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*”ज्ञान और धोखा।”*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

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*“ज्ञान और धोखा।”*

“वाराणसी की प्राचीन गलियों और घाटों के बीच, जहाँ गंगा की धारा के साथ ज्ञान की परंपरा भी सदियों से बहती चली आ रही है, वहीं काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के लंका क्षेत्र के पास एक पुराना तीन मंज़िला मकान था। उस मकान की तीसरी मंज़िल पर रहता था डॉ. राघवेंद्र त्रिपाठी—एक ऐसा व्यक्ति जिसके लिए दुनिया का सबसे बड़ा सत्य केवल किताबें थीं।
लोग कहते थे कि वह किताबों से बात करता है, किताबों के साथ खाता है, और शायद किताबों के बीच ही सोता भी है। उसके कमरे में लगभग पच्चीस हजार किताबें थीं—इतिहास, दर्शन, साहित्य, भाषाशास्त्र, पुराण, विज्ञान, सब कुछ।
राघवेंद्र के लिए मनुष्य से अधिक विश्वसनीय केवल ज्ञान था। लेकिन वही ज्ञान एक दिन उसकी विनाश की अग्नि बन जाएगा—यह उसे भी नहीं पता था।

राघवेंद्र बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में संस्कृत और दर्शन का प्रसिद्ध विद्वान था। उसने जीवन भर विवाह नहीं किया था। उसका मानना था—
*“मानव संबंध मन को भटकाते हैं, लेकिन पुस्तकें मन को मुक्त करती हैं।”*
वह सुबह चार बजे उठता, गंगा स्नान करता, तुलसी को जल देता और फिर किताबों के बीच बैठ जाता।
उसकी दुनिया तीन चीज़ों में सिमटी थी—
किताबें
अध्ययन
मौन
उसके पड़ोसी कहते थे कि उन्होंने उसे शायद ही कभी हँसते देखा हो।
राघवेंद्र को सबसे ज्यादा डर था—अपनी किताबों के खो जाने का।
वह हर किताब को नंबर देता, सूची बनाता और उसे लोहे की अलमारियों में सहेजकर रखता।
उसके लिए किताबें जीवित प्राणी थीं।

राघवेंद्र के मकान की देखभाल के लिए एक महिला आती थी—माया।
माया वाराणसी की एक झुग्गी बस्ती में पली-बढ़ी थी। वह चालाक, व्यावहारिक और महत्वाकांक्षी थी। उसने जल्दी ही समझ लिया कि यह प्रोफेसर दुनिया की वास्तविकताओं से लगभग अनजान है।
माया अक्सर सोचती—
“इतनी सारी किताबें… लेकिन इस आदमी को जीवन का ज्ञान नहीं।”
धीरे-धीरे उसने राघवेंद्र की दिनचर्या समझ ली। वह खाना बनाती, घर साफ करती और कभी-कभी किताबों की धूल भी साफ कर देती।
एक दिन उसने पूछा—
“बाबूजी, आप शादी क्यों नहीं करते?”
राघवेंद्र ने चश्मा ठीक करते हुए कहा—
“शादी से मनुष्य का ध्यान भटकता है। मेरे पास पहले से ही पर्याप्त साथी हैं।”
उसने अपनी अलमारी की ओर इशारा किया।
माया हँस पड़ी।

माया ने धीरे-धीरे राघवेंद्र के जीवन में अपनी जगह बना ली।
वह उसकी पसंद का खाना बनाने लगी, उसके कपड़े धोने लगी और कभी-कभी किताबों को भी व्यवस्थित करने लगी।
एक दिन उसने कहा—
“बाबूजी, अगर मैं यहाँ स्थायी रूप से रहूँ तो आपको सुविधा होगी।”
राघवेंद्र ने इस पर ज्यादा विचार नहीं किया।
कुछ ही महीनों में एक अजीब घटना हुई—
राघवेंद्र ने माया से विवाह कर लिया।
BHU परिसर में यह खबर फैल गई। लोग हैरान थे।
एक विद्वान, जिसने जीवन भर विवाह से दूरी बनाए रखी, अचानक अपनी घरेलू सहायिका से शादी कर लेता है।
लेकिन राघवेंद्र को लगा कि इससे उसका जीवन और व्यवस्थित हो जाएगा।
उसे यह नहीं पता था कि उसने अपने जीवन में अराजकता को आमंत्रित कर लिया है।

विवाह के बाद माया का व्यवहार धीरे-धीरे बदलने लगा।
अब वह अक्सर शिकायत करती—
“ये किताबें घर को कबाड़खाना बना रही हैं।”
“लोग आते हैं तो बैठने की जगह भी नहीं मिलती।”
राघवेंद्र को यह सुनकर क्रोध आता।
“ये किताबें मेरी आत्मा हैं।”
लेकिन माया व्यावहारिक थी। उसने सोचा—अगर ये किताबें बेच दी जाएँ तो लाखों रुपये मिल सकते हैं।
धीरे-धीरे उसने घर पर कब्ज़ा जमाना शुरू कर दिया।

माया का एक भाई था—गणेश।
वह एक चालाक आदमी था जो पुराने सामान और कबाड़ का व्यापार करता था।
माया ने उसे घर बुलाया।
गणेश ने किताबों का विशाल ढेर देखा और उसकी आँखें चमक उठीं।
“दीदी, ये तो खजाना है।”
उसने योजना बनाई—
राघवेंद्र को मानसिक रूप से अस्थिर साबित करके घर और किताबों पर अधिकार कर लिया जाए।

माया और गणेश ने धीरे-धीरे राघवेंद्र को परेशान करना शुरू कर दिया।
कभी किताबें इधर-उधर कर देते, कभी कुछ किताबें गायब कर देते।
राघवेंद्र पागलों की तरह उन्हें ढूँढता।
उसका मानसिक संतुलन धीरे-धीरे बिगड़ने लगा।
एक दिन उसने चिल्लाते हुए कहा—
“तुम लोग मेरी आत्मा को नष्ट कर रहे हो!”
माया ने पड़ोसियों से कहा—
“देखिए, ये पागल हो गए हैं।”

एक दिन राघवेंद्र घर छोड़कर निकल गया।
वह वाराणसी की गलियों और घाटों में भटकने लगा।
अस्सी घाट के पास उसकी मुलाकात एक अजीब आदमी से हुई—बबलू पहलवान।
बबलू एक ठेलेवाला था, लेकिन खुद को बड़ा दार्शनिक समझता था।
उसने राघवेंद्र से कहा—
“साहब, किताबें पढ़कर आदमी समझदार नहीं बनता।
जिंदगी जीकर बनता है।”
राघवेंद्र चुप रहा।
पहली बार उसे लगा कि शायद वह जीवन को समझ ही नहीं पाया।

इस बीच माया और गणेश ने घर पर पूरा कब्ज़ा कर लिया।
उन्होंने कई किताबें बेच दीं।
कुछ किताबें कबाड़ी को दे दी गईं।
जब राघवेंद्र वापस आया, तो उसने देखा—
उसका पूरा पुस्तकालय लूट लिया गया है।
वह भीतर से टूट गया।

उस रात राघवेंद्र ने अपनी बची हुई किताबों को देखा।
वह रो पड़ा।
उसने कहा—
“अगर ज्ञान का सम्मान नहीं, तो उसका अस्तित्व भी नहीं।”
उसने केरोसिन का डिब्बा उठाया और अपनी किताबों के ढेर पर डाल दिया।
फिर उसने आग लगा दी।
पूरा कमरा जल उठा।

आग की लपटें आसमान को छूने लगीं।
लोग दौड़े आए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
राघवेंद्र अपने पुस्तकालय के बीच बैठा था।
किताबें जल रही थीं।
और वह मुस्कुरा रहा था—
जैसे वह अपने सबसे प्रिय मित्रों के साथ अंतिम यात्रा पर जा रहा हो।

कुछ महीनों बाद उस मकान की जगह एक नई इमारत बन गई।
लोगों ने राघवेंद्र को लगभग भूल ही दिया।
लेकिन बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के आसपास के पुराने किताब बाजारों में आज भी कुछ लोग कहते हैं—
“एक पागल प्रोफेसर था, जो किताबों से इतना प्यार करता था कि उनके बिना जी नहीं पाया।”
और शायद यही इस कहानी का सबसे बड़ा प्रश्न है—
क्या ज्ञान मनुष्य को मुक्त करता है,
या कभी-कभी वही ज्ञान उसे कैद भी कर देता है?”

✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*