Dastak Jo Pahunchey Har Ghar Tak

Share on facebook
Share on twitter
Share on whatsapp
Share on email

*”विरासत !..”*

Share on facebook
Share on twitter
Share on whatsapp
Share on email
ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

*“विरासत !..”*

“प्रातःकाल का धुँधलका अभी पूरी तरह छँटा नहीं था। आकाश में फैली हल्की अरुणिमा के साथ ही बनारस की तंग गलियों में जीवन की हलचल आरंभ हो चुकी थी। गंगा के घाटों से उठती शंख-ध्वनि और मंदिरों की घंटियाँ जैसे किसी अदृश्य राग की आलाप-रेखाएँ खींच रही थीं। उसी वातावरण में, एक पुराने मकान के ऊपरी कक्ष से तानपुरे की गूँजती स्वर-लहरियाँ निकल रही थीं—गंभीर, संयमित और साधना से भरी हुई।
यह स्वर पंडित रूपम शास्त्री के थे।
पंडित रूपम शास्त्री के लिए संगीत केवल कला नहीं था; वह उनका श्वास-प्रश्वास था, उनका धर्म था, उनका समस्त जीवन था। बचपन से ही उनके भीतर स्वर बसते थे। जब अन्य बालक कंचे और गुलेल में रमते, तब रूपम माँ राधे की गोद में बैठकर लोरी के सुर पकड़ लिया करते। पिता सत्यनारायण, स्वयं एक साधारण किंतु संगीत-प्रेमी व्यक्ति थे। उन्होंने ही पहली बार पुत्र की उँगलियों को हारमोनियम की कुंजियों पर रखा था।

समय के साथ रूपम को गुरु पंडित रामेंद्र जी का समीपता मिला। पंडित रामेंद्र जी केवल संगीत-शिक्षक नहीं थे; वे परंपरा के वाहक थे। उनका विश्वास था कि संगीत पहले मनुष्य को विनम्र बनाता है, फिर कलाकार। गुरु-शिष्य की वह परंपरा आश्रम जैसी थी—जहाँ रियाज़ से पहले सेवा, और तानों से पहले मौन का अभ्यास कराया जाता था।

रूपम ने वहाँ वर्षों तक कठोर साधना की। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठना, गंगा-स्नान, गुरु-सेवा, फिर घंटों रियाज़—स्वर-साधना, लय-साधना, और अंत में गुरु का आशीर्वचन। उनकी आवाज़ में धीरे-धीरे वह गहराई उतरने लगी, जो केवल तपस्या से आती है। मित्र मोहन शास्त्री—जो स्वयं भी गायक थे—अक्सर कहते, “रूपम, तुम्हारे स्वर में अब केवल राग नहीं, आत्मा बोलती है।”

यश भी आने लगा। पहले छोटे मंच, फिर बड़े सभागार। श्रोताओं की तालियाँ, समीक्षकों की प्रशंसा, और पत्र-पत्रिकाओं में छपती प्रशस्तियाँ। “युवा युग का स्वर-सम्राट”—यह उपाधि जब किसी ने दी, तो रूपम के भीतर कहीं कुछ बदल गया।

जो संगीत कभी साधना था, वह धीरे-धीरे प्रदर्शन बनने लगा।
रियाज़ अब कम, आयोजकों की बैठकों में समय अधिक जाने लगा। गुरु के चरणों में बैठकर सीखने की जगह, वे मंच के पीछे विशेष कक्षों में विश्राम करने लगे। माँ राधे जब कभी कहतीं, “बेटा, आजकल तुम्हारी आँखों में वही शांति नहीं दिखती,” तो रूपम मुस्कुरा कर बात टाल देते। बहन सरोजा, जो हर कार्यक्रम से पहले उनके लिए दीप जलाती थी, अब उनके पास बैठने को तरसने लगी। पिता सत्यनारायण चुप रहते, पर उनकी आँखों में एक प्रश्न ठहर गया था।

सबसे अधिक दूरी गुरु पंडित रामेंद्र जी से बढ़ी। एक दिन उन्होंने स्नेहपूर्वक कहा,
*“रूपम, स्वर ऊँचे हो रहे हैं, पर झुकना मत भूलो।”*
रूपम ने औपचारिक प्रणाम किया, पर वह वाक्य उनके भीतर नहीं उतरा।

अहंकार धीरे-धीरे उनके स्वरों में भी उतर आया। तानें अब शुद्ध तो थीं, पर उनमें करुणा कम होने लगी। श्रोता प्रभावित तो होते, पर भीतर तक भीगते नहीं।
कहानी में मोड़ तब आया, जब एक राष्ट्रीय संगीत सम्मेलन में रूपम को मंच साझा करने का अवसर मिला दो महान साधकों के साथ—पंडित रवि शंकर जी महाराज और पंडित हरि शंकर जी महाराज। रूपम उनके नाम से परिचित थे, पर उन्हें अपने समकक्ष मानने लगे थे।

मंच से पहले, उन्होंने देखा—दोनों वरिष्ठ कलाकार साधारण वस्त्रों में, स्वयं तानपुरा मिलाते हुए, शिष्यों से हँसते-बोलते। कोई विशेष आग्रह नहीं, कोई अहंकार नहीं। जब वे मंच पर बैठे और राग का विस्तार आरंभ हुआ, तो सभा में एक गहन शांति उतर आई। वह संगीत प्रदर्शन नहीं था—वह प्रार्थना था।

रूपम का मन विचलित हो उठा।
*“इतनी सादगी… और इतना प्रभाव?”*
उनके भीतर पहली बार आत्म-संदेह की हल्की-सी रेखा खिंची।
उसी रात उन्हें समाचार मिला—गुरु पंडित रामेंद्र जी अस्वस्थ हैं। रूपम दौड़े-दौड़े आश्रम पहुँचे। गुरु शय्या पर थे, किंतु आँखों में वही करुणा थी। उन्होंने धीमे स्वर में कहा,
“रूपम, संगीत तुम्हारी जागीर नहीं, तुम्हारी ज़िम्मेदारी है।”
उन शब्दों ने जैसे वर्षों की परतें हटा दीं। रूपम को माँ की लोरी, पिता का मौन, सरोजा का दीप, मोहन का स्नेह—सब एक साथ याद आ गया। उन्हें पहली बार लगा कि उन्होंने केवल लोगों से नहीं, स्वयं से भी दूरी बना ली थी।

गुरु के चरणों में बैठकर उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। यह आँसू पराजय के नहीं थे, बोध के थे।
अगले कई महीनों तक रूपम ने मंच से दूरी बना ली। वे फिर से वही शिष्य बन गए—प्रातःकाल का रियाज़, सेवा, मौन। उन्होंने शिष्यों को निःशुल्क सिखाना आरंभ किया, गाँव-गाँव जाकर संगीत-शिविर लगाए। अब वे समझ चुके थे कि संगीत बाँटने से बढ़ता है।

जब वे पुनः मंच पर लौटे, तो उनका स्वर वही था—पर भाव बदला हुआ। तानों में अब विनम्रता थी, आलाप में करुणा। श्रोता चुपचाप रोते थे, मुस्कुराते थे, जुड़ते थे।
माँ राधे की आँखों में फिर वही शांति लौट आई। पिता सत्यनारायण ने मौन में आशीर्वाद दिया। सरोजा ने फिर दीप जलाया। मोहन ने हँसकर कहा, “अब तुम सच में गायक बने हो।”

रूपम शास्त्री अब जानते थे—
विरासत केवल रागों की नहीं होती,
वह मूल्यों की होती है।
वह गुरु की दृष्टि में,
माँ की प्रार्थना में,
और समाज की साझी चेतना में बसती है।
उन्होंने अपने जीवन से यही सीखा और सिखाया—
कला अकेले नहीं पनपती।
प्रतिभा को विनम्रता की आवश्यकता होती है।
और सच्ची महानता सहयोग, अनुशासन तथा आत्मबोध से जन्म लेती है।
आज भी जब उनका स्वर गूँजता है, तो वह केवल संगीत नहीं होता—
वह संघ से उपजी साधना और परंपरा से मिली विरासत की जीवित पुकार होती है।

*✍️ सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, IOA
सेल, आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*