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*”तिरुपति: एक दिल दहलाती सच !..”*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

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*“तिरुपति: एक दिल दहलाती सच !..”*

“मलिहाबाद की सुबह आम के बौर की गंध से जन्म लेती थी।
लखनऊ जिले का यह गाँव धरती से ऐसे जुड़ा था, जैसे माँ की कोख से नाल। यहाँ के किसान खेत को केवल ज़मीन नहीं मानते थे—वह उनकी स्मृति थी, उनकी परंपरा, और उनका भविष्य।
रघुनाथ तिवारी की उँगलियों में मिट्टी बसती थी। हल पकड़ते समय उसकी नसों में जैसे पीढ़ियों का श्रम दौड़ जाता। उसका घर कच्चा था, पर आत्मा पक्की। पत्नी कमला, चुपचाप काम करने वाली स्त्री—जिसके चेहरे पर धूप की रेखाएँ थीं और आँखों में धैर्य की झील। बेटा माधव सोलह वर्ष का था—आँखों में प्रश्न, मन में बेचैनी।
गाँव का जीवन सरल था—पर भीतर-ही-भीतर कुछ बदल रहा था।

1942 का वर्ष था।
देश में भारत छोड़ो आंदोलन की आग फैल चुकी थी। रेलवे स्टेशन पर अंग्रेज़ सिपाही बढ़ गए थे। रात में खुसुर-फुसुर होती—कहीं गांधी का नाम, कहीं जेल, कहीं लाठीचार्ज।
उसी समय गाँव में एक और हलचल शुरू हुई—धार्मिक जागरण।
हरिद्वार से आया एक प्रवचनकर्ता कहता— “ईश्वर का राज्य इस धरती पर नहीं, तिरुपति में प्रकट होगा।
जो सब कुछ त्याग देगा, वही चुना जाएगा।”
उसकी आवाज़ में सम्मोहन था। वह कहता— “खेत, घर, रिश्ते—सब माया हैं। मुक्ति केवल त्याग में है।”

कुछ लोग रो पड़े।
कुछ ने आँखें मूँद लीं।
कुछ ने माथा टेक दिया।

कमला सबसे पहले डरी।
“घर छोड़ देंगे?”
उसने रघुनाथ से पूछा।
रघुनाथ चुप रहा।
उसकी चुप्पी में संशय था।
गाँव दो हिस्सों में बँटने लगा।
एक ओर वे, जो कहते— “यही सच्ची आस्था है।”
दूसरी ओर वे, जो फुसफुसाते— “यह उन्माद है… पलायन है।”
माधव सुनता, सोचता, उलझता।
भारत छोड़ो आंदोलन की बातें और ईश्वर के राज्य की कल्पनाएँ—दोनों उसके मन में टकराने लगीं।

फैसला एक रात हुआ।
रघुनाथ ने खेत की मेड़ पर खड़े होकर कहा— “अगर ईश्वर बुला रहे हैं, तो मना कैसे करें?”
कमला की आँखों से आँसू बह निकले। “और यह ज़मीन? हमारे पुरखे?”
“सब माया है,” किसी ने पीछे से कहा।
मलिहाबाद ने पहली बार अपने बच्चों को खुद से दूर जाते देखा।
कुछ ने ज़मीन बेच दी।
कुछ ने दान कर दी।
कुछ ने यूँ ही छोड़ दी।
गाँव टूटने लगा—
जैसे सूखी मिट्टी में दरार पड़ती है।

यात्रा आसान नहीं थी।
लखनऊ, इलाहाबाद, नागपुर—भाप के इंजन, भीड़, भूख।
रेल की तीसरी बोगी में किसान, साधु, आंदोलनकारी—सब साथ।
कहीं “वंदे मातरम्” की फुसफुसाहट।
कहीं “गोविंदा-गोविंदा” का जयघोष।
माधव पहली बार समझ रहा था— देश भी यात्रा कर रहा है।

तिरुपति पहुँचना स्वप्न जैसा था।
पहाड़, हवा, भाषा—सब अनजाना।
तिरुमला की चढ़ाई पैरों को तोड़ती थी, पर मन उड़ता था।
कमला नंगे पाँव चलती रही।
उसके होंठों पर नाम था—पर आँखों में भय।
“यही स्वर्ग है?”
माधव ने मन में पूछा।

स्वर्ग जल्दी उतर गया।
काम नहीं था।
पैसे खत्म होने लगे।
बीमारियाँ आईं।
भाषा की दीवार खड़ी थी।
स्थानीय लोग सहानुभूति रखते थे, पर दूरी बनी रहती।
समूह के भीतर झगड़े शुरू हुए— कौन नेता होगा?
कौन तय करेगा कि क्या ईश्वर की इच्छा है?
त्याग अब बोझ बनने लगा।

कमला बीमार पड़ी।
दवा नहीं थी।
रघुनाथ रात भर बैठा रहा।
उसने पहली बार सोचा— “क्या यही ईश्वर का मार्ग है?”
माधव ने पास के एक तेलुगु परिवार से मदद ली।
वहाँ की स्त्री—सीता—ने बिना सवाल पूछे काढ़ा दिया।
कमला बच गई।

उस रात माधव समझ गया— करुणा किसी एक धर्म या स्थान की नहीं होती।

कुछ लोग लौटना चाहते थे।
उन्हें पापी कहा गया।
कहा गया— “जो लौटेगा, वह ईश्वर से विमुख होगा।”
कमला बोली— “अगर ईश्वर करुणा है, तो लौटना पाप कैसे?”
उसकी आवाज़ धीमी थी, पर दृढ़।
स्त्रियाँ पहली बार खुलकर बोलने लगीं।

भारत छोड़ो आंदोलन की खबरें तिरुपति तक पहुँचती थीं।
माधव सुनता— गाँव जल रहे हैं।
लोग जेल जा रहे हैं।
उसने पूछा— “अगर देश पुकार रहा है, तो क्या उत्तर नहीं देना चाहिए?”
कुछ चुप रहे।
कुछ नाराज़ हो गए।
आस्था और विवेक आमने-सामने खड़े थे।

रघुनाथ का निर्णय अचानक नहीं था।
एक सुबह उसने तिरुमला की चोटी से नीचे देखा।
उसे खेत दिखे—
नहीं, स्मृतियाँ दिखीं।
उसने कहा— “ईश्वर पलायन में नहीं, कर्तव्य में है।”
कमला ने उसका हाथ थाम लिया।
कुछ लोग साथ लौटे।
कुछ वहीं रह गए।
कोई विजेता नहीं था।
कोई पराजित नहीं।

वापसी आसान नहीं थी।
गाँव बदला हुआ था।
कुछ घर उजड़ चुके थे।
कुछ लोग जेल में थे।
पर खेत वही थे।
रघुनाथ ने हल उठाया।
माधव ने भी।
कमला ने चूल्हा जलाया।

वर्षों बाद माधव ने यह कथा लिखी।
उसने लिखा— “तिरुपति कोई स्थान नहीं,
वह एक प्रश्न है—
क्या हम ईश्वर को ढूँढ़ते हुए
मनुष्य होना भूल जाते हैं?”

तिरुपति केवल धार्मिक यात्रा की कहानी नहीं है।
यह मनुष्य की आत्मा की यात्रा है—
जहाँ आदर्श और यथार्थ,
आस्था और विवेक,
त्याग और कर्तव्य
एक-दूसरे से भिड़ते हैं।
यह कथा कहती है—
सच्ची भक्ति पलायन में नहीं,
बल्कि धरती पर रहकर
करुणा, श्रम और जिम्मेदारी निभाने में है।
यदि यह कहानी भविष्य में भी पढ़ी जाए,
तो इसलिए नहीं कि इसमें तिरुपति है—
बल्कि इसलिए कि इसमें मनुष्य है।”

*✍️ सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, IOA
सेल, आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*