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*बज़्म-ए-अरबाब-ए-सुख़न का तरह़ी मुशायरा*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

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*बाराबंकी* (अबू शहमा अंसारी)क़स्बा तहसील फ़तेहपुर, नज़्द सत बर्ज़ी मस्जिद हाजी मौला बख़्श मंज़िल में बज़्म-ए-अरबाब-ए-सुख़न की जानिब से एक शानदार तरह़ी मुशायरे का आयोजन किया गया।
इस तरह़ी मुशायरे का मिसरा-ए-तरह़ था:
“दिल को न तोड़िए, ये ख़ुदा का मक़ाम है।”
महफ़िल की सरपरस्ती नसीम अख़्तर क़ुरैशी ने की, जबकि सदारत सियासी, मिली व समाजी कारकुन और साबिक़ नगर पंचायत सदस्य शाहिद अली मंसूरी ने की।
मेहमान-ए-ख़ास की हैसियत से मशहूर शायर ज़ुबैर इदरीसी सीतापुरी ने शिरकत की۔
निज़ामत के फ़राइज़ हस्सान साहिर ने अंजाम दिए।
कार्यक्रम की शुरुआत हाफ़िज़ सलमान बिलाली की तिलावत-ए-क़ुरआन से हुई، जबकि हाफ़िज़ सलमान राइन ने नात-ए-पाक पेश की।
अपने सदारती ख़िताब में शाहिद अली मंसूरी ने कहा कि आज के मिसरा-ए-तरह़ “दिल को न तोड़िए, ये ख़ुदा का मक़ाम है” का पैग़ाम इंसानियत और मोहब्बत है। उन्होंने कहा कि किसी का दिल तोड़ना इबादतगाह ढहाने के बराबर है।
उन्होंने अफ़सोस जताते हुए कहा कि तक़रीबन तीस साल पहले क़स्बा फ़तेहपुर का अदबी माहौल काफ़ी ज़िंदा था। उस वक़्त कई अदबी अंजुमनें माहाना तरह़ी नशिस्तों का एहतमाम किया करती थीं, मगर अब यह सिलसिला लगभग ख़त्म हो चुका है। इसकी ज़िम्मेदारी हम सब पर आती है क्योंकि हमने अपने शायरों और अदबियों से राब्ता कम कर दिया، मुशायरों और अदबी बैठकों में दिलचस्पी घटा दी और उर्दू के फ़रोग़ व बक़ा के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाए۔
उन्होंने ऐलान किया कि उर्दू की तरक़्क़ी के लिए हर मुमकिन सहयोग किया जाएगा और नौजवान शायरों की हर तरह से हौसला-अफ़ज़ाई की जाएगी۔
मुशायरे में पढ़े गए अशआर
रुस्वा किया है तूने हर इक मोड़ पर हमें
फिर भी हमारे दिल में तेरा एहतराम है
अहमद सईद हर्फ़
इस्लाम के निज़ाम में है अम्न-ओ-सुकूँ
आना है जिसको आए, हमारा सलाम है
नसीम अख़्तर क़ुरैशी
आलूदगी है छाई हुई शहर पर मिरे
अब तो यहाँ पे साँस भी लेना हराम है
हस्सान साहिर
काबे के ढहाने जैसा न हो आपका अमल
दिल को न तोड़िए, ये ख़ुदा का मक़ाम है
ज़ुबैर इदरीसी
रातों की नींद, दिन का सुकूँ सब हराम है
सीने में ग़म हैं, हाथ में इक मय का जाम है
शादाब अनवर
वह शख़्स कर न पाएगा हम से मुक़ाबला
जो शख़्स ख़्वाहिशों का अभी तक ग़ुलाम है
हसन नईमी
कल रात उसने बासी खिलाए थे गुलगुले
तब से हमारे पेट का गड़बड़ निज़ाम है
जावेद कंवारा
शायद पता नहीं है ये फ़िरऔन-ए-वक़्त को
इस रब्ब-ए-कायनात की हर शै ग़ुलाम है
सलमान बिलाली
मुझ से ये तेरे रूठ के जाने का है असर
दीवार-ओ-दर हैं ग़मज़दा, अफ़सुर्दा शाम है
जावेद यूसुफ़
कार्यक्रम में ख़ास तौर पर जावेद यूसुफ़, मोहम्मद अकी़क़ पप्पू, इश्तियाक़ क़ुरैशी, जाबिर क़ुरैशी, हाजी इजाज़ अंसारी, सलीम अकबर, मास्टर शुऐब, अतीक़ क़ुरैशी, अल्ताफ़ राइन, गड्डू भाई सहित बड़ी तादाद में शौक़ीन-ए-अदब मौजूद रहे।
आख़िर में मेज़बान शाहिद अली मंसूरी और हस्सान साहिर ने तमाम शायरों और सामेईन का शुक्रिया अदा किया।