*“उम्मीद ही जीवन है !..”*
“झारखंड की धरती पर बसा जमशेदपुर शहर दिन में कारखानों की आवाज़ और लोहे की चमक से गूंजता रहता था। टाटा स्टील के विशाल प्लांट, फैक्ट्रियों की ऊँची चिमनियाँ और सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों के बीच यह शहर मेहनत और सपनों का प्रतीक माना जाता था।
इसी शहर के बीचोंबीच एक बड़ा अस्पताल था—टाटा मेन हॉस्पिटल।
अस्पताल की तीसरी मंज़िल पर एक वार्ड था—कैंसर वार्ड नंबर 7।
यह वार्ड किसी साधारण जगह की तरह नहीं था।
यहाँ सिर्फ दवाइयाँ और मशीनें ही नहीं थीं, बल्कि यहाँ जीवन और मृत्यु, उम्मीद और निराशा, पीड़ा और प्रेम—सब एक साथ रहते थे।
दिसंबर की एक ठंडी सुबह थी। हल्की धुंध शहर को ढँके हुए थी। अस्पताल के मुख्य द्वार के सामने एक एम्बुलेंस आकर रुकी।
एम्बुलेंस का दरवाज़ा खुला और अंदर से एक दुबला-पतला आदमी धीरे-धीरे बाहर उतरा। उसका नाम था विनोद प्रताप सिंह।
विनोद कभी जमशेदपुर के ही एक कॉलेज में इतिहास के प्राध्यापक थे। तेज दिमाग, स्पष्ट विचार और बेबाक बोलने वाले इंसान। उनके छात्र उन्हें बहुत पसंद करते थे क्योंकि वे इतिहास को सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रखते थे—वे उसे जीवन से जोड़कर समझाते थे।
लेकिन पिछले कुछ महीनों से उनके शरीर में एक अजीब सी कमजोरी आ गई थी। लगातार थकान, तेज दर्द और अचानक वजन कम होना—इन सबने उन्हें परेशान कर दिया था।
कई जाँचों के बाद डॉक्टरों ने आखिरकार वह शब्द कहा, जिसे सुनकर किसी का भी दिल काँप जाता है—
“आपको कैंसर है।”
यह सुनते ही विनोद की पूरी दुनिया जैसे ठहर गई थी।
उन्हें ऐसा लगा जैसे उनके जीवन की किताब अचानक बंद हो गई हो।
अस्पताल की नर्स मीरा उन्हें सहारा देकर कैंसर वार्ड नंबर 7 में ले गई। उसने उन्हें एक खाली बिस्तर पर लिटा दिया।
वार्ड में पहले से पाँच मरीज थे।
हर एक के चेहरे पर अलग-अलग कहानी लिखी हुई थी।
सबसे पहले विनोद की नज़र सामने वाले बिस्तर पर पड़े एक आदमी पर पड़ी।
उसका नाम था रामकिशोर यादव।
रामकिशोर उत्तर प्रदेश के बलिया जिले का किसान था। अपनी छोटी-सी खेती से वह अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। लेकिन बीमारी ने उसे मजबूर कर दिया था कि वह अपना खेत बेचकर इलाज के लिए जमशेदपुर आए।
फिर भी उसके चेहरे पर मुस्कान रहती थी।
उसने विनोद की तरफ देखकर कहा—
“डरिए मत बाबूजी…
यह बीमारी भी आखिर बीमारी ही है। भगवान चाहेगा तो सब ठीक हो जाएगा।”
दूसरे बिस्तर पर लेटा हुआ था नसीम खान।
नसीम कोलकाता का रहने वाला था और पेशे से दर्जी था। छोटी-सी सिलाई की दुकान से उसने अपने पूरे परिवार को संभाला था।
वह गरीब था, लेकिन दिल का बहुत अमीर।
हर शाम वह अपने मोबाइल में पुराने फिल्मी गाने सुनता और धीरे-धीरे गुनगुनाता—
*“ज़िंदगी कैसी है पहेली…”*
उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी उदासी और सुकून दोनों साथ-साथ होते थे।
तीसरे बिस्तर पर एक बुज़ुर्ग बैठे रहते थे—शरद बाबू।
वह पहले एक सरकारी अधिकारी थे। अनुशासनप्रिय और कम बोलने वाले।
उनके चेहरे पर हमेशा गंभीरता रहती थी, लेकिन उनकी आँखों में गहरी थकान और जीवन का अनुभव साफ दिखाई देता था।
सिर्फ 23 साल का युवक।
दिल्ली में ऑटो चलाता था। मेहनती और हँसमुख।
उसकी माँ हर दिन अस्पताल आती और चुपचाप उसके सिर पर हाथ फेरती रहती।
उस स्पर्श में इतना प्रेम होता कि कई बार सूरज की आँखें भर आतीं।
और पाँचवें बिस्तर पर थी एक महिला—सरोजिनी देवी।
वह एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थीं।
उनकी आवाज़ में हमेशा दृढ़ता रहती।
वह अक्सर कहतीं—
“बीमारी शरीर में होती है… आत्मा में नहीं।”
उनकी यह बात वार्ड के बाकी मरीजों को भी हिम्मत देती थी।
इस वार्ड के प्रभारी थे डॉ. अभय मेहरा।
डॉ. मेहरा देश के प्रसिद्ध कैंसर विशेषज्ञों में से एक माने जाते थे।
लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान यह थी कि वे मरीजों से सिर्फ डॉक्टर की तरह नहीं, बल्कि एक इंसान की तरह बात करते थे।
एक दिन उन्होंने सभी मरीजों को इकट्ठा करके कहा—
“देखिए… कैंसर सिर्फ शरीर की बीमारी नहीं है।
यह मन की भी परीक्षा है।
जो मन से हार गया… वह शरीर से भी हार जाएगा।”
उनकी आवाज़ में एक अजीब सी शक्ति थी।
उनकी बात सुनकर वार्ड में बैठे हर व्यक्ति के दिल में थोड़ी-सी नई उम्मीद जाग उठी।
चौथा अध्याय : बातचीत
दिन धीरे-धीरे बीतने लगे।
वार्ड नंबर 7 में रहने वाले लोग एक परिवार की तरह हो गए।
रात के समय अक्सर सब लोग बातें करते।
एक रात विनोद ने अचानक पूछा—
“आप लोगों को सबसे ज़्यादा किस चीज़ से डर लगता है?”
कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर सूरज ने धीरे से कहा—
“मुझे मरने से नहीं…
अपनी माँ को अकेला छोड़ने से डर लगता है।”
रामकिशोर बोला—
“मुझे डर है कि अगर मैं नहीं बचा…
तो मेरे बच्चों की पढ़ाई कौन करवाएगा?”
नसीम मुस्कुराया और बोला—
“मुझे बस इतना डर है कि मेरी दुकान बंद हो जाएगी…
और लोग कहेंगे—नसीम अच्छा आदमी था।”
यह सुनकर पूरे वार्ड में गहरा सन्नाटा छा गया।
धीरे-धीरे हर मरीज अपनी जीवन-कहानी सुनाने लगा।
रामकिशोर ने बताया कि कैसे उसने बचपन से मेहनत करके अपनी छोटी-सी खेती को संभाला।
नसीम ने बताया कि कैसे उसने एक सिलाई मशीन से अपनी जिंदगी शुरू की और धीरे-धीरे दुकान खड़ी की।
सरोजिनी देवी ने बताया कि उन्होंने 35 साल तक बच्चों को पढ़ाया और हजारों छात्रों को जीवन का रास्ता दिखाया।
विनोद ने भी अपनी कहानी सुनाई।
उन्होंने कहा—
“मैंने हमेशा सच बोलने की कोशिश की…
लेकिन कभी-कभी सच बोलने की कीमत बहुत बड़ी होती है।”
एक दिन अस्पताल में एक नई मशीन आई।
डॉक्टरों ने बताया कि इससे इलाज की संभावना पहले से अधिक हो सकती है।
वार्ड में अचानक एक नई ऊर्जा आ गई।
सूरज बोला—
“देखना… मैं ठीक होकर फिर से ऑटो चलाऊँगा।”
रामकिशोर हँसा—
“और मैं फिर से खेत में हल चलाऊँगा।”
नसीम बोला—
“और मैं नई दुकान खोलूँगा।”
विनोद चुपचाप मुस्कुराते रहे।
एक रात अचानक शरद बाबू की तबीयत बहुत खराब हो गई।
डॉक्टर और नर्सें दौड़ते हुए आए।
पूरी रात इलाज चलता रहा।
सुबह होते-होते उनकी साँसें धीमी पड़ गईं।
उन्होंने धीरे से कहा—
“ज़िंदगी… बहुत खूबसूरत थी…”
और उनकी आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।
वार्ड में गहरा सन्नाटा छा गया।
पहली बार सबको एहसास हुआ कि यह बीमारी कितनी गंभीर है।
उस घटना के बाद सबके अंदर कुछ बदल गया।
अब वे हर दिन को एक उपहार की तरह जीने लगे।
सूरज अपनी माँ को रोज़ हँसाने की कोशिश करता।
रामकिशोर अपने बच्चों को फोन करके पढ़ाई के लिए प्रेरित करता।
नसीम सबको गाने सुनाता।
सरोजिनी देवी सबको किताबें पढ़कर सुनातीं।
और विनोद…
विनोद एक डायरी लिखने लगे।
उन्होंने उसमें लिखा—
“यह वार्ड दुख का स्थान नहीं है…
यह जीवन का विद्यालय है।”
कुछ महीनों बाद विनोद की हालत भी बिगड़ने लगी।
डॉ. मेहरा ने उन्हें बुलाकर कहा—
“हम पूरी कोशिश कर रहे हैं…”
विनोद मुस्कुराए।
“डॉक्टर साहब…
मैं डरता नहीं हूँ।”
उन्होंने अपनी डायरी नसीम को दे दी।
“अगर मैं न रहूँ…
तो इसे छपवा देना।”
कुछ महीनों बाद वार्ड नंबर 7 में कई नए मरीज आए।
पुराने मरीजों में से कुछ ठीक होकर घर चले गए।
कुछ हमेशा के लिए इस दुनिया को छोड़ गए।
लेकिन वार्ड की दीवार पर आज भी एक वाक्य लिखा हुआ था—
“उम्मीद ही जीवन है।”
नसीम अब ठीक हो चुका था।
उसने विनोद की डायरी पढ़ी और उसे किताब के रूप में छपवा दिया।
किताब का नाम था—
“उम्मीद ही जीवन है।”
उसकी पहली पंक्ति थी—
“जब इंसान मृत्यु के सामने खड़ा होता है…
तभी उसे जीवन की असली कीमत समझ आती है।”
जमशेदपुर के उस अस्पताल में आज भी कैंसर वार्ड नंबर 7 मौजूद है।
नए मरीज आते हैं।
नई कहानियाँ जन्म लेती हैं।
लेकिन वहाँ काम करने वाली नर्स मीरा आज भी कभी-कभी कहती है—
“यह सिर्फ कैंसर वार्ड नहीं है…
यह वह जगह है जहाँ लोग जीवन का असली अर्थ सीखते हैं।”
और शायद यही सच्चाई है—
बीमारी शरीर को तोड़ सकती है…
लेकिन उम्मीद को नहीं।”
✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*








