवाज़ें…
रत्नेश खिड़की से बाहर देखते-देखते सोचता रहा–
“बाबा साहेब से मिलूँगा तो क्या कहूँगा?”
“मुझे उनसे आशीर्वाद मिलेगा?”
वह नोटबुक बार-बार खोलता और अपनी लिखी पंक्तियाँ पढ़ता।
उसकी आँखों में उत्साह था।
उसके सपनों में उम्मीद थी।
6 दिसंबर 1956 — वह दिन जो इतिहास बना..
दिल्ली की ठंडी हवा से रत्नेश जैसे काँप गया था।
वह तुर्कमान गेट की ओर जाने वाली भीड़ का हिस्सा था।
हर कोई उसी ओर भाग रहा था।
रत्नेश ने एक आदमी से पूछा—
“अम्बर…अम्बे…अम…”
वह अपने उच्चारण से जूझ रहा था।
आदमी ने उसकी ओर देखकर कहा–
“बेटा, बाबा साहेब… अब नहीं रहे।”
वह वाक्य जैसे रत्नेश के भीतर कहीं गहरे उतर गया।
एक बच्चे के सपने का संसार जैसे बिखर गया।
वह समझ नहीं पाया–
“नहीं रहे” का मतलब क्या होता है।
भीड़ रो रही थी।
पुरुष, महिलाएँ, बुजुर्ग, छात्र—सबकी आँखें नम थीं।
रत्नेश उस भीड़ में धक्का खाते हुए आगे बढ़ा।
जब उसने देखा–
एक शांत चेहरा,
जिस पर संघर्ष की लकीरें थीं,
जिस पर करुणा की भाषा थी,
जिस पर भारत के भविष्य की छाप थी।
वह वही चेहरा था–
महामानव डॉ. भीमराव अम्बेडकर।
रत्नेश उस शवयात्रा के किनारे खड़ा हो गया।
उसकी नोटबुक हाथ से गिर गई।
आँखों से आँसू खुद-ब-खुद बह निकले।
वह सोच रहा था—
“मैंने तो मिलने आया था…
और ये क्या हो गया?”
पर फिर…
अचानक उसे एक वाक्य याद आया—
“ये जीवन है!!…”
“ये जीवन है!!…” — रत्नेश की जागृति..
उस शाम, वह जिस पार्क में बैठा था, वहाँ पतझड़ के पत्ते उड़ रहे थे।
दूर से किसी कथावाचक की आवाज़ आ रही थी—
“बाबा साहेब का जीवन त्याग है, संघर्ष है, समता का संग्राम है।”
और तभी जैसे किसी ने रत्नेश के मन में दीपक जला दिया।
उसे लगा…
बाबा साहेब से मिलना तो उसकी चाह थी,
पर बाबा साहेब के सपने को आगे बढ़ाना उसकी जिम्मेदारी है।
उसने अपनी नोटबुक उठाई,
उसका पहला प्रश्न फटा पन्ना बन चुका था,
पर उसने नया पन्ना खोला और लिखा—
“मैं बड़ा होकर एक ऐसा इंसान बनूँगा,
जो किसी को छोटा नहीं समझेगा।
मैं जाति और भेदभाव के अंधेरों से लड़ूँगा।
मैं बाबा साहेब का अधूरा काम आगे बढ़ाऊँगा।”
और वही क्षण–
एक नौ वर्ष के बच्चे की जन्म-जागृति का क्षण बन गया।
समय बदला, पर रत्नेश का व्रत नहीं …
रत्नेश बड़ा हुआ।
शिक्षित हुआ।
संगठित हुआ।
समाज सेवा में उतरा।
और अपना जीवन बाबा साहेब की शिक्षाओं के लिए समर्पित कर दिया।
हर 6 दिसंबर को वह दीप जलाकर कहता—
“बाबा साहेब अमर रहें!”
और हर साल नए युवाओं से कहता–
“दुख मत मनाओ।
संकल्प लो।
अगर एक भी जन दूसरे जन को जागृत कर दे,
तो बाबा साहेब का सपना पूरा होने से कोई नहीं रोक सकता।”
उसकी आवाज़ में वही मासूमियत थी,
जो नौ वर्ष के रत्नेश में थी–
पर अब उसमें तपस्या थी,
अनुभव था,
और जीवन का गहरा सत्य था—
*“ये जीवन है!!…”*
बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जीवन केवल इतिहास नहीं–
हमारी आत्मा का दीपक है।
उन्होंने सिखाया–
*शिक्षित बनो,*
*संगठित बनो,*
*संघर्ष करो।*
उन्होंने हमें बराबरी का अधिकार दिया,
न्याय का मार्ग दिखाया,
और मानवता की परिभाषा लिखी।
आज उनके महापरिनिर्वाण दिवस पर—
हम सबको उसी कारवाँ को आगे बढ़ाने का संकल्प लेना चाहिए,
जिसके लिए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन दे दिया।
जय हिन्द!..
*बाबा साहेब अमर रहे!*
*अमर रहे! अमर रहे!..*
✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*








