*“दिनकर : खेतों और खलिहानों में बसे देवताओं के कवि!..”*
“आरती लिए तू किसे ढूँढता है मूरख,
मंदिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
*देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।”*
— रामधारी सिंह ‘दिनकर’
कुछ कवि केवल कविताएँ नहीं लिखते, वे अपने समय की आत्मा को शब्द देते हैं। कुछ रचनाकार केवल साहित्य नहीं रचते, वे समाज के भीतर सोई हुई चेतना को जगाते हैं। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ऐसे ही कालजयी कवि थे, जिनकी लेखनी में राष्ट्र का स्वाभिमान, किसान का श्रम, मजदूर का पसीना, युवा का जोश और मानवता की करुण पुकार एक साथ सुनाई देती है।
दिनकर जी की कविता का सबसे बड़ा सौंदर्य यही है कि वह हमें केवल आसमान की ओर देखने के लिए प्रेरित नहीं करती, बल्कि अपने आसपास की धरती को पहचानने की दृष्टि भी देती है। उपर्युक्त पंक्तियों में वे एक गहरा सामाजिक और मानवीय संदेश देते हैं—यदि हम ईश्वर, महानता और सच्ची मनुष्यता की तलाश में हैं, तो हमें केवल भव्य मंदिरों, राजप्रासादों और धन-संपत्ति के तहखानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सच्चे देवत्व का निवास उस श्रम में है, जो खेतों में अन्न उगाता है; उस पसीने में है, जो खलिहानों को भरता है; और उन हाथों में है, जो राष्ट्र की नींव मजबूत करते हैं।
*दिनकर जी का साहित्य हमें बार-बार मनुष्य की गरिमा और श्रम के सम्मान की ओर लौटाता है।* उनके लिए राष्ट्र केवल सीमाओं का नाम नहीं था; राष्ट्र उन करोड़ों लोगों की सामूहिक चेतना था, जिनके श्रम, त्याग और संघर्ष से देश आगे बढ़ता है।
उनकी रचनाओं में वीरता है तो संवेदना भी है, राष्ट्रवाद है तो *मानवतावाद भी है, विद्रोह है तो आत्ममंथन भी है।* यही व्यापकता दिनकर को केवल एक युग का कवि नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भी कवि बनाती है।
आज जब हम आधुनिकता, तकनीक और विकास की तेज दौड़ में आगे बढ़ रहे हैं, तब दिनकर की पंक्तियाँ हमें यह स्मरण कराती हैं कि विकास का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक है, जब समाज के *अंतिम व्यक्ति के श्रम और सम्मान* को भी उसका उचित स्थान मिले।
किसान के खेत में लहलहाती फसल, मजदूर के माथे पर चमकता पसीना, सैनिक के साहस में राष्ट्र की सुरक्षा और युवा की आँखों में दिखाई देता भविष्य—यही वे जीवंत प्रतिमाएँ हैं, जिनमें दिनकर ने भारत की वास्तविक शक्ति को देखा था।
*दिनकर की जयंती* केवल एक महान कवि को स्मरण करने का अवसर नहीं, बल्कि उनके विचारों को अपने जीवन और समाज में उतारने का संकल्प लेने का दिन है।
*साहित्य जगत के उस सशक्त हस्ताक्षर* को शत्-शत् नमन, जिनकी ओजस्वी लेखनी का प्रकाश आने वाली पीढ़ियों को भी निरंतर आलोकित करता रहेगा।
*दिनकर अमर हैं*—क्योंकि उनके शब्दों में भारत की मिट्टी की सुगंध है, श्रम की गरिमा है और मानवता की धड़कन है।
*कालजयी कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी की जयंती पर शत्-शत् नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।*
सादर,
सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, आईओए (IOA)










