*“अंतिम मुस्कान”*
“राजस्थान के मरुस्थल में बसे प्राचीन नगर प्रतापगढ़ की उस सुबह में अजीब सन्नाटा था। सूरज निकल चुका था, पर नगर की गलियों में सामान्य चहल-पहल नहीं थी। लोग घरों की चौखटों पर खड़े फुसफुसा रहे थे। किले के बाहर खुले मैदान में आज एक युवक को मृत्युदंड दिया जाना था—जहाँ दंड हाथी के पैरों तले कुचलकर दिया जाता था।
उस युवक का नाम था दामोदर। नगर में लोग उसे “दामो” कहते थे—एक अपराधी, लुटेरा, विद्रोही। वह वर्षों से राजसत्ता के विरुद्ध छोटे-छोटे विद्रोह करता आया था। कभी कारवाँ लूटता, कभी कर-वसूली करने वाले सिपाहियों पर हमला कर देता। उसकी आँखों में एक जंगली चमक थी—न क्रोध, न पश्चाताप—बस एक कठोर ठंडापन।
लेकिन उसी दिन, उसी मैदान में एक और व्यक्ति को भी मृत्युदंड दिया जाना था—सत्यनाथ।
सत्यनाथ… साधारण वस्त्र पहने, शांत मुख वाला, लोगों को प्रेम और क्षमा का संदेश देने वाला व्यक्ति। वह नगर-नगर घूमकर कहता था—
“मनुष्य का हृदय ही उसका असली मंदिर है। हिंसा से नहीं, करुणा से संसार बदलता है।”
सत्ता को उसका यह संदेश पसंद नहीं था। लोग उसे “पागल संत” कहते थे, पर उसके अनुयायी उसे ईश्वर का दूत मानते थे।
राजा के दरबार में भीड़ लगी थी। प्रथा थी कि उत्सव के दिन एक अपराधी को क्षमा दिया जाता। आज वही दिन था।
राजपुरोहित ने घोषणा की—
“दो अपराधियों में से एक को जीवनदान दिया जाएगा—दामोदर या सत्यनाथ।”
भीड़ में खुसर-पुसर हुई। अधिकांश लोग सत्यनाथ को निर्दोष मानते थे। कुछ दामोदर से डरते थे।
राजा ने भीड़ की ओर देखा—
“किसे मुक्त किया जाए?”
अचानक कुछ प्रभावशाली दरबारी और सैनिक जोर से चिल्लाए—
“दामोदर को छोड़ दो! उसे क्षमा का वरदान दो!”
भीड़ असमंजस में पड़ गई। कुछ लोग चुप रहे, कुछ ने समर्थन में सिर हिलाया।
और इस प्रकार निर्णय हुआ—
दामोदर मुक्त होगा।
सत्यनाथ को मृत्युदंड दिया जाएगा।
दामोदर स्तब्ध खड़ा था। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि जीवन ने उसे फिर मौका दिया है। वह देख रहा था—सत्यनाथ को बाँधा जा रहा है और उसे हाथी के पैरों के नीचे डालने की तैयारी हो रही है।
सत्यनाथ की दृष्टि एक क्षण के लिए दामोदर से मिली। उसमें न रोष था, न भय—सिर्फ करुणा।
मैदान में तीन हाथी खड़े थे। सत्यनाथ को बीच वाले हाथी के पैरों के नीचे रखा गया। दोनों ओर दो अन्य अपराधी थे।
आकाश धूल से भरा था। हवा में तपन और बेचैनी थी।
जब सिपाहियों ने संकेत दिया और हाथी के भारी पैर नीचे आए, भीड़ सिहर उठी। कुछ स्त्रियाँ रो पड़ीं। सत्यनाथ ने कराहते हुए भी कहा—
“हे प्रभु, इन्हें क्षमा करना। ये नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं।”
दामोदर भीड़ में खड़ा था। उसकी हथेलियाँ पसीने से भीग गईं।
“मैं क्यों जीवित हूँ? वह क्यों मर रहा है?”
सूर्य अचानक बादलों में छिप गया। सत्यनाथ ने अंतिम साँस ली।
और उसी क्षण, दामोदर के भीतर कुछ टूट गया।
मुक्त होने के बाद दामोदर अपने पुराने अड्डे पर लौट गया। उसके साथी खुश थे—
“दामो, तू तो बच गया! किस्मत ने साथ दिया!”
पर दामोदर चुप था। रात में उसे नींद नहीं आती। बार-बार वही दृश्य—सत्यनाथ की मुस्कान, उसकी करुणा भरी आँखें।
कुछ दिनों बाद वह सत्यनाथ के अनुयायियों से मिला। उनमें एक युवती थी—आराध्या। उसकी आँखों में अडिग विश्वास था।
आराध्या ने कहा—
“सत्यनाथ मरे नहीं हैं। वे हमारे भीतर जीवित हैं। उनका प्रेम अमर है।”
दामोदर हँस पड़ा—
“मरने वाला कैसे जीवित हो सकता है?”
आराध्या ने शांत स्वर में कहा—
“कभी अपने हृदय से पूछो।”
दामोदर का जीवन अब दो भागों में बँट गया था—
एक, उसका पुराना हिंसक स्वभाव।
दूसरा, सत्यनाथ की स्मृति।
वह चोरी-डकैती से दूर रहने लगा। उसके साथी उसे कायर कहने लगे।
एक रात वह अकेला मरुस्थल में निकल गया। चाँदनी में उसे लगा जैसे कोई उसके पीछे चल रहा हो। पर कोई नहीं था—सिर्फ भीतर की आवाज—
“दामोदर, तू क्यों भाग रहा है?”
वह घुटनों के बल बैठ गया।
“मैंने उसे मरने के लिए नहीं कहा!”
पर भीतर से उत्तर आया—
“पर तू जीवित है, और वह नहीं।”
नगर में लोग दामोदर को घृणा से देखते।
“यह वही है जिसे छोड़ दिया गया था,” वे फुसफुसाते।
एक दिन सिपाहियों ने सत्यनाथ के अनुयायियों को पकड़ लिया। आराध्या भी उनमें थी।
दामोदर के भीतर संघर्ष हुआ—
“क्या मैं फिर चुप रहूँ? जैसे उस दिन रहा था?”
रात के अँधेरे में वह कारागार पहुँचा। अपने पुराने कौशल से उसने ताला तोड़ा। सबको बाहर निकाला।
आराध्या ने पूछा—
“तुम क्यों आए हो?”
दामोदर ने उत्तर दिया—
“शायद इस बार मैं सही चुनाव करना चाहता हूँ।”
वह स्वयं पीछे रह गया। सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया।
उसी मैदान में, जहाँ कभी सत्यनाथ को दंड दिया गया था, अब दामोदर खड़ा था।
जब उसे हाथी के पैरों तले कुचलने के लिए बाँधा जा रहा था, उसने ऊँची आवाज में कहा—
“मैंने जीवन को व्यर्थ समझा था। पर किसी और के बलिदान ने मुझे सिखाया कि जीवन सेवा में है।”
भीड़ स्तब्ध थी।
हाथी के भारी पैर नीचे आए।
दामोदर ने आँखें बंद कीं। उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी—वैसी ही, जैसी कभी सत्यनाथ के चेहरे पर थी।
प्रतापगढ़ की हवाएँ आज भी उस कहानी को सुनाती हैं। लोग कहते हैं—
“दो व्यक्ति उस दिन मरे थे—एक जिसने प्रेम का संदेश दिया, और दूसरा जिसने अपराध से प्रेम तक की यात्रा की।”
कभी-कभी मुक्ति जीवन से नहीं, मृत्यु से मिलती है।
और कभी-कभी, किसी और का बलिदान ही हमारे भीतर के अंधकार को प्रकाश देता है।
✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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