मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ाँ ग़ालिब उर्दू–फ़ारसी साहित्य के ऐसे शिखर पुरुष हैं, जिनकी शायरी आज भी मनुष्य की पीड़ा, प्रेम और अस्तित्व के प्रश्नों से संवाद करती है। ग़ालिब ने शायरी को केवल प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं बनाया, बल्कि उसमें दर्शन, तर्क और आत्मसंघर्ष को भी स्वर दिया।
उनकी रचनाओं में जीवन की विडंबनाएँ, समय की क्रूरता और इंसान की विवशता अत्यंत सजीव रूप में मिलती हैं। ग़ालिब की भाषा जितनी गूढ़ है, उतनी ही भावप्रवण भी। यही कारण है कि वे सदियों बाद भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
ग़ालिब की जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि साहित्य केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि सोच को नया आयाम देने का माध्यम है।
*सोजानिये : नरेश कुमार अग्रवाल*
*ग़ज़ल*
(ग़ालिब के फ़िक्र-ओ-अंदाज़ से प्रेरित, पर पूर्णतः मौलिक)
दिल की वीरानी को हम शहर बना बैठे हैं,
दर्द को नाम-ए-मोहब्बत सा सुना बैठे हैं।
हमने हर सच को तसव्वुर में बदल डाला,
और ख़्वाबों को हक़ीक़त-सा माना बैठे हैं।
इश्क़ ने पूछ लिया हमसे हमारी हैसियत,
मुस्कुरा कर भी हम आँसू छुपा बैठे हैं।
ज़िंदगी क्या है—बस इक लंबा सवाल,
जिसका हर उत्तर ग़लत सा लिखा बैठे हैं।
राह में ख़ुद को ही मंज़िल समझे फिरते हैं,
हम सफ़र होकर भी साया बने जा बैठे हैं।
सोजानिये : नरेश कुमार अग्रवाल








