*“विश्वनाथ”*
“यह कहानी है 1888 की…
यह कथा अपने नायक विश्वनाथ उर्फ़ ‘विशु’ के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक कट्टर हिंदू ब्राह्मण है। विश्वनाथ गठीले शरीर, ऊँचे कद, उजले रंग और गंभीर, भारी आवाज़ वाला युवक है। अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण वह अपने मित्र-समूह का स्वाभाविक नेता माना जाता है। यद्यपि वह पारंपरिक अर्थों में अत्यंत सुंदर नहीं है, फिर भी उसकी वाणी और व्यक्तित्व उसे विशिष्ट और आकर्षक बनाते हैं।
विश्वनाथ का सबसे घनिष्ठ मित्र है अमरनाथ उर्फ़ अमर। अमर स्वभाव से मिलनसार, सौम्य और आकर्षक युवक है। बचपन में अनाथ हो जाने के कारण वह विश्वनाथ की माता सुशीला देवी को अपनी माँ के समान मानता है और उनसे गहरा स्नेह रखता है।
एक दिन अमर की भेंट एक ब्रह्म समाजी विचारधारा के प्रतिष्ठित व्यक्ति प्रमोद बाबू और उनकी दत्तक पुत्री बिनिता से होती है, जब उनकी बैलगाड़ी अमर के घर के पास दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है। अमर उनकी सहायता करता है और धीरे-धीरे उनके घर आने-जाने लगता है। वहीं उसका परिचय प्रमोद बाबू की पत्नी सरस्वती देवी, बड़ी पुत्री मालविका, मझली पुत्री सुनीता, छोटी पुत्री लीना, बिनिता के सगे भाई सौरभ, तथा ब्रह्म समाज के प्रभावशाली नेता हरिदास उर्फ़ पनु बाबू से होता है।
उस समय हिंदू समाज और ब्रह्म समाज के बीच तीव्र वैचारिक संघर्ष चल रहा होता है। कट्टर हिंदू विश्वनाथ छुआछूत और कठोर धार्मिक मान्यताओं में विश्वास करता है। वह अमर को प्रमोद बाबू और उनके परिवार से मिलने से रोकता है। इस बात को लेकर दोनों मित्रों में तीखा विवाद हो जाता है। विश्वनाथ अमर पर यह आरोप लगाता है कि वह प्रमोद बाबू की पुत्री के प्रति आकर्षित हो गया है, किंतु अमर इस आरोप से इंकार करता है।
विश्वनाथ के पिता कृष्णदत्त शर्मा, जो प्रमोद बाबू के पुराने मित्र हैं, एक दिन विश्वनाथ से आग्रह करते हैं कि वह प्रमोद बाबू के घर जाकर उनका हालचाल ले आए। जब विश्वनाथ वहाँ पहुँचता है, तो उसे पहले से अमर वहाँ उपस्थित मिलता है, जिससे वह अत्यंत आहत और क्रोधित हो जाता है। वहीं उसकी भेंट हरिदास बाबू से होती है, जो बंगाली होते हुए भी अंग्रेज़ी शासन का समर्थक है और बिनिता से विवाह करने वाला होता है। बहस के दौरान बिनिता, जो पहले विश्वनाथ को उसके कट्टरपन के कारण तुच्छ समझती थी, हरिदास बाबू के विरुद्ध विश्वनाथ का पक्ष लेती है। यह घटना विश्वनाथ के अंतर्मन को गहराई से झकझोर देती है।
धीरे-धीरे विश्वनाथ और बिनिता के बीच प्रेम अंकुरित होता है और बिनिता भी उसी भावना से उसे स्वीकार करती है। किंतु आजीवन विवाह न करने की प्रतिज्ञा कर चुके विश्वनाथ को गहरा अपराधबोध होता है और वह सब कुछ त्याग कर एक अनजान यात्रा पर निकल पड़ता है।
इस बीच सरस्वती देवी अंग्रेज़ मजिस्ट्रेट मिस्टर चार्ल्स ऐडम्स साहब के निकट संपर्क में आती हैं और उनके घर आयोजित एक नाट्य-कार्यक्रम के लिए अमर और सुनीता को चुनती हैं। उधर विश्वनाथ जिस गाँव में पहुँचता है, वहाँ मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक के अत्याचार व्याप्त होते हैं। वह अन्याय के विरुद्ध विद्रोह करता है और बिना किसी मुकदमे के एक महीने के लिए कारावास में डाल दिया जाता है।
इस घटना से सुनीता अत्यंत क्षुब्ध हो जाती है। वह रातों-रात स्टीमर से अमर के साथ घर लौट आती है। एक ब्रह्म समाजी युवती का रात में एक हिंदू युवक के साथ लौटना समाज में भारी विवाद को जन्म देता है। सुनीता बदनामी का शिकार होती है और सरस्वती देवी इसका दोष अमर पर मढ़ देती हैं। सामाजिक दबाव में अमर ब्रह्म समाज में सम्मिलित होने को तैयार हो जाता है, किंतु विश्वनाथ और स्वयं सुनीता इसका तीव्र विरोध करते हैं।
इसी समय बिनिता की विधवा मौसी हरिमती देवी प्रमोद बाबू के घर आती हैं। उनके हिंदू होने को लेकर सरस्वती देवी से उनका टकराव होता है। तब प्रमोद बाबू बिनिता को बताते हैं कि पास ही एक घर उन्होंने उसके पिता की बचत से खरीदा था। बिनिता और हरिमती देवी उसी घर में रहने लगती हैं।
कारावास से मुक्त होने के बाद विश्वनाथ बिनिता के घर आने-जाने लगता है। हरिमती देवी उसके उद्देश्य पर संदेह करती हैं और बिनिता का विवाह अपने रिश्तेदार कैलाश चंद्र से करना चाहती हैं। बिनिता इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर विश्वनाथ को अपना गुरु मान लेती है।
इसी दौरान अनेक विरोधों और सामाजिक बाधाओं के बावजूद अमर और सुनीता का विवाह संपन्न हो जाता है।
कहानी का सबसे बड़ा मोड़ तब आता है जब कृष्णदत्त शर्मा गंभीर रूप से बीमार पड़कर विश्वनाथ को उसके जन्म का सत्य बताते हैं। वे बताते हैं कि विश्वनाथ उनका सगा पुत्र नहीं, बल्कि एक आयरिश ईसाई सैनिक मिस्टर जॉन हार्डिंग का पुत्र है, जो इटावा में हुए युद्ध में मारा गया था। उसकी माता ने कृष्णदत्त शर्मा के घर में विश्वनाथ को जन्म दिया और स्वयं मृत्यु को प्राप्त हो गई। कृष्णदत्त शर्मा ने ही विश्वनाथ का पालन-पोषण किया था।
इस सत्य के उद्घाटन से विश्वनाथ का संपूर्ण अस्तित्व टूट जाता है। जिस धर्म और जाति के लिए उसने अपना जीवन अर्पित किया था, वही उसे अस्वीकार कर देती है। अंततः वह अहंकार, जाति और कट्टरता का परित्याग कर फुलवा के हाथ से जल ग्रहण करता है और प्रमोद बाबू को अपना गुरु स्वीकार कर लेता है।
“विश्वनाथ” केवल एक व्यक्ति की कथा नहीं, बल्कि पहचान, धर्म, मानवता और आत्मबोध की गहन यात्रा है।”
*✍️ सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, IOA
सेल, आईएसपी, बर्नपुर
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