*”ज्वार और ज्वाला”*
“पूर्वी भारत के विशाल मैदानों में, जहाँ गंगा की सहायक नदियाँ धरती को सींचती थीं, वहाँ बिहार और झारखंड की सीमा पर बसा एक इलाका था—बिश्नुपुर परगना। इस भूमि की पहचान थी दूर-दूर तक फैले ज्वार के खेत। जब हवा चलती, तो वे खेत ऐसे लहराते मानो धरती ने सुनहरा चादर ओढ़ ली हो। बरसात में वे मिट्टी की गंध से भर जाते, और सर्दियों में सुनहरी धूप के नीचे उनका रंग अग्नि जैसा चमक उठता।
बिश्नुपुर के लोग गरीब थे, पर उनके भीतर अद्भुत जीवट था। खेती, पशुपालन, मेले, लोकगीत और संघर्ष—यही उनका जीवन था। पर इस जीवन पर दो परछाइयाँ मंडराती थीं—एक जमींदारों का अत्याचार, और दूसरी अंग्रेज़ी शासन की निर्दयता।
इसी भूमि में जन्मी थी एक युवती—चंद्रकला। उसका रंग गेहुँआ था, आँखें गहरी और चाल में अजीब आत्मविश्वास। गाँव की स्त्रियाँ कहतीं—“यह लड़की साधारण नहीं है, इसके माथे पर भाग्य लिखा है।” पर भाग्य हमेशा सरल नहीं होता।
चंद्रकला के पिता हरिनारायण साहू गरीब किसान थे। उनके पास थोड़ी-सी जमीन थी, जो सूखे और करों के कारण हर साल घटती जा रही थी। जब चंद्रकला सोलह बरस की हुई, पिता ने उसकी शादी तय कर दी। वर था पास के गाँव का एक धनी व्यापारी—धनपाल महतो। उसके पास तेल का कोल्हू, अनाज की कोठियाँ और साहूकारी का धंधा था। पर वह उम्र में चंद्रकला से दुगुना था और स्वभाव से कठोर।
चंद्रकला ने विरोध किया। उसने कहा,
“बाबूजी, मैं उस बूढ़े से विवाह नहीं करूँगी।”
हरिनारायण ने सिर झुका लिया।
*“बिटिया, गरीबी इंसान से बहुत कुछ छीन लेती है*।
यह विवाह नहीं, हमारे परिवार का सहारा है।”
और एक दिन डोली सज गई। ढोलक बजी, शहनाई गूँजी, और आँसुओं में भीगी चंद्रकला विदा हो गई।
बिश्नुपुर से धनपाल के गाँव तक जाने का रास्ता ज्वार के खेतों के बीच से गुजरता था। डोली उठाए चार कहार चले जा रहे थे। पीछे कुछ रिश्तेदार और आगे दो सिपाही। दोपहर का समय था, हवा गर्म और रास्ता सुनसान।
अचानक खेतों से पाँच घुड़सवार निकले। उनके चेहरों पर कपड़ा बँधा था, हाथों में लाठियाँ और तलवारें। आगे-आगे था उनका सरदार—वीरभान। लंबा कद, चौड़े कंधे और आँखों में आग।
कहार डर के मारे डोली छोड़ भागे। सिपाही भी जान बचाकर भाग निकले। रिश्तेदार चीखते हुए खेतों में छिप गए।
वीरभान ने डोली का पर्दा हटाया। भीतर बैठी चंद्रकला काँप रही थी।
“डरो मत,” वीरभान ने धीमे स्वर में कहा, “मैं तुम्हें बेचने नहीं आया हूँ, बचाने आया हूँ।”
चंद्रकला ने विस्मय से देखा।
वीरभान हँसा, “जिस धनपाल से तुम्हारी शादी हुई है, उसने आधे गाँव की जमीन हड़प ली है। आज उसकी नई दुल्हन मैं ले जा रहा हूँ। यह उसका दंड है।”
वह उसे अपने घोड़े पर बैठाकर ज्वार के समुद्र में गुम हो गया।
वीरभान डाकू था, पर केवल नाम का। असल में वह उन किसानों का नेता था जिन्हें जमींदारों ने उजाड़ दिया था। वह अमीरों से लूटकर गरीबों में बाँटता, अन्याय का विरोध करता और जंगलों में अपने साथियों संग रहता।
उसने चंद्रकला को एक पहाड़ी गाँव में पहुँचाया, जहाँ उसकी बूढ़ी माँ रहती थी।
“तुम स्वतंत्र हो,” उसने कहा, “यदि वापस जाना चाहो, चली जाओ। यदि यहाँ रहना चाहो, तुम्हारा सम्मान होगा।”
चंद्रकला ने कई दिन सोचा। फिर उसने पहली बार खुलकर साँस ली। यहाँ किसी ने उसे बोझ नहीं समझा, न वस्तु। उसने ठहरने का निर्णय किया।
धीरे-धीरे वीरभान और चंद्रकला के बीच प्रेम जन्मा। वह प्रेम गीतों से नहीं, संघर्ष और सम्मान से बना था। दोनों ने किसी मंदिर या पंडित के बिना, ज्वार के खेतों को साक्षी मानकर एक-दूसरे को जीवनसाथी स्वीकार किया।
बिश्नुपुर क्षेत्र में ज्वार से बनी देसी मदिरा प्रसिद्ध थी। चंद्रकला ने देखा कि वीरभान के लोग गरीब हैं और केवल लूट से जीवन नहीं चल सकता। उसने सुझाव दिया कि वे ज्वार से शराब बनाकर बेचें।
पुरानी भट्टी खरीदी गई। मिट्टी के बड़े घड़े, लोहे के कड़ाह, लकड़ी की आग और खेतों से कटकर आया ज्वार—सबने मिलकर एक नया व्यापार शुरू किया।
चंद्रकला की बुद्धि और वीरभान की मेहनत से भट्टी चल निकली। उनकी मदिरा का नाम पड़ा— अमृत पान। आसपास के गाँवों, मेलों और कस्बों तक उसकी माँग पहुँच गई।
लोग कहते, “यह केवल शराब नहीं, धरती की महक है।”
कुछ ही वर्षों में वीरभान गरीब डाकू से सम्मानित किसान-व्यापारी बन गया। उसने खेत खरीदे, मजदूरों को उचित मजदूरी दी, और गाँव में कुआँ खुदवाया।
समय बीता। चंद्रकला ने एक पुत्र को जन्म दिया—अर्जुन। बच्चे के आने से घर में नई रोशनी आ गई। वीरभान उसे कंधे पर बैठाकर खेतों में घूमता, और चंद्रकला लाला लल्ला लोरी गाती।
ज्वार के खेतों में अर्जुन दौड़ता, मिट्टी में खेलता और हवा से बातें करता। उसे लगता पूरी धरती उसकी मित्र है।
पर इतिहास सुख को अधिक देर तक टिकने नहीं देता।
सन् 1942 के आसपास का समय था। देश में आज़ादी की लहर उठ रही थी। गाँव-गाँव में लोग “भारत छोड़ो” के नारे लगा रहे थे। अंग्रेज़ सरकार बौखला उठी थी। पुलिस और फौज गाँवों में छापे मारती, लोगों को पकड़ती, अनाज जब्त करती।
बिश्नुपुर की भट्टी भी उनकी नजर में आ गई। अंग्रेज़ अफसर कैप्टन विल्सन ने संदेश भेजा—
“हर महीने शराब और कर दो, नहीं तो भट्टी बंद कर दी जाएगी।”
वीरभान ने इंकार कर दिया।
“यह मेहनत की कमाई है, लूट का कर नहीं देंगे।”
कैप्टन विल्सन ने दाँत पीसे।
गाँव में ही एक आदमी था—मुकुंद साव। वह पहले वीरभान का साथी था, पर लालच में अंग्रेज़ों से मिल गया। उसने भट्टी, हथियारों और छिपे रास्तों की सारी जानकारी दे दी।
एक रात जब चारों ओर सन्नाटा था, अंग्रेज़ सिपाहियों ने भट्टी को घेर लिया। गोलियाँ चलीं, आग लगी, लोग भागे।
वीरभान ने मुकाबला किया। हाथ में बंदूक, आँखों में ज्वाला। उसने कई सिपाहियों को पीछे हटाया। पर अंततः एक गोली उसके सीने में लगी।
चंद्रकला चीख उठी।
वीरभान गिरते हुए बोला,
“डरना मत… अर्जुन को झुकना मत सिखाना…”
और उसकी साँस थम गई।
भट्टी जलकर राख हो गई। लाल ज्वार के खेत धुएँ से भर गए।
वीरभान की मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों ने सब कुछ जब्त कर लिया। मजदूर बिखर गए, खेत छिन गए। पर चंद्रकला नहीं टूटी।
उसने अपने आँसू पोंछे, बेटे का हाथ पकड़ा और कहा,
“तेरे पिता मरे नहीं हैं। वे इस मिट्टी में हैं, इस हवा में हैं, इन खेतों में हैं।”
वह मजदूरी करने लगी, खेतों में काम किया, चक्की पीसी, दूसरों के घर अनाज कूटा। रात में अर्जुन को पढ़ाती, उसे वीरभान की कहानियाँ सुनाती।
“अन्याय सहना भी पाप है,” वह कहती।
अर्जुन बड़ा हुआ। उसके भीतर पिता की निर्भीकता और माँ की दृढ़ता थी।
एक दिन गाँव में खबर आई कि स्वतंत्रता सेनानियों का जत्था पास के जंगलों में छिपा है। वे अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं। अर्जुन उनसे मिलने गया।
वहाँ उसने नौजवानों को देखा—किसान, शिक्षक, चरवाहे, विद्यार्थी—सब हथियार और संकल्प के साथ तैयार।
उनके नेता ने पूछा,
“क्यों आए हो?”
अर्जुन ने उत्तर दिया,
“मेरे पिता अंग्रेज़ों की गोली से मरे थे। अब मेरी बारी है।”
वह दल में शामिल हो गया।
रातों में वे सरकारी गोदामों पर धावा बोलते, तार काटते, पुलिस चौकियों को परेशान करते। चंद्रकला बेटे को रोकती नहीं थी। बस उसके माथे पर हाथ रखकर कहती,
*“सच के लिए लड़ना, नफरत के लिए नहीं।”*
1945 की एक सुबह अंग्रेज़ फौज ने खबर पाई कि विद्रोही लाल ज्वार के खेतों में छिपे हैं। सैनिक बंदूकें लेकर पहुँचे।
पर खेत इतने घने थे कि भीतर कुछ दिखाई न देता। हवा चलती तो ज्वार की बालियाँ समुद्र की तरह हिलतीं।
अर्जुन और उसके साथी भीतर छिपे थे। उन्होंने खेतों को अपनी ढाल बना लिया। अचानक चारों दिशाओं से हमला हुआ। पत्थर, देसी बम, लाठियाँ, गोलियाँ। सैनिक घबरा गए।
कैप्टन विल्सन स्वयं आया। उसने चिल्लाकर कहा,
“सामने आओ, कायरों!”
अर्जुन खेतों से निकला।
“यह हमारी धरती है। कायर तुम हो, जो इसे लूटने आए हो।”
दोनों में मुठभेड़ हुई। संघर्ष के बीच अर्जुन ने विल्सन को परास्त कर दिया। सैनिक पीछे हट गए।
उस दिन बिश्नुपुर के लोगों ने पहली बार महसूस किया कि अंग्रेज़ अजेय नहीं हैं।
15 अगस्त 1947। गाँव के पुराने पीपल के नीचे तिरंगा फहराया गया। लोग रो रहे थे, हँस रहे थे, नाच रहे थे।
चंद्रकला ने आसमान की ओर देखा। उसे लगा जैसे वीरभान मुस्कुरा रहा है।
अर्जुन ने माँ के चरण छुए।
“आज हम आज़ाद हैं।”
चंद्रकला बोली,
“आज केवल राज बदला है बेटा, अब समाज बदलना बाकी है।”
स्वतंत्रता के बाद भी सब कुछ सरल नहीं हुआ। जमींदार अब नेता बन गए, अंग्रेज़ी अफसरों की जगह नए अधिकारी आ गए, और गरीब अब भी संघर्ष कर रहे थे।
अर्जुन ने राजनीति में जाने के बजाय खेती चुनी। उसने गाँववालों को संगठित किया, साझा कुएँ बनवाए, स्कूल खुलवाया, महिलाओं के लिए काम के अवसर बनाए।
चंद्रकला ने फिर से छोटी भट्टी शुरू की—पर अब शराब नहीं, ज्वार का आटा, लड्डू और पशुओं का चारा बनता था। उसने कहा,
“जिस चीज़ ने हमें जीवन दिया, अब वही समाज को पोषण देगी।”
वर्षों बीत गए। चंद्रकला बूढ़ी हो गई। उसके बाल सफेद, चाल धीमी, पर आँखें अब भी वैसी ही तेज थीं।
एक शाम वह अर्जुन के साथ ज्वार के खेतों में गई। हवा चल रही थी, बालियाँ झूम रही थीं। सूर्यास्त से पूरा खेत रक्तिम हो उठा।
चंद्रकला ने कहा,
“यहीं मेरी डोली रुकी थी… यहीं मैं पहली बार तेरे पिता से मिली थी… यहीं उनका खून गिरा था… और यहीं से हमारा जीवन फिर खिला।”
अर्जुन ने माँ का हाथ थामा।
“माँ, क्या तुम्हें कभी पछतावा हुआ?”
वह मुस्कुराई।
“जिस जीवन में प्रेम हो, संघर्ष हो, और सम्मान हो—उसमें पछतावा नहीं होता।”
कुछ दिनों बाद चंद्रकला बीमार पड़ी। गाँव के लोग, महिलाएँ, बच्चे, किसान—सब उसके घर आए। वह सबकी अपनी थी।
उसने अर्जुन को पास बुलाया।
“मुझे खेतों में ले चलो।”
उसे चारपाई पर उठाकर ज्वार के बीच लाया गया। हवा उसके चेहरे को छू रही थी।
उसने धीमे स्वर में कहा,
“धरती माँ… मैं लौट रही हूँ…”
और उसकी साँसें थम गईं।
पूरा गाँव मौन खड़ा रहा। हवा में ज्वार झूमता रहा, जैसे उसे विदाई दे रहा हो।
आज भी बिश्नुपुर में जब ज्वार के खेत हवा में लहराते हैं, बूढ़े लोग बच्चों को कहानी सुनाते हैं—एक लड़की की, जिसे मजबूरी में डोली में बैठाया गया; एक बागी की, जिसने उसे सम्मान दिया; एक स्त्री की, जिसने राख से जीवन बनाया; और एक बेटे की, जिसने आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी।
वे कहते हैं—
*“फसल केवल अनाज नहीं देती, स्मृतियाँ भी देती है*।
और कुछ खेत ऐसे होते हैं, जहाँ हर दाना इतिहास बनकर उगता है।”
ज्वार आज भी बिश्नुपुर की मिट्टी में उगता है। हर बाली में चंद्रकला की हिम्मत, वीरभान का विद्रोह, अर्जुन का स्वप्न और उस भूमि की अनश्वर आत्मा बसती है।
जब शाम को सूरज डूबता है, खेत सुनहरा हो उठते हैं—मानो धरती अब भी उन सबकी कथा दोहरा रही हो।”
*✍️ सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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