*“अरिजीत सिंह: एक प्यारा ‘शैयारा'”*
*“महान गायक अरिजीत सिंह का “संन्यास” — एक युग का आत्ममंथन”*
भारतीय संगीत जगत में जब भी संवेदना, सादगी और सच्चाई की आवाज़ की बात होगी, एक नाम अनायास ही सामने आएगा — Arijit Singh।
वह आवाज़ जिसने प्रेम को धड़कन दी, विरह को शब्द दिए, और टूटे हुए दिलों को मरहम दिया — यदि वही आवाज़ फिल्मी गायकी की चकाचौंध से दूरी बनाने का संकेत दे, तो यह केवल एक समाचार नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक प्रश्न बन जाता है।
क्या सचमुच अरिजीत सिंह ने गायकी से संन्यास ले लिया है?
यदि हाँ, तो क्यों?
और यदि नहीं, तो यह बदलाव किस गहरी अनुभूति की ओर इशारा करता है?
यह संपादकीय इन्हीं प्रश्नों के उत्तर खोजने का एक प्रयास है।
*“ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है…” — एक शाश्वत प्रश्न*
आज जब मैं यह गीत सुन रहा था—
“ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया,
ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनिया,
ये दौलत के भूखे रवाजों की दुनिया,
ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है…”
तो अनायास ही याद आ गए Guru Dutt, जिन्होंने फिल्म Pyaasa में “विजय” के माध्यम से इस पीड़ा को जीवंत किया था।
इन शब्दों के रचयिता थे Sahir Ludhianvi — जिन्होंने कलाकार के अंतर्द्वंद्व को अमर कर दिया।
आज वही प्रश्न मानो अरिजीत सिंह के जीवन में उतर आया है।
क्या प्रसिद्धि, क्या धन, क्या पुरस्कार — यदि आत्मा संतुष्ट न हो तो सब व्यर्थ है।
संगीतकार Vishal Dadlani ने एक बार कहा था कि अरिजीत सिंह ने कभी गाने के लिए पैसों की मांग नहीं की।
यह कथन सामान्य नहीं है। इस प्रतिस्पर्धी और व्यावसायिक दुनिया में जहाँ हर सुर का मूल्य तय होता है, वहाँ यदि कोई कलाकार पारिश्रमिक को प्राथमिकता न दे — तो वह साधारण नहीं रह जाता।
यहीं से अरिजीत का रूपांतरण दिखाई देता है।
वह “स्टार” से “साधक” बनते नज़र आते हैं।
शायद उन्होंने यह समझ लिया है कि यह संसार एक मृगमरीचिका है।
संसारिक भूख कभी समाप्त नहीं होती — वह केवल बढ़ती जाती है।
यह वही बोध है जो संत कबीर के शब्दों में मिलता है।
क्या अरिजीत सिंह भी उसी दिशा में बढ़ रहे हैं — जहाँ संगीत व्यवसाय नहीं, साधना बन जाता है?
*“संदेशे आते हैं” और एक आहत हृदय*
हाल ही में फिल्म “बॉर्डर 2” के शीर्षक गीत “संदेशे आते हैं” को लेकर चर्चा हुई। मूल गीत को Sonu Nigam और Roop Kumar Rathod ने जिस आत्मीयता से गाया था, वह आज भी सैनिकों और परिवारों की भावनाओं का प्रतीक है।
कहा जाता है कि अरिजीत सिंह स्वयं इस गीत को गाने के इच्छुक नहीं थे। उनका मानना था कि यह गीत पहले ही अपने श्रेष्ठ रूप में प्रस्तुत हो चुका है — फिर मेरी आवाज़ क्यों?
यह विनम्रता नहीं, बल्कि संवेदनशीलता का प्रमाण है।
जब किसी कलाकार को यह लगे कि वह केवल “प्रतिस्थापन” बन रहा है, तो उसका मन आहत होना स्वाभाविक है।
फिल्म उद्योग — चाहे बॉलीवुड हो, टॉलीवुड या अन्य किसी भाषा का सिनेमा — एक कठोर बाजार तंत्र पर चलता है।
फिल्म यदि सुपरहिट हो जाए, तो उसका श्रेय मुख्यतः अभिनेता और निर्माता को मिलता है।
गायक और संगीतकार अक्सर पीछे छूट जाते हैं।
*इतिहास साक्षी है कि O. P. Nayyar ने Lata Mangeshkar से कभी गीत नहीं गवाया।”
मतभेद, अहंकार और दूरी — कला की दुनिया में नई बात नहीं।
जगजाहिर है कि Salman Khan और अरिजीत सिंह के संबंधों में भी एक समय तनाव की चर्चा रही।
*कलाकार के लिए “इग्नोर” होना केवल पेशेवर नहीं, भावनात्मक पीड़ा भी है।*
Aamir Khan अपनी मार्केटिंग रणनीतियों के लिए प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी आगामी फिल्म “लाहौर: 1947” के लिए अरिजीत सिंह से अनुरोध किया।
परंतु प्रश्न यह है — क्या हर प्रस्ताव स्वीकार करना ही सफलता है?
या कभी-कभी “ना” कहना भी आत्मसम्मान का प्रतीक होता है?
शायद अरिजीत का मन अब फिल्मी राजनीति और प्रतिस्पर्धा से थक चुका है।
शायद वह उस राह पर चल पड़े हैं जहाँ संगीत केवल आत्मा की आवाज़ है।
हाल ही में कोलकाता में *Anoushka Shankar* के कॉन्सर्ट में जब यह घोषणा हुई कि अरिजीत सिंह भी मंच का हिस्सा हैं, तो दर्शकों में उत्साह की लहर दौड़ गई।
परंतु जो प्रस्तुति सामने आई, वह केवल गायन नहीं था — वह साधना का दृश्य था।
उनकी आँखों में शांति थी, सुरों में स्थिरता थी, और व्यक्तित्व में एक विरक्ति।
वह अब “स्टार” नहीं, बल्कि “संत” प्रतीत हो रहे थे।
आईपीएल उद्घाटन समारोह में जब उन्होंने Mahendra Singh Dhoni के चरण स्पर्श किए थे, तो कई लोगों ने इसे चर्चा का विषय बनाया।
परंतु यह उनके संस्कारों की झलक थी।
वह जानते हैं कि प्रसिद्धि क्षणभंगुर है, पर विनम्रता शाश्वत।
यह कहना अनुचित होगा कि अरिजीत सिंह ने पूरी तरह गायकी छोड़ दी है।
बल्कि उन्होंने अपने लिए एक नई परिभाषा गढ़ी है —
-वह अपनी धुनों पर गाएंगे।
-जिन फिल्मों में स्वयं संगीत देंगे, वहीं आवाज़ देंगे।
-अपने कॉन्सर्ट अपनी शर्तों पर करेंगे।
यह “संन्यास” नहीं, बल्कि “स्वतंत्रता” है।
यह उस कलाकार की घोषणा है जो कह रहा है —
*“अब मैं बाज़ार के लिए नहीं, अपने मन के लिए गाऊँगा।”*
*“जीवन का संदेश — “कुछ तो मेरे बारे में सोचो””*
जब कोई कलाकार सफलता के शिखर पर पहुँचकर विराम लेता है, तो यह हार नहीं, बल्कि परिपक्वता का संकेत होता है।
शायद अब जीवन स्वयं अरिजीत सिंह से कह रहा है —
*“कुछ तो मेरे बारे में सोचो।”*
परिवार, आत्मा, शांति — ये सब भी जीवन का हिस्सा हैं।
मुर्शिदाबाद की गलियों से उठकर विश्व मंच तक पहुँचना एक उपलब्धि है, पर वहाँ से भीतर की ओर लौटना एक साधना है।
आज अरिजीत सिंह हमारे लिए केवल एक गायक नहीं, बल्कि एक *“शैयारा”* बन गए हैं —
एक ऐसा पथिक जो भीड़ से निकलकर आत्मा की ओर चल पड़ा है।
उनका यह कदम हमें सिखाता है —
प्रसिद्धि से बड़ा है आत्मसंतोष।
धन से बड़ी है शांति।
और तालियों से बड़ी है भीतर की निस्तब्धता।
यदि यह सच है कि उन्होंने मुख्यधारा फिल्मी गायकी से दूरी बनाई है, तो यह पराजय नहीं — बल्कि उच्चतर बोध है।
धन्यवाद अरिजीत सिंह।
आपने हमें यह सिखाया कि जीवन को संतुष्ट करने के लिए कभी-कभी रुकना आवश्यक है।
आज हम सबकी ओर से —
*लव यू भाई, तुस्सी ग्रेट हो।*
क्योंकि यदि दुनिया मिल भी जाए तो क्या है —
पर यदि आत्मा मिल जाए, तो सब कुछ है।
— *✍️ सुशील कुमार सुमन*










