*“3D: धुंध, दौलत और धोखा”*
15 फरवरी 2026।
Burnpur Stadium रोशनी से जगमगा रहा था।
स्टेडियम के बड़े स्क्रीन पर भारत-पाकिस्तान का मैच चल रहा था। हजारों लोग चिल्ला रहे थे।
लेकिन VIP गैलरी में बैठे एक व्यक्ति का ध्यान मैच पर नहीं था।
वह था—
समर प्रताप सिंह।
आसनसोल और बर्नपुर का सबसे ताकतवर व्यवसायी।
उसके पास चाय बागान, होटल, शॉपिंग मॉल, और 400 करोड़ की संपत्ति थी।
उसने अपनी घड़ी देखी।
रात के 9:17 बजे।
उसके फोन पर एक मैसेज आया—
“आज सब खत्म हो जाएगा।”
समर का चेहरा पीला पड़ गया।
उसने तुरंत चारों ओर देखा।
और तभी—
धाँय।
एक गोली।
सीधे उसके दिल में।
VIP गैलरी में अफरा-तफरी मच गई।
लेकिन शूटर गायब था।
जैसे वह कभी वहाँ था ही नहीं।
केस मिला—
इंस्पेक्टर आर्यन मुखर्जी को।
आर्यन ने समर की फाइल देखी।
कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं।
कोई गैंगवार नहीं।
लेकिन एक चीज थी—
संपत्ति।
और संपत्ति हमेशा दुश्मन पैदा करती है।
समर का छोटा भाई था—
“नील प्रताप सिंह।”
नील पिछले छह महीनों से दार्जिलिंग में रह रहा था।
वह हमेशा अपने भाई की छाया में रहा।
कमजोर।
अनदेखा।
और… अपमानित।
जब आर्यन ने नील को फोन किया, उसने सिर्फ इतना कहा—
“मैं कल सुबह बर्नपुर आ रहा हूँ।”
उसकी आवाज में दुख था।
लेकिन आँसू नहीं थे।
Burnpur Stadium के CCTV फुटेज में एक अजीब चीज दिखी।
शूटिंग के ठीक पहले—
समर खड़ा हुआ था।
जैसे वह किसी को पहचान गया हो।
और उसने कहा था—
“तुम यहाँ?”
मतलब—
हत्यारा कोई अनजान नहीं था।
जांच आर्यन को दार्जिलिंग ले गई।
वहाँ उसने एक नाम सुना—
राकेश थापा।
एक पेशेवर शूटर।
और सबसे चौंकाने वाली बात—
राकेश से मिलने वाला आखिरी व्यक्ति था—
नील प्रताप सिंह।
जब पुलिस नील को गिरफ्तार करने पहुँची—
नील ने कहा—
“हाँ, मैं राकेश से मिला था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आर्यन ने पूछा—
“क्यों?”
नील मुस्कुराया।
“क्योंकि मैं जानता था, कोई मेरे भाई को मारने वाला है।”
आर्यन चौंक गया।
“क्या मतलब?”
नील ने धीरे से कहा—
“क्योंकि असली दुश्मन मैं नहीं था।”
जांच में एक और नाम सामने आया—
रिया सिंह।
समर की पत्नी।
उसने पिछले तीन महीनों में 5 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए थे।
किसे?
राकेश थापा को।
आर्यन के हाथ कांप गए।
मतलब—
पत्नी ने हत्या करवाई।
लेकिन क्यों?
रिया को गिरफ्तार किया गया।
पहले उसने कुछ नहीं कहा।
फिर धीरे से बोली—
“क्योंकि समर मुझे भी मारने वाला था।”
कमरे में सन्नाटा।
“उसने अपनी पूरी संपत्ति अपने भाई नील के नाम कर दी थी।”
“और मुझे रास्ते से हटाने वाला था।”
लेकिन…
आर्यन को कुछ गड़बड़ लग रही थी।
क्योंकि वसीयत अभी बदली ही नहीं थी।
तीन दिन बाद—
राकेश थापा पकड़ा गया।
उसने जो बताया—
उससे सब कुछ बदल गया।
उसने कहा—
“मुझे पैसे रिया ने नहीं… नील ने दिए थे।”
सब स्तब्ध रह गए।
नील ने अपनी भाभी के नाम से फर्जी अकाउंट बनाकर पैसे भेजे थे।
ताकि शक रिया पर जाए।
और वह बच जाए।
नील ने सब कुछ प्लान किया था।
महीनों पहले।
दार्जिलिंग में बैठकर।
उसने शूटर को रखा।
फर्जी सबूत बनाए।
और अपने ही भाई की हत्या करवाई।
लेकिन—
उसने एक गलती की।
मैसेज।
“आज सब खत्म हो जाएगा।”
वह मैसेज उसके अपने फोन से भेजा गया था।
Burnpur Stadium।
वही जगह।
जहाँ सब शुरू हुआ था।
नील को हथकड़ी में ले जाया जा रहा था।
उसने पीछे मुड़कर स्टेडियम को देखा।
और मुस्कुराया।
“मैं हार गया…”
इंस्पेक्टर आर्यन ने कहा—
“नहीं।”
“तुम पहले दिन ही हार गए थे…”
“जब तुमने अपने भाई को दुश्मन समझ लिया था।”
लेकिन… असली सस्पेंस अभी बाकी है
जेल में—
नील को एक चिट्ठी मिली।
उसमें सिर्फ एक लाइन लिखी थी—
“तुमने अच्छा काम किया… अब अगला नंबर तुम्हारा है।”
नील के हाथ काँपने लगे।
क्योंकि—
उसने यह हत्या अकेले नहीं की थी।
और उसका पार्टनर…
अभी भी आज़ाद था।
समाप्त… या शायद नहीं।
दार्जिलिंग जेल।
रात के 2:15 बजे।
नील प्रताप सिंह की नींद अचानक खुल गई।
उसके हाथ में वह चिट्ठी थी—
“तुमने अच्छा काम किया… अब अगला नंबर तुम्हारा है।”
उसके माथे पर पसीना था।
क्योंकि—
इस हत्या की साजिश में वह अकेला नहीं था।
उसका एक पार्टनर था।
लेकिन… वह पार्टनर कौन था?
आसनसोल में इंस्पेक्टर आर्यन मुखर्जी भी सो नहीं पा रहा था।
कुछ था जो मेल नहीं खा रहा था।
नील लालची था—हाँ।
लेकिन इतना चालाक?
फर्जी अकाउंट, प्रोफेशनल शूटर, डिजिटल ट्रैक छिपाना…
यह सब नील अकेले नहीं कर सकता था।
कोई और था।
कोई… जो दिमाग था।
जांच फिर Burnpur Stadium पहुँची।
वहाँ एक बूढ़ा गार्ड था—
महेश दत्ता।
पहले उसने कहा—
“मैंने कुछ नहीं देखा।”
लेकिन जब आर्यन ने उसे CCTV का एक फ्रेम दिखाया—
उसका चेहरा पीला पड़ गया।
उस फ्रेम में—
गोली चलने से 5 मिनट पहले—
एक आदमी VIP गैलरी से निकल रहा था।
वह आदमी था—
डॉ. करण मेहता।
समर प्रताप सिंह का सबसे करीबी दोस्त।
और उसका निजी सलाहकार।
डॉ. करण मेहता।
एक सम्मानित व्यक्ति।
समर का बिजनेस पार्टनर।
और…
उसकी संपत्ति का मैनेजर।
मतलब—
उसे पता था कि संपत्ति किसके नाम होने वाली है।
और—
पिछले छह महीनों में—
उसने समर की संपत्ति से 20 करोड़ रुपये गायब किए थे।
लेकिन समर को पता चल गया था।
और उसने करण को हटाने का फैसला किया था।
आर्यन दार्जिलिंग पहुँचा।
करण का बंगला खाली था।
लेकिन अंदर—
एक लैपटॉप मिला।
और उसमें—
एक वीडियो।
वीडियो में करण कह रहा था—
“नील सिर्फ एक मोहरा है।”
“असली खेल मैंने खेला है।”
आर्यन के हाथ काँप गए।
करण ने सब कुछ प्लान किया था।
उसने नील के मन में जहर भरा।
उसे यकीन दिलाया कि समर उसे संपत्ति से बाहर कर देगा।
फिर—
उसे शूटर से मिलवाया।
फर्जी अकाउंट बनाया।
और…
सबूत नील के खिलाफ छोड़ दिए।
ताकि—
नील फँस जाए।
और करण बच जाए।
तीन दिन बाद—
एक खबर आई।
डॉ. करण मेहता की लाश दार्जिलिंग की एक खाई में मिली।
उसकी कार दुर्घटनाग्रस्त थी।
लेकिन—
उसके शरीर पर गोली का निशान था।
मतलब—
यह दुर्घटना नहीं थी।
हत्या थी।
करण की जेब में एक फोन मिला।
उसमें आखिरी मैसेज था—
“तुमने अच्छा काम किया… अब अगला नंबर तुम्हारा है।”
वही मैसेज।
जो नील को मिला था।
आर्यन अब समझ गया।
कोई तीसरा व्यक्ति था।
कोई…
जो सबके पीछे था।
अंतिम दृश्य
Burnpur Stadium।
रात।
खाली।
इंस्पेक्टर आर्यन अकेला खड़ा था।
तभी—
उसके फोन पर एक मैसेज आया।
“तुम बहुत करीब आ गए हो, इंस्पेक्टर।”
“लेकिन सच जानना हमेशा खतरनाक होता है।”
आर्यन ने चारों ओर देखा।
कोई नहीं था।
सिर्फ—
धुंध।
और…
एक परछाई।
जो धीरे-धीरे अंधेरे में गायब हो गई।
असली मास्टरमाइंड अभी भी ज़िंदा है।
और…
वह आर्यन को देख रहा है।
“असली चेहरा”
डर अब शिकारी का था
इंस्पेक्टर आर्यन मुखर्जी अब समझ चुके थे—
यह सिर्फ एक हत्या नहीं थी।
यह एक खेल था।
और इस खेल का असली खिलाड़ी…
अभी भी आज़ाद था।
समर मारा गया।
करण मारा गया।
नील जेल में था।
लेकिन—
इन तीनों को जोड़ने वाला कोई चौथा व्यक्ति था।
आर्यन ने समर के पुराने कॉल रिकॉर्ड फिर से निकाले।
एक नंबर बार-बार दिख रहा था।
लेकिन—
वह नंबर किसी के नाम पर रजिस्टर्ड नहीं था।
फिर एक और चौंकाने वाली बात सामने आई—
वह नंबर अक्सर Burnpur Stadium के पास एक्टिव रहता था।
और…
आसनसोल पुलिस स्टेशन के पास भी।
मतलब—
वह व्यक्ति पास ही था।
बहुत पास।
आर्यन ने उस नंबर की लोकेशन ट्रैक की।
लोकेशन आई—
आसनसोल पुलिस क्वार्टर।
आर्यन के दिल की धड़कन रुक गई।
क्योंकि वहाँ रहता था—
सब-इंस्पेक्टर विवेक रॉय।
आर्यन का अपना जूनियर।
उसका सबसे भरोसेमंद आदमी।
जब विवेक को पूछताछ के लिए बुलाया गया—
वह मुस्कुरा रहा था।
जैसे वह इसी पल का इंतजार कर रहा हो।
उसने धीरे से कहा—
“सर… आपने बहुत देर कर दी।”
आर्यन की आँखें फैल गईं।
“क्यों किया तुमने यह सब?”
विवेक की आँखों में नफरत थी।
“क्योंकि समर प्रताप सिंह ने मेरे पिता को मार दिया था।”
कमरे में सन्नाटा।
“20 साल पहले…”
“मेरे पिता उसके चाय बागान में काम करते थे।”
“उन्होंने समर की चोरी पकड़ ली थी।”
“और अगले दिन…”
“उनकी लाश खाई में मिली।”
आर्यन समझ गया।
यह हत्या लालच की नहीं—
बदले की थी।
विवेक ने कहा—
“मैंने नील को चुना क्योंकि वह कमजोर था।”
“मैंने करण को इस्तेमाल किया क्योंकि वह लालची था।”
“और मैंने दोनों को खत्म कर दिया…”
“ताकि सच कभी सामने न आए।”
आर्यन ने पूछा—
“और अब?”
विवेक मुस्कुराया।
“अब सिर्फ एक गवाह बचा है…”
और उसने अपनी पिस्तौल निकाल ली।
सीधे—
आर्यन की ओर।
विवेक भागकर Burnpur Stadium पहुँचा।
वही जगह—
जहाँ यह सब शुरू हुआ था।
आर्यन उसके पीछे था।
स्टेडियम खाली था।
सिर्फ धुंध।
और दो परछाइयाँ।
विवेक ने कहा—
“आज यह खेल खत्म होगा।”
लेकिन तभी—
धाँय।
एक गोली चली।
विवेक की पिस्तौल उसके हाथ से गिर गई।
और वह जमीन पर गिर पड़ा।
पुलिस टीम पहुँच चुकी थी।
विवेक गिरफ्तार हो गया।
उसने सब कुछ कबूल कर लिया।
“मैंने 20 साल इंतजार किया…”
“और आखिरकार… बदला पूरा हुआ।”
लेकिन उसके चेहरे पर शांति नहीं थी।
सिर्फ…
खालीपन।
अंतिम दृश्य
तीन महीने बाद।
Burnpur Stadium।
फिर से मैच चल रहा था।
लोग खुश थे।
जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
लेकिन इंस्पेक्टर आर्यन जानते थे—
हर भीड़ में…
एक विवेक छिपा हो सकता है।
हर मुस्कान के पीछे…
एक बदला।
और हर भरोसे के पीछे…
एक धोखा।
क्योंकि इस दुनिया में—
सबसे खतरनाक दुश्मन वह नहीं होता जिसे आप जानते हैं…
बल्कि वह होता है… जिस पर आप सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं।
✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*






