*और बस 15 दिन!..*
(आज इस *कहानी के 2 साल* हो गए!..)
✍️ लेखक : सुशील कुमार सुमन
हर वर्ष जब दिन थोड़े छोटे होने लगते हैं, हवाओं में हल्की-सी ठंडक उतरने लगती है और शरद ऋतु के आगमन की आहट महसूस होने लगती है, मेरे विचार अनायास ही मेरी दिवंगत माँ की ओर लौट जाते हैं।
*मेरी माँ असाधारण रूप से आशावादी थीं* —एक ऐसी अडिग और अटल आत्मा, जिसने जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ा। उम्र के साथ शरीर कमजोर होता गया, परिवार में मतभेद और कड़वाहटें आती रहीं, व्यक्तिगत संकटों ने उन्हें घेरा; लेकिन इन सबके बावजूद उनकी आँखों में भविष्य के लिए एक उजली किरण हमेशा जीवित रही।
उनकी आशा कोई साधारण आशा नहीं थी।
उन्होंने आशा को केवल महसूस नहीं किया, बल्कि उसे जिया था।
उनके हर छोटे-बड़े काम में उसका स्पंदन दिखाई देता था।
मुझे यह कैसे पता है?
उनके छोटे-छोटे, लेकिन बेहद अर्थपूर्ण व्यवहारों से।
उनके आशावाद का सबसे सुंदर रूप दुर्गा पूजा के दिनों में दिखाई देता था। दुर्गा पूजा उनके लिए महज एक धार्मिक उत्सव या परंपरा नहीं थी। वह उनके जीवन का उत्सव थी, उनकी आत्मा की खुशी थी, उनके इंतजार का सबसे खूबसूरत बहाना थी।
विसर्जन का दिन आता। माँ दुर्गा की विदाई होती। हम सबकी आँखें नम होतीं। मन में एक खालीपन उतर आता। लगता, जैसे माँ हमसे फिर एक वर्ष के लिए दूर चली गईं।
लेकिन मेरी माँ?
*जब हम विदाई के दुख में डूबे होते, तब उनकी आँखें अगले वर्ष की पूजा देखने लगती थीं।*
माँ दुर्गा की प्रतिमा जैसे ही जल में विलीन होती, मेरी माँ के मन में अगली पूजा का इंतजार जन्म ले लेता।
वह हल्की-सी मुस्कान के साथ कहतीं—
*“बस 364 दिन बचे हैं…”*
कितनी अद्भुत थीं मेरी माँ!
जहाँ हम विदाई देख रहे होते थे, वहाँ वह अगमन देख रही होती थीं।
जहाँ हमें एक वर्ष की दूरी दिखाई देती थी, उन्हें अगले मिलन की शुरुआत दिखाई देती थी।
परिवार के झगड़े हों, जीवन की परेशानियाँ हों या व्यक्तिगत संकट—उन्होंने हर परिस्थिति में दुर्गा पूजा को अपने संबल की तरह थामे रखा। माँ दुर्गा उनके लिए केवल आराध्य नहीं थीं; वे उनकी आशा थीं, उनका विश्वास थीं और शायद उनके जीवन का सबसे बड़ा सुख भी।
*और शायद अनजाने में उन्होंने वही उम्मीद मेरे भीतर भी उतार दी।*
इस वर्ष माँ की अनुपस्थिति में उनकी उपस्थिति मुझे पहले से कहीं अधिक महसूस हो रही है।
*शरद ऋतु आने से बहुत पहले ही मैंने भी दिन गिनने शुरू कर दिए थे।*
कुछ समय पहले मैं मृत्शिल्पी के पास गया। माँ दुर्गा की प्रतिमा अभी अधूरी थी। मिट्टी की उस प्रतिमा में देवी का पूर्ण रूप अभी प्रकट नहीं हुआ था, *लेकिन मूर्तिकार के कुशल हाथों में वह धीरे-धीरे आकार ले रही थीं।*
मैं देर तक उस प्रतिमा को देखता रहा।
अधूरी प्रतिमा में भी मुझे एक पूर्ण आस्था दिखाई दे रही थी।
वापस घर आया तो मन में एक उमंग थी। मैंने इसी वर्ष की दुर्गा पूजा के लिए अपना पहला लेख लिखा। लगभग 750 शब्दों का वह लेख मेरी अपनी अपेक्षाओं से छोटा था।
मुझे पता था—मैं उसे फिर लिखूँगा। उसमें कुछ और शब्द जोड़ूँगा, कुछ और भाव पिरोऊँगा, उसे उस पूर्णता तक ले जाऊँगा जिसकी शायद माँ मुझसे अपेक्षा करतीं।
लेकिन आज सुबह…
जब सूरज चमकते हुए आकाश में उभरा और सुनहरी रोशनी खिड़कियों से होकर कमरे में उतरने लगी, मेरे भीतर कुछ अचानक जाग उठा।
शायद वह रोशनी थी।
शायद शहर में शुरू हो चुकी पूजा की तैयारियों की हल्की-सी आहट।
या शायद…
माँ की वही आवाज़ थी, जो कहीं बहुत भीतर से मुझे पुकार रही थी।
मैं अपने उस अधूरे लेख को रोक नहीं पाया।
मन हुआ—आज इसे पूरा करने की कोशिश न करूँ। आज बस इसे लिख दूँ। क्योंकि कुछ भाव पूर्ण होने के लिए नहीं होते; वे बस कहे जाने के लिए होते हैं।
आज का दिन माँ को बहुत प्रिय होता था।
क्योंकि यही वह समय होता था जब उनका उत्साह अपने चरम पर पहुँच जाता था और वह हमें याद दिलाती थीं—
*“बस 15 दिन बचे हैं!”*
दुर्गा पूजा मेरे लिए भी अब केवल एक त्योहार नहीं रही।
हर वर्ष इसका अर्थ थोड़ा और गहरा होता जाता है।
यह केवल पूजा-पंडालों, रोशनी, ढाक की आवाज़, नए कपड़ों, प्रसाद और मेल-मिलाप का उत्सव नहीं है।
यह वह समय है जब हम—माँ दुर्गा की संतानें—अपने सारे अहंकार, अपनी सारी गलतियों, अपने सारे मतभेद और अपनी तमाम कमजोरियों के साथ उनके सामने खड़े होते हैं।
हम उनसे कुछ माँगते हैं।
कभी सुख।
कभी शांति।
कभी शक्ति।
कभी क्षमा।
और कभी-कभी केवल इतना चाहते हैं कि वे हमारे पास रहें।
आज की दुनिया अशांत है। चारों ओर शोर है, बेचैनी है, भ्रम है और नकारात्मकता है। ऐसे समय में निराशा को अपने भीतर जगह देना बहुत आसान है।
लेकिन ऐसे ही क्षणों में मुझे माँ की आवाज़ सुनाई देती है—
*“दिन गिनो… उम्मीद मत छोड़ो… माँ आएँगी।”*
उनका विश्वास था कि हम चाहे कितने भी बिखर जाएँ, कितने भी दूर हो जाएँ, माँ दुर्गा का आगमन हमें फिर एक साथ खड़ा कर सकता है।
क्योंकि माँ दुर्गा केवल हमारी पूजा स्वीकार करने नहीं आतीं।
वह हमें हमारे भीतर की शक्ति याद दिलाने आती हैं।
वह हमें याद दिलाती हैं कि अंधकार चाहे जितना गहरा हो, प्रकाश की प्रतीक्षा कभी व्यर्थ नहीं जाती।
जैसे-जैसे इस वर्ष की दुर्गा पूजा करीब आ रही है, मेरे भीतर की उत्सुकता भी बढ़ती जा रही है।
मेरे मन का एक कोना कहता है—
*इस बार कुछ अलग होगा।*
शायद कुछ बेहतर।
क्योंकि इस बार मैं भी वही कर रहा हूँ, जो मेरी माँ किया करती थीं।
*मैं दिन गिन रहा हूँ।*
एक-एक दिन।
एक-एक पल।
माँ के आने की प्रतीक्षा में।
और प्रिय पाठक, जब आप भी इस पूजा की तैयारी करें, तो माँ दुर्गा को केवल एक परंपरा की तरह मत देखिएगा।
उनके सामने विनम्र होकर जाइए।
अपने मन की सच्चाई लेकर जाइए।
क्योंकि माँ का आशीर्वाद अनंत है उन लोगों के लिए, जो श्रद्धा, प्रेम और विनम्रता के साथ उनकी शरण में आते हैं।
तो आइए…
इस बार हम सब मिलकर प्रार्थना करें।
प्रार्थना करें कि यह दुर्गा पूजा केवल उत्सव न बने, बल्कि हमारे भीतर कुछ बदल दे।
हमारे घरों में शांति आए।
हमारे रिश्तों में प्रेम लौटे।
हमारे मन से भय दूर हो।
हमारे भीतर आशा फिर जन्म ले।
और माँ दुर्गा की कृपा हम सब पर बनी रहे।
क्योंकि वह केवल मेरी माँ नहीं हैं।
वह केवल आपकी माँ नहीं हैं।
वह हम सबकी माँ हैं।
और शायद इस समय हमें उनकी पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है।
*जय माँ दुर्गा!*
जल्दी आओ माँ…
क्योंकि हम, आपके बच्चे, आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
ठीक वैसे ही जैसे मेरी माँ किया करती थीं।
आँखों में उम्मीद लिए,
मन में विश्वास लिए,
और होंठों पर वही मुस्कान लिए—
*“बस 15 दिन बचे हैं…”*
माँ चली गईं…
लेकिन उनका इंतजार नहीं गया।
उनकी आस्था नहीं गई।
उनकी उम्मीद नहीं गई।
और शायद यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है—
हर विदाई में अगले मिलन की उम्मीद रखना।
इसलिए आज भी मैं दिन गिन रहा हूँ।
एक-एक दिन…
एक-एक पल…
माँ दुर्गा के आगमन की प्रतीक्षा में।
*और बस 15 दिन शेष हैं!..*










