*“स्कूल के दिन !..”*
“दोपहर के ठीक *दो बजे थे।*
ड्यूटी से निकलकर मैं लंच के लिए जा रहा था। धूप तेज़ थी, सड़क पर वही रोज़मर्रा की भागदौड़, हॉर्न, धूल और लोग—सब कुछ वैसा ही जैसा हर दिन होता है। लेकिन तभी अचानक कुछ ऐसा दिखा, जिसने *समय की रफ्तार को जैसे थाम लिया।*
*एक स्कूटी मेरी आँखों के सामने से गुज़री।*
स्कूटी पर पाँच सवार।
मैं मुस्कुराया, फिर ठिठक गया।
*“अरे! ये तो…”*
दिमाग ने तुरंत कहा— *स्कूल के दिन* लौट आए।
थोड़ा आगे बढ़ा तो देखा—छह दोस्त एक ही चिप्स के पैकेट से खा रहे थे। कोई हिसाब नहीं, कोई *“तेरा-मेरा”* नहीं। बस *दोस्ती, भूख और ठहाके।*
और फिर जब मैं मणिकचंद स्कूल की तरफ़ बढ़ा, तो जो दृश्य देखा, उसने तो सीधे दिल पर दस्तक दे दी।
तीन दोस्त एक स्कूटी पर बैठे थे। उनमें से एक हाथ में केला लिए था। सामने एक गाय खड़ी थी।
वो गाय को केला खिला रहे थे…
और फिर शरारत!
केला दिखाकर गाय को ललचाया और स्कूटी आगे बढ़ा दी।
गाय भी भोली—केले के लालच में स्कूटी के पीछे-पीछे दौड़ पड़ी।
*“लड़कों की हँसी, गाय की चाल, सड़क की हलचल—सब मिलकर ऐसा लगा जैसे ज़िंदगी खुद खिलखिला रही हो।”*
थोड़ा और आगे गया तो मणिकचंद स्कूल के पास एक और दृश्य।
चार दोस्त।
*एक पुरानी स्कूटर।*
स्टैंड टूटा हुआ।
समाधान?
*नीचे एक पत्थर, उस पर कुछ ईंटें, और उस सहारे स्कूटर खड़ी।*
*मैं ज़ोर से हँस पड़ा।*
OMG!
*यही तो हम थे।*
बस, वहीं से यादों का सिलसिला शुरू हो गया।
*मेरा गाँव बनियारा।*
और *हाई स्कूल—हंसडीहा, जिला दुमका, झारखंड।*
करीब चार किलोमीटर का सफ़र।
हम स्कूल साइकिल से जाते थे।
वो साइकिल…
जिसकी घंटी से *ज़्यादा हमारी हँसी बजती थी।*
सुबह-सुबह घर से निकलते।
कभी देर हो जाती, तो मास्टर जी का डर।
कभी जल्दी निकलते, तो रास्ते में शरारत।
*साइकिल पर तीन-तीन दोस्त, कभी चार भी—हालाँकि मना था, लेकिन कौन मानता था?*
और फिर आता था टिफिन टाइम।
टिफिन का मतलब घर से लाया खाना नहीं होता था।
टिफिन का मतलब होता था— *बांके काका की दुकान।*
बांके काका की मुरी-घूघनी…
अरे, क्या स्वाद था!
*एक प्लेट में चार दोस्त।*
*मैं, नीलेश, राजेश और जीतू।*
किसी को ज़्यादा मिली, किसी को कम—पर किसी ने शिकायत नहीं की।
क्योंकि असली मज़ा खाने में नहीं, साथ में था।
कभी-कभी पैसे पूरे नहीं होते थे।
तो काका हँसकर कहते—
*“अरे पढ़ाई लिखाई करो, पैसे बाद में दे देना।”*
वो भरोसा… वो अपनापन… आज कहाँ मिलता है?
स्कूल से लौटते वक़्त अक्सर हंसडीहा चौक पर रुकते।
आधा किलो खीरा।
नमक-मिर्च।
*और साथ में—राजू और वरुण।*
पैसा किसका लगता था?
आज तक पता नहीं।
लेकिन सच्चाई ये है कि ज़्यादातर राजू का ही लगता था।
और वो कभी जताता नहीं था।
बस कहता—
*“खा ले यार, भूख लगी है।”*
अगर भूख ज़्यादा लग जाती, तो *नीलेश की मम्मी* का हाथ का खाना।
अरे!
वो दोपहर का लंच आज भी ज़ुबान पर है।
सादा, लेकिन दिल से बना।
कभी *नीरज के घर* भी लंच हो जाता था—वो भी लाजवाब।
मज़ेदार बात ये थी कि मेरे दो दोस्त निलेश और नीलेश थे।
नाम एक जैसा, लेकिन दोनों अलग दुनिया।
कभी एक के घर, कभी दूसरे के।
और कभी-कभी तो तीसरे निलेश के घर भी!
मेरा घर हंसडीहा से दो किलोमीटर दूर था, और स्कूल से चार।
इसलिए हर त्योहार पर सब मेरे घर पहुँच जाते।
*ख़ासकर सरस्वती पूजा।*
सरस्वती पूजा हमारे लिए किसी *अवतारित दुनिया* से कम नहीं थी।
*नए कपड़े, पूजा, प्रसाद, मेला, और दोस्त।*
पूरा इलाक़ा जैसे मुस्कुरा उठता था।
कभी-कभी मैं और राकेश—जिसका गाँव मेरे गाँव के पास था—कस्बे की तरफ़ जाते।
रास्ते में अक्सर मिलते थे रहीम खान।
*रहीम खान…*
गाय-भैंस की खाल का धंधा करता था।
हम बच्चों को देखकर उल्टा-सीधा बोलता, डराता।
हम भाग जाते, दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कता।
*आज सोचता हूँ, तो हँसी आती है।*
तब डर था, आज कहानी है।
*अजीब बात है—*
वो दौर आज भी कहीं न कहीं जारी है।
रूप बदल गया है, चेहरे बदल गए हैं,
लेकिन ज़िंदगी में रहीम खान जैसे किरदार आते ही रहते हैं।
आज सड़क पर उन बच्चों को देखकर मुझे लगा—
शायद अभी वेस्ट बंगाल बोर्ड की परीक्षाएँ चल रही हैं।
*परीक्षा के बाद की आज़ादी।*
वो बेफ़िक्री।
वो शोर।
वो खुशी।
*उन बच्चों की खुशी देखकर मैं खुद बहुत खुश हुआ।*
मन हल्का हो गया।
जैसे किसी ने दिल पर रखे बोझ को धीरे से हटा दिया हो।
घर पहुँचा—अपने बंगले में।
लेकिन मन अभी भी *बनियारा और हंसडीहा* के बीच कहीं अटका था।
तभी मोबाइल पर एक व्हाट्सएप मैसेज आया—
*गजोधर चाचा का।*
मैसेज पढ़ते ही फिर से रहीम खान याद आ गया।
वहाँ गाँव में राकेश था,
यहाँ शहर में डॉ. राजू है।
किरदार बदलते हैं,
नाम बदलते हैं,
*लेकिन ज़िंदगी की पटकथा लगभग वही रहती है।*
एक बात मैंने ज़िंदगी से सीखी है—
*तकलीफ़ कहीं भी हो, किसी की भी हो, दर्द उतना ही होता है।*
चाहे वो *रहीम खान* का दर्द हो,
या *गजोधर चाचा* की परेशानी।
ज़िंदगी किसी को *बख्शती नहीं,*
बस किसी को ज़्यादा अनुभव दे देती है।
और शायद *यही ज़िंदगी का सच है।”
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है—
हमारे पास ज़्यादा पैसे नहीं थे,
*लेकिन ज़्यादा ज़िंदगी थी।*
कम सुविधाएँ थीं,
लेकिन ज़्यादा रिश्ते थे।
आज सब कुछ है,
लेकिन वो साइकिल,
*वो मुरी-घूघनी,*
वो आधा किलो खीरा,
वो पाँच सवारी वाली स्कूटी,
वो गाय के पीछे भागती हँसी—
सब यादों में रह गया।
लेकिन शायद अच्छा ही है।
क्योंकि अगर वो सब आज भी होता,
*तो उसकी क़ीमत समझ नहीं पाते।*
डर आज भी है।
लेकिन अब समझ आया है—
*सही डर से ही जीत होती है।*
डर से भागना नहीं,
*डर को समझना ज़रूरी है।*
आज मैं दिल से कहता हूँ—
*थैंक यू डियर ज़िंदगी।*
*जो दिया, वो भी तेरा।*
*जो लिया, वो भी तेरा।*
*लव यू।..*
✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*










