*“एक डॉक्टर की मौत!”*
*(एक जीवन, दो पहचानें, और अंतहीन प्रश्न)*
“पश्चिम बंगाल के औद्योगिक मानचित्र पर एक शहर है— *बर्नपुर।*
दामोदर नदी के किनारे बसा हुआ, जहाँ सुबहें धुएँ की हल्की चादर से ढकी होती हैं और शामें इस्पात की भट्टियों की लाल आभा में चमकती हैं।
*IISCO बर्नपुर.* —जिसे लोग सिर्फ़ एक स्टील प्लांट नहीं, बल्कि एक जीवित सभ्यता मानते हैं।
लंबी-लंबी चिमनियाँ, कोक ओवन की गर्मी, ब्लास्ट फर्नेस की गर्जना,
श्रमिकों की कतारें, सफ़ेद हेलमेट पहने इंजीनियर,
और उनके बीच एक छोटा-सा संसार— *बर्नपुर हॉस्पिटल।*
यहीं, 1984 में एक युवा डॉक्टर ने कदम रखा था—
*डॉ. मासूम राही।*
डॉ. मासूम राही का जन्म किसी साधारण परिवार में नहीं हुआ था।
पिता एक सफल व्यापारी थे, विरासत में मिली संपत्ति पर्याप्त थी।
पर मासूम ने हमेशा अपनी पहचान अपने नाम से बनानी चाही।
Grant Medical College, Mumbai से MBBS,
और फिर King George Medical College से मेडिसिन में PhD।
उनके भीतर महत्वाकांक्षा थी—
सिर्फ़ सफल डॉक्टर बनने की नहीं,
बल्कि लोगों के जीवन में आशा भरने की।
जब उन्होंने IISCO बर्नपुर हॉस्पिटल जॉइन किया,
तब वह अस्पताल सिर्फ़ ईंट-पत्थर की इमारत नहीं था—
वह मजदूरों की उम्मीदों का घर था।
सुबह 8 बजे की ओपीडी में लंबी लाइनें लगतीं।
स्टील प्लांट में काम करने वाले मजदूर,
कोक ओवन की तपिश से जले चेहरे,
फर्नेस की धूल से भरे फेफड़े,
और उनकी आँखों में भरोसा—
“डॉक्टर साहब देख लेंगे।”
डॉ. मासूम हर मरीज को नाम से जानते थे।
उनके लिए हर केस सिर्फ़ एक फाइल नहीं,
एक कहानी था।
1990 में उनकी शादी हुई—
*डॉ. मौसम राही से।*
वह भी प्रतिभाशाली थीं,
आत्मविश्वासी, तेजस्वी, और महत्वाकांक्षी।
शुरुआत में सब कुछ स्वप्न जैसा था।
*बर्नपुर क्लब की शामें,*
टाउनशिप की हरियाली,
दामोदर नदी के किनारे टहलना,
स्टील मेल्टिंग शॉप की चमकती रोशनी को दूर से देखना।
पर धीरे-धीरे महत्वाकांक्षा अहंकार में बदलने लगी।
मौसम को लगता—
मासूम बहुत भावुक हैं,
बहुत सरल हैं,
बहुत “आदर्शवादी” हैं।
सास के शब्दों में तिरस्कार झलकता—
“इतनी डिग्रियाँ लेकर भी क्या हासिल किया?”
घर, जो कभी आश्रय था,
अब रणभूमि बन गया।
मासूम अस्पताल में जीवन बचाते,
और घर आकर अपनी आत्मा को मरता हुआ महसूस करते।
एक रात,
जब बाहर प्लांट की चिमनियाँ धुआँ उगल रही थीं,
और दूर कहीं फर्नेस की आवाज़ गूँज रही थी—
मासूम ने निर्णय लिया।
वह चुपचाप इस्तीफ़ा लिखकर चले गए।
न किसी से विदाई,
न कोई स्पष्टीकरण।
जेब में कुछ रुपये,
दिल में टूटा हुआ विश्वास।
बर्नपुर स्टेशन की पीली रोशनी में
उन्होंने आख़िरी बार पीछे मुड़कर देखा—
स्टील सिटी की वह चमक
जो अब उनके लिए अंधेरा बन चुकी थी।
कई महीनों की भटकन के बाद
वह गोवा पहुँचे।
समुद्र की लहरों में उन्हें एक अजीब सुकून मिला।
वहीं उनकी मुलाकात हुई—
पुराने दोस्त डॉ. नवाज़िश से।
कॉलेज की यादें,
पुरानी हँसी,
और फिर एक शाम—
Big Daddy Casino।
वह सिर्फ़ देखने गए थे।
पर भाग्य ने करवट ली।
रात भर में—
10 करोड़ रुपये जीत गए।
पहली बार उनके हाथ में इतनी धनराशि थी।
जैसे जीवन कह रहा हो—
*“देखो, तुम्हारे लिए अभी बहुत कुछ बाकी है।”*
पर उसी रात,
अख़बार की एक खबर ने सब बदल दिया—
“बर्नपुर के पास दामोदर नदी से अज्ञात शव बरामद…
पहचान न होने के कारण,
स्थानीय प्रशासन ने अनुमान लगाया—
यह शव डॉ. मासूम राही का हो सकता है…”
और अगले दिन—
उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।
मासूम के हाथ काँपने लगे।
वह… मर चुके थे।
पहले भय।
फिर स्तब्धता।
और अंततः—
एक विचित्र स्वतंत्रता।
उन्होंने नया नाम चुना—
अरमान साही।
नई दाढ़ी,
नया शहर,
नया जीवन।
वह ऋषिकेश चले गए।
गंगा की धारा,
आरती की घंटियाँ,
हवा में घुली भक्ति।
वह किताबें पढ़ते,
ध्यान करते,
और जीवन को नए सिरे से समझने लगे।
वहीं उनकी मुलाकात हुई—
कशिश ढोलकिया से।
शांत, संवेदनशील,
और जीवन के प्रति गहरी समझ रखने वाली।
दोनों के बीच अपनापन पनपने लगा।
पर अरमान जानते थे—
वह विवाह नहीं कर सकते।
वह अपने अतीत को मिटा नहीं सकते।
धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ—
जिस आज़ादी को उन्होंने वरदान समझा था,
वही अब पिंजरा बन चुकी है।
वह न पूरी तरह अतीत के थे,
न भविष्य के।
एक सुबह,
गंगा किनारे कशिश को बिना बताए
वह चले गए।
वह लौटे—
बर्नपुर।
स्टील सिटी वैसी ही थी—
पर सब कुछ बदल चुका था।
IISCO के गेट पर नई पेंटिंग,
हॉस्पिटल के सामने
उनके नाम का स्मारक—
*“डॉ. मासूम राही समर्पित चिकित्सक”*
डॉ. मौसम ने दूसरी शादी कर ली थी।
संपत्ति बँट चुकी थी।
अरमान दाढ़ी बढ़ाए
भीड़ में चलते रहे।
कोई पहचान नहीं पाया।
वह जीवित होकर भी
एक भूत थे।
हॉस्पिटल के कोने में बैठकर
उन्होंने खुद से कहा—
“मैं ज़िंदा हूँ…
लेकिन समाज के लिए मर चुका हूँ।”
ब्लास्ट फर्नेस की लपटें
आसमान छू रही थीं।
दामोदर शांत बह रही थी।
और बर्नपुर की हवा में
एक अदृश्य प्रश्न तैर रहा था—
क्या पहचान नाम से होती है?
या उस जीवन से,
जिसे समाज स्वीकार करे?
डॉ. मासूम राही
अब न पूरी तरह जी सकते थे,
न पूरी तरह मर सकते थे।
उनकी कहानी का अंत नहीं—
सिर्फ़ एक प्रश्न है।
कभी-कभी
जीवन से भागकर
हम आज़ादी नहीं,
एक और कैद चुन लेते हैं।”
✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*










