*“‘भारतीय सेना दिवस’ की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं!..*
*“धुरंधर !.. एक मौत का कुआँ”*
*(संवेदनशील, भावनात्मक और देशभक्ति से भरी पुनर्कथा)*
“1971 के युद्ध को बीते कई वर्ष हो चुके थे। देश आगे बढ़ चुका था, अख़बारों की सुर्ख़ियाँ बदल चुकी थीं, और युद्ध के नायकों के नाम धीरे-धीरे फ़ाइलों में सिमटते जा रहे थे। तभी एक दिन यह समाचार फैलता है—
मेजर अर्जुन सिंह रावत नहीं रहे।
मौत किसी सीमा पर नहीं आई थी, न ही किसी मोर्चे पर।
शांति के दिनों में, एक साधारण मेले में—जहाँ कभी वे बच्चों की तरह हँसा करते थे—वे “मौत के कुएँ” में गिर पड़े।
तालियाँ बजती रहीं…
और एक योद्धा, एक सपना, एक पूरा युद्ध—अँधेरे में समा गया।
दिल्ली में आयोजित उनकी स्मृति सभा में सब कुछ बहुत शालीन था, बहुत औपचारिक।
पर हवा में एक अजीब-सी ठंडक थी।
स्पष्ट था—अर्जुन सिंह रावत सबके प्रिय नहीं थे।
वे न सत्ता के अनुकूल थे, न व्यवस्था के।
वे सवाल पूछते थे, और सवाल सत्ता को कभी अच्छे नहीं लगते।
एक अकेला पर धुरंधर अफ़सर:
1971 से पहले अर्जुन सिंह रावत भारतीय सेना के उन अफ़सरों में गिने जाते थे,
जो वर्दी के भीतर सिर्फ़ आदेश नहीं, अंतरात्मा भी रखते थे।
अत्यंत पढ़े-लिखे, इतिहास और संस्कृति के गहरे जानकार,
और सच बोलने में किसी से न डरने वाले।
रॉ (RAW) के वरिष्ठ अधिकारी आर. के. धर ने उन्हें पूर्वी पाकिस्तान भेजा—
यह समझने के लिए कि वहाँ ज़मीन पर वास्तव में क्या घट रहा है।
वहीं उनकी मुलाक़ात होती है कर्नल सलमान क़ादिर से—
जो पाकिस्तानी सत्ता के भीतर बैठकर
बंगाली मुक्ति संग्राम को कुचलने की योजनाएँ बना रहा था।
एक दिन, अर्जुन के स्थानीय मार्गदर्शक को
मेजर अली ज़फ़र सिर्फ़ इसलिए गोली मार देता है
क्योंकि उसने सैन्य क्षेत्र के हैंडपंप से पानी पी लिया था।
अर्जुन का खून खौल उठता है।
वह अली को क्रूर कह देता है।
और तभी उसे पता चलता है—
यही अली, पाकिस्तानी कमांडर जनरल फ़ैज़ल हुसैन का
सबसे भरोसेमंद सलाहकार है।
उसी क्षण अर्जुन समझ जाता है—
यह युद्ध हथियारों का नहीं, मानवता का है।
भारत और पूर्वी पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर था।
भारत सहायता दे रहा था—हथियार, प्रशिक्षण—
पर अंतरराष्ट्रीय दबाव खुला युद्ध रोक रहा था।
कर्नल सलमान चाहता था कि मुक्ति वाहिनी
भारतीय सीमा तक सिमट जाए।
पर अर्जुन ने आदेशों से आगे जाकर
ढाका की ओर बढ़ने की योजना का समर्थन किया।
जनरल फ़ैज़ल, अर्जुन की स्पष्टवादिता
और उपमहाद्वीप की गहरी समझ से प्रभावित होता है।
अर्जुन उसे समझाता है—
यदि आपूर्ति मार्ग टूट जाएँ,
तो कोई भी सेना टिक नहीं सकती।
पचास सैनिक और दो मासूम सपने
अर्जुन एक साहसिक योजना बनाता है—
चिटगांव पोर्ट पर अप्रत्याशित हमला।
मेजर अली इसका विरोध करता है—
रास्ता दलदलों, नदियों और समर्थक मिलिशिया से भरा था।
अर्जुन के पास थे सिर्फ़
पचास मुक्ति वाहिनी के लड़ाके
और दो किशोर शरणार्थी—
दीपक और रहमान,
जो हथियार नहीं, आज़ादी का सपना लेकर चले थे।
यात्रा के दौरान, अर्जुन
घायल लड़ाके क़ासिम को बचाने के लिए
पूरा दल वापस मोड़ देता है।
सैनिकों का भरोसा जीत लेता है।
वे उसे अपना मान लेते हैं।
लेकिन नियति निर्दयी थी।
दो गुटों के बीच गृहयुद्ध जैसे हालात रोकने के लिए
अर्जुन को क़ासिम को स्वयं गोली मारनी पड़ती है।
उस रात, अर्जुन के भीतर कुछ सदा के लिए मर गया।
चिटगांव पर कब्ज़ा हो जाता है,
पर वादा किया गया हथियार-भंडार
पहले ही हटा लिया गया था।
अर्जुन कोलकाता जाकर
और संसाधन लाने का वादा करता है।
रास्ते में, रहमान दलदल में डूबकर मर जाता है।
उसकी आख़िरी चीख़
अर्जुन के सीने में हमेशा के लिए गूंज जाती है।
कोलकाता में, अर्जुन की सादगी,
और एक स्थानीय लड़ाके को
भारतीय अफ़सर जैसा सम्मान देने की ज़िद
वरिष्ठ अधिकारियों को असहज कर देती है।
लेफ्टिनेंट जनरल अरुण मेहता
उसे पदोन्नत कर
लेफ्टिनेंट कर्नल बना देते हैं।
मुक्ति वाहिनी को समर्थन मिलता है—
पर जब अर्जुन
स्वतंत्र बांग्लादेश और भारी हथियारों की बात करता है,
तो उसे सिर्फ़ आश्वासन मिलता है।
नायक, प्रचार और बोझ
अर्जुन गुरिल्ला युद्ध छेड़ देता है।
विदेशी मीडिया उसे
“रेगिस्तान से निकला भारतीय नायक” बना देती है।
अमेरिकी पत्रकार जॉन बेंटले
उसकी कहानियों को सनसनी बना देता है।
मेजर अली उसे सावधान करता है—
पर अर्जुन रुकता नहीं।
एक छापे में दीपक बुरी तरह घायल हो जाता है।
पाकिस्तानी यातनाओं से बचाने के लिए
अर्जुन उसे स्वयं गोली मार देता है।
यह बोझ उसके कंधों पर नहीं—
आत्मा पर बैठ जाता है।
अपमान और अंतिम संकल्प
एक गुप्त मिशन में अर्जुन पकड़ा जाता है।
उसे पीटा जाता है, अपमानित किया जाता है,
उसकी गरिमा तोड़ने की कोशिश होती है।
संकेत मिलते हैं—
उसके साथ अमानवीय व्यवहार हुआ।
किसी तरह मेजर अली
उसे छुड़ाकर लाता है।
शरीर बच जाता है—
पर भीतर का अर्जुन टूट चुका होता है।
आर. के. धर उसे सच बताते हैं—
बड़ी शक्तियाँ पहले ही नक़्शे बाँट चुकी हैं।
युद्ध के बाद भी राजनीति वही रहेगी।
फिर भी अर्जुन लौटता है—
ढाका की ओर अंतिम आक्रमण के लिए।
रास्ते में एक गाँव—
जहाँ नरसंहार हुआ था।
एक लड़ाका बदला माँगता है।
अर्जुन पहले रोकता है…
फिर स्वयं युद्ध-नाद लगाता है।
ढाका गिरता है।
पर मुक्ति वाहिनी भीतर से टूट जाती है।
बिजली, पानी, अस्पताल—सब चरमरा जाते हैं।
जनरल फ़ैज़ल
अंतरराष्ट्रीय समर्थन के बदले
आज़ादी के सपने से समझौता कर लेता है।
युद्ध के बाद अर्जुन भारत लौटता है।
उसे कर्नल बनाया जाता है—
और चुपचाप किनारे कर दिया जाता है।
सालों बाद, शांति के समय,
एक मेले में—
अर्जुन मौत के कुएँ में उतरता है।
इस बार—
बाहर आने के लिए नहीं।
भीड़ तालियाँ बजाती रहती है…
यह जाने बिना कि
एक पूरा युद्ध,
एक पूरा सपना,
उसी कुएँ में गिरकर
हमेशा के लिए ख़ामोश हो गया है।
जिस धरती के लिए
भारतीय सैनिकों ने रक्त दिया,
आज वही धरती—कई जगह—
*हिंदुओं के लिए “मौत का कुआँ” बनती दिखती है।*
इतिहास केवल किताबों में नहीं,
ज़मीन पर ज़िंदा रहता है।
और शहीदों की आत्माएँ
आज भी पूछती हैं—
क्या हमने यही भविष्य चुना था?
मेजर अर्जुन सिंह रावत
—भारतीय सेना का वह नाम,
जो तालियों में नहीं,
अंतरात्मा में गूँजता है।”
✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, IOA
सेल, आईएसपी, बर्नपुर
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