*“सप्तनदी : स्वप्न, रक्त और विस्मृति !..”*
*“कोई लाख करे चतुराई रे,*
*करम का भेद मिटे न रे भाई…”*
“यह गाथा सप्तनदी नामक एक दूरस्थ कस्बे की है, और वहाँ बसे नंदीवंशी परिवार की सात पीढ़ियों की स्मृतियों, भूलों और अभिशापों की कथा है। सप्तनदी की नींव रखी थी धर्मवीर नदीवंशी और उनकी पत्नी सावित्री देवी ने। धर्मवीर तेज बुद्धि वाले, परंतु अहंकारी और जिद्दी स्वभाव के व्यक्ति थे।
एक बार गाँव के सालाना मेले में बकरों की लड़ाई आयोजित की गई। इसी दौरान एक प्रतिद्वंद्वी, प्रतापनाथ चौधरी, ने भीड़ के बीच धर्मवीर के पुरुषत्व पर तंज कस दिया। यह अपमान धर्मवीर के भीतर वर्षों से सुलग रही आग को भड़का गया। लड़ाई के बाद, अंधे क्रोध में धर्मवीर ने प्रतापनाथ की हत्या कर दी। यह पाप, यह लज्जा और समाज का भय—तीनों उन्हें चैन से बैठने नहीं देते। उसी रात धर्मवीर और सावित्री अपना गाँव छोड़कर अनजानी दिशा में निकल पड़ते हैं।
कई दिनों तक वे जंगलों, पहाड़ियों और सूखी नदियों को पार करते रहे। एक रात, सोनभद्र नदी के किनारे विश्राम करते समय, धर्मवीर ने स्वप्न देखा—एक ऐसा नगर, जहाँ घरों की दीवारें शीशे की तरह थीं और हर व्यक्ति अपने ही जीवन का प्रतिबिंब उनमें देख सकता था। उस स्वप्न में उस नगर का नाम था सप्तनदी। भोर होते ही धर्मवीर को लगा कि यह केवल सपना नहीं, बल्कि संकेत है। उन्होंने तय किया कि इसी नदी के किनारे वे अपना नया संसार बसाएँगे।
दिनों की मेहनत के बाद सप्तनदी अस्तित्व में आया—एक शांत, अलग-थलग और लगभग स्वप्निल बस्ती। धर्मवीर का विश्वास था कि यह स्थान चारों ओर से जल और नियति से घिरा हुआ है, और यहाँ वे अपने नियमों से जीवन को गढ़ सकते हैं। परंतु नगर बसते ही अजीब घटनाएँ होने लगीं। नदीवंशी परिवार की हर पीढ़ी किसी न किसी रहस्यमय दुहराव में फँसती गई—एक ही तरह के प्रेम, वही क्रोध, वही पतन। उनके अधिकांश दुःख ऐसे थे, जो उन्होंने स्वयं अपने हाथों से रचे थे।
सप्तनदी वर्षों तक बाहरी दुनिया से कटा रहा। केवल साल में एक बार घुमंतू साधु-व्यापारियों का एक दल वहाँ आता, जो लोहे को खींचने वाले पत्थर, दूर की चीज़ें दिखाने वाली नलिकाएँ और गर्मी में जमाई गई बर्फ दिखाकर लोगों को चकित करता। इस दल का अगुवा महावीर दत्त था—एक रहस्यमय व्यक्ति, जो समय से बड़ा प्रतीत होता था। उसकी मित्रता धर्मवीर से हो गई। धीरे-धीरे धर्मवीर संसार से कटता चला गया और ब्रह्मांड के रहस्यों में उलझता गया। एक दिन ऐसा आया जब वह केवल प्राचीन मंत्रों में बोलने लगा। परिवार ने उसे गाँव के बीच खड़े एक पुराने पीपल के पेड़ से बाँध दिया, जहाँ वह वर्षों तक जीवित रहा—और वहीं उसकी मृत्यु हुई।
समय बदला। देश आज़ाद हुआ। सरकार और राजनीति की परछाईं सप्तनदी तक पहुँची। कस्बे में एक धांधली भरा चुनाव हुआ। इससे प्रेरित होकर धर्मवीर का पुत्र अरुण नंदीवंशी विद्रोह के रास्ते पर निकल पड़ा। वह सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक बन गया। वर्षों तक वह लड़ता रहा, कई बार मृत्यु को छूकर लौटा, पर अंततः युद्ध से ऊब गया। उसने समझौता किया और थका-हारा सप्तनदी लौट आया। शेष जीवन उसने अपनी झोपड़ी में बैठकर पीतल की छोटी-छोटी मछलियाँ बनाते हुए बिताया—मानो हर मछली उसके अधूरे सपनों का बोझ उठाए हो।
फिर सप्तनदी में रेल पहुँची। मशीनें आईं, बाहरी लोग आए। नदी के पार एक विदेशी कंपनी ने केले और चाय के बागान लगाए और अपने लिए अलग बस्ती बसाई। कुछ वर्षों तक समृद्धि आई, फिर वही समृद्धि विनाश में बदल गई। मजदूरों की हड़ताल पर सेना ने गोलियाँ चला दीं। हजारों लोग मारे गए। इस नरसंहार का एकमात्र जीवित साक्षी देवेंद्र नंदीबंशी था, पर आश्चर्य यह कि कोई प्रमाण नहीं बचा। पूरा कस्बा या तो इसे भूल गया या मानने से इनकार कर दिया—जैसे सच कभी घटा ही न हो।
अंत तक आते-आते सप्तनदी उजड़ चुका था। टूटे घर, सूनी गलियाँ और स्मृतियों की राख। नंदीबंशी परिवार में केवल अनामिका और उसका भतीजा आदित्य बचे थे, जिसकी असली पहचान उसकी दादी ने छिपा रखी थी। अनजाने में दोनों के बीच निषिद्ध संबंध बन गया। उनसे जन्मा बच्चा एक विचित्र विकृति के साथ पैदा हुआ—जो पीढ़ियों पुराने भय को साकार करता था। अनामिका प्रसव में मर गई और बच्चा चींटियों द्वारा खा लिया गया। आदित्य परिवार का अंतिम उत्तराधिकारी रह गया।
अकेलेपन में आदित्य ने महावीर दत्त द्वारा छोड़ी गई एक पुरानी पांडुलिपि को पढ़ना शुरू किया। उसमें नंदीवंशी परिवार की सातों पीढ़ियों के सुख-दुःख पहले से लिखे थे। जैसे-जैसे वह पढ़ता गया, उसके चारों ओर भयानक आँधी उठने लगी। अंतिम पंक्ति में लिखा था—जिस क्षण यह कथा पूरी पढ़ ली जाएगी, उसी क्षण सप्तनदी और नंदीवंशी—दोनों मिट जाएँगे।
और ठीक उसी क्षण, जब आदित्य ने अंतिम पंक्ति पढ़ी, आँधी ने पूरे कस्बे को अपनी चपेट में ले लिया।
सप्तनदी इतिहास नहीं बना—वह स्मृति से भी लुप्त हो गया।
“सप्तनदी : स्वप्न, रक्त और विस्मृति !..”
वास्तव में यह कथा गीतकार प्रदीप जी के अमर गीत की आत्मा पर ही रची गई प्रतीत होती है—
*“कोई लाख करे चतुराई रे,*
*करम का भेद मिटे न रे भाई…”*
✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, IOA
सेल, आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन |*
*#युवा*










