*“आज दौड़ है !..”*
*(Riverside Township, Burnpur — एक कहानी)*
आज का दिन Riverside Township, Burnpur में कुछ अलग है।
हवा में हल्की सी ठंडक थी, लेकिन सूरज की किरणें इतनी मुलायम थीं कि जैसे किसी मां का हाथ माथे पर फिर रहा हो।
सवेरे-सवेरे पूरे टाउनशिप में एक खास सी चमक है।
लगभग हर बंगले के सामने फूल ऐसे खिले थे जैसे प्रकृति ने खुद किसी उत्सव की तैयारी कर रखी हो।
*गुलमोहर, गेंदा, गुलाब, चमेली…*
*हर रंग मानो मुस्कुरा रहा है।*
Riverside Township की सुंदरता आज देखने लायक है।
यह वही जगह थी जहाँ रोज़मर्रा की जिंदगी, ड्यूटी, मीटिंग, प्लांट की आवाज़ों के बीच भी लोग अपने भीतर का जीवन बचाए रखते है
।
लेकिन इसी सुंदरता के बीच एक सच्चाई भी है—
आजकल सड़कें बहुत खराब हो गई है।
कहीं गड्ढे, कहीं टूटे पैच, कहीं आधी उखड़ी हुई सतह।
फिर भी…
*आज दौड़ है।*
और दौड़ उन्हीं टूटी-फूटी सड़कों पर होनी है।
जैसे जिंदगी भी तो अक्सर ऐसी ही होती है—
रास्ते हमेशा सही नहीं होते,
लेकिन दौड़ फिर भी करनी पड़ती है।
सुबह सात बजे के करीब Riverside का माहौल बदलने लगा।
लोग घरों से निकलने लगे।
कुछ के हाथों में पानी की बोतलें,
कुछ के चेहरे पर आत्मविश्वास,
और कुछ की आंखों में हल्की सी घबराहट।
आज 4 किलोमीटर की दौड़ है।
और यह सिर्फ एक प्रतियोगिता नहीं है—
यह टाउनशिप का उत्सव है।
सबसे आगे है वे अधिकारी जो रोज़ अभ्यास करते है—
अजय, सचिन, पियूष, बसंत, मौर्या…
ये सभी ISP के नियमित प्रैक्टिस करने वाले ऑफिसर्स है।
उनके कदमों में अनुशासन है।
उनकी सांसों में मेहनत है।
लोग कहते है—
*“इनमें से ही कोई विजेता बनेगा।”*
लेकिन दौड़ में सिर्फ मेहनत नहीं, कभी-कभी किस्मत भी दौड़ती है।
Riverside की गलियों में कुछ नाम ऐसे है, जो हर साल चर्चा में रहते है—
राजा बाबू,
हिमांशु,
आज़ाद,
सामीउल्लाह,
अशोक,
स्वामी,
सुधीर…
ये वो लोग है जो कभी-कभी अचानक बाज़ी मार जाते है।
कभी राजा बाबू जीत जाते है,
तो कभी हिमांशु आखिरी लैप में सबको पीछे छोड़ देते है।
और आज भी किसी को नहीं पता था—
कौन जीतेगा।
दौड़ का असली मज़ा यही अनिश्चितता है।
*Riverside की महिलाएँ—सम्मान और शक्ति*
अगर कोई सोचता कि यह दौड़ सिर्फ पुरुषों की कहानी है,
तो वह Riverside Township को जानता ही नहीं।
यहाँ की honorable ladies किसी से कम नहीं है।
रूपा,
निधि,
रोमा,
शालू…
पिछले कई वर्षों से ये महिलाएँ चैंपियन रही है।
उनकी दौड़ में सिर्फ गति नहीं है,
उनकी दौड़ में जज़्बा है।
लोग कहते है—
*“ये सिर्फ जीतती नहीं हैं, प्रेरणा देती हैं।”*
उनके कदमों की आवाज़ में आत्मनिर्भरता है।
और फिर है हमारे बच्चे…
*जो पूरे टाउनशिप की उम्मीद बन जाते हैं।*
श्रेय़ा,
शान्वी’
सुरभि,
रागिनी,
आकृति…
अनिका
कई दिनों से लगातार अभ्यास कर रहे है,।
उनकी आंखों में जीत नहीं,
खेल की खुशी है,।
छोटे कदम, बड़ी ऊर्जा।
लड़कों में भी नाम कम नहीं है,—
सिद्धार्थ,
रघु,
समी…
ये सब उभरते हुए चैंपियन है,।
उनकी दौड़ देखकर लगता है,—
भविष्य दौड़ रहा है।
*मस्त मौला ग्रुप* की एंट्री
लेकिन हर दौड़ में एक ऐसा समूह भी होता है
जो जीतने के लिए नहीं दौड़ता—
बल्कि जीने के लिए दौड़ता है।
और Riverside Township में वह है,—
*मस्त मौला ग्रुप*
*उनका नेता मैं खुद है—*
सुशील।
मेरे साथ ,—
राकेश जी,
रघु दा,
अनिल सर,
और कई अन्य साथी।
हमारा लक्ष्य बिल्कुल साफ था—
“बस 4 किलोमीटर पूरा करना है,
और मज़े में करना है।”
हमारे लिए दौड़ प्रतियोगिता नहीं,
एक चलती-फिरती हास्य सभा है।
मस्त मौला ग्रुप का विश्लेषण
दौड़ शुरू होने से पहले ही
हमारा विश्लेषण शुरू हो गया।
बहुत तीखा विवाद चल रहा था—
“इस बार कुछ भी हो… बसंत ही चैंपियन होगा!”
रघु दा बोले—
“अरे नहीं भाई, अजय को मत भूलो।”
अनिल सर हँसते हुए बोले—
“सब छोड़ो… असली बात ये है कि मैं पूरा कर लूँ बस।”
और फिर ज़ोर-ज़ोर से ठहाके।
हंसी मज़ाक के बीच
कुछ गहरी बातें भी निकल आईं।
बहस—ज़िंदगी की दौड़ और आज की दौड़
राकेश जी अचानक गंभीर हो गए।
उन्होंने कहा—
“सोचो…
आज हम दौड़ रहे हैं इन टूटी सड़कों पर…
लेकिन असली दौड़ तो रोज़ जिंदगी में है।”
मैंने कहा—
“सही कहा…
और जिंदगी की सड़कें भी कम टूटी नहीं होतीं।”
रघु दा, ने जोड़ा—
“और वहाँ कोई मेडल नहीं मिलता…
बस संतोष मिलता है कि हम रुके नहीं।”
सच में…
दौड़ सिर्फ पैरों की नहीं होती।
दौड़ मन की होती है।
दौड़ सपनों की होती है।
दौड़ जिम्मेदारियों की होती है।
दौड़ शुरू होने वाली है
अब सब लोग लाइन में खड़े है।
*“सुशील एक सुनहरी यादों में खो जाता है!..”*
सूरज ऊपर उठ चुका था।
फूलों की खुशबू हवा में घुली थी।
टूटी सड़कें भी आज नई लग रही थीं,
क्योंकि उन पर उम्मीद दौड़ने वाली थी।
घोषणा हुई—
*“Ready… Get Set…”*
सभी की सांसें थम गईं।
और फिर…
“GO!”
दौड़ शुरू हो गई।
पहला किलोमीटर—जोश
पहले किलोमीटर में
सबसे आगे थे अजय, बसंत, सचिन।
महिलाओं में रूपा और निधि का दबदबा था।
बच्चों में श्रेया और सिद्धार्थ आगे निकल गए।
मस्त मौला ग्रुप?
हम पीछे थे…
लेकिन हँसी सबसे आगे थी।
अनिल सर बोले—
“सुशील, जीतने वालों को देखो…
और हमें देखो… हम बस जी रहे हैं!”
मैंने कहा—
*“बस यही तो जीत है!”*
दूसरा किलोमीटर—दर्द का प्रवेश
अब असली परीक्षा शुरू हुई।
सांसें भारी होने लगीं।
पैरों में खिंचाव।
अजय का चेहरा गंभीर था।
बसंत की आंखों में आग।
महिलाओं में रोमांच बढ़ गया था।
और बच्चों में अब थकावट दिखाई देने लगी थी।
श्रेय़ा ने खुद से कहा—
*“मैं रुकूंगी नहीं।”*
यही तो जीत की शुरुआत है।
तीसरा किलोमीटर—निर्णय
अब सब समझ गए थे—
यह दौड़ सिर्फ शरीर की नहीं,
मन की है।
बसंत और अजय साथ-साथ थे।
राजा बाबू अचानक तेज़ हो गए।
महिलाओं में रूपा ने अपनी चाल बढ़ा दी।
और मस्त मौला ग्रुप?
हम अब भी हँस रहे थे।
रघु दा बोले—
“भाई, हमारी जीत ये है कि हम आए।”
मैंने कहा—
*“और हमारी हार ये होगी कि हम रुक जाएँ।”*
भीड़ तालियाँ बजा रही थी।
हर कोई चिल्ला रहा था—
“बसंत! बसंत!”
“अजय! अजय!”
“रूपा! रूपा!”
बसंत ने गति बढ़ाई।
अजय ने भी पूरी ताकत झोंक दी।
दोनों बराबर।
भीड़ सांस रोके।
और फिर…
बसंत ने आखिरी क्षण में
एक लंबी छलांग लगाई।
बसंत जीत गया।
महिलाओं में रूपा फिर चैंपियन बनीं।
बच्चों में श्रेय़ा ने सबको चौंका दिया।
और मस्त मौला ग्रुप?
हम अंत में आए…
लेकिन सबसे ज्यादा हँसे।
दौड़ के बाद का दर्शन
सब लोग मैदान में बैठ गए।
सांसें तेज़ थीं,
लेकिन चेहरे पर संतोष था।
मैंने सबको देखा।
और मन में एक विचार आया—
आज की दौड़ खत्म हो गई।
कल फिर ऑफिस।
फिर जिम्मेदारियाँ।
फिर वही टूटी सड़कें।
लेकिन…
आज हम सबने एक बात सीख ली थी।
दौड़ जीतने के लिए नहीं होती।
दौड़ रुकने से बचने के लिए होती है।
जिंदगी में भी…
सबसे बड़ा विजेता वह नहीं
जो सबसे पहले पहुँचे,
बल्कि वह है
जो गिरकर भी चलता रहे।
दार्शनिक अंत
Riverside Township के फूल
शाम तक भी खिले रहे।
सड़कें टूटी थीं,
लेकिन कदम मजबूत थे।
और मैंने सोचा—
हम सब दौड़ रहे हैं।
कोई मेडल के लिए,
कोई स्वास्थ्य के लिए,
कोई आदत के लिए,
और कोई बस मस्ती के लिए।
दौड़ एक ही है—
जीवन की दौड़।
और जीवन का सबसे सुंदर सत्य यह है—
“जीतना जरूरी नहीं,
चलते रहना जरूरी है।
क्योंकि जो चलता रहता है,
वही सच में जीवित रहता है।”
मैंने मुस्कुरा कर कहा—
*All the best… सभी को।*
*Love you… Riverside Township.*
आज दौड़ है…
और कल भी दौड़ है…
लेकिन सबसे बड़ी दौड़ है—
खुद को बेहतर बनाने की।
✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, IOA
सेल, आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*









