*”अजीब विडंबना है !..”*
“आज जो कुछ लिख रहा हूँ, वह किसी दल-विशेष के समर्थन या विरोध में नहीं, बल्कि मेरे अपने अवलोकन पर आधारित है। मैं झारखंड के दुमका ज़िले के हंसडीहा प्रखंड के बनियारा गाँव का निवासी हूँ। मेरा लोकसभा क्षेत्र Godda है और विधानसभा क्षेत्र Poreyahat। बचपन से लेकर आज तक मैंने गोड्डा लोकसभा और उससे जुड़े विधानसभा क्षेत्रों की राजनीतिक हलचल को बहुत करीब से देखा है। अब ज़रा परिणामों पर नज़र डालते हैं।
पोड़ैयाहाट में लंबे समय तक Pradeep Yadav का दबदबा रहा—पहले JVM से और अब कांग्रेस से।
गोड्डा विधानसभा में वर्षों से भाजपा और राजद के बीच सत्ता का उतार-चढ़ाव चलता रहा।
जरमुंडी कभी निर्दलीय और कांग्रेस की ओर झुकी, तो हाल के चुनाव में भाजपा ने बाज़ी मारी।
मधुपुर में झारखंड मुक्ति मोर्चा की मज़बूत उपस्थिति दिखती रही है।
देवघर (SC) सीट पर पहले भाजपा का प्रभाव था, अब राजद ने जगह बनाई।
महागामा में कांग्रेस का लंबे समय तक दबदबा रहा, बीच में एक बार भाजपा ने भी जीत दर्ज की।
इन सबके बीच एक स्थायी तथ्य यह है कि Nishikant Dubey 2009 से लगातार गोड्डा लोकसभा के सांसद हैं। यह उनका चौथा कार्यकाल है। लोकसभा चुनाव में वे बार-बार जीतते रहे हैं—यह उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक क्षमता और संगठन कौशल को दर्शाता है।
परंतु विडंबना यह है कि जिन विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनावों में वे सक्रिय रूप से प्रचार करते दिखे, वहाँ भाजपा को अपेक्षित सफलता कम ही मिली। हाल में देवघर और गोड्डा नगर निकाय चुनावों में वे क्रमशः Reeta Chaurasiya और Anil Sah के साथ दिखे थे। परिणाम सबके सामने हैं।
इसी प्रकार पूर्व विधायक Narayan Das, Amit Mandal, Raj Paliwar और Ashok Bhagat जैसे नाम भी चुनावी परिदृश्य में रहे, पर भाजपा को लगातार व्यापक सफलता नहीं मिली। यहाँ तक कि पश्चिम बंगाल में भी उनके प्रचार के बाद परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं आए।
क्या यह केवल संयोग है?
क्या स्थानीय मुद्दे, संगठन की आंतरिक स्थिति, या उम्मीदवार चयन की रणनीति कहीं कमज़ोर पड़ जाती है?
या फिर मतदाताओं का मूड लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अलग-अलग होता है?
राजनीति में गणित और रसायन दोनों काम करते हैं—गणित यानी संगठन, जातीय-सामाजिक समीकरण और बूथ प्रबंधन; और रसायन यानी नेता और जनता के बीच भावनात्मक जुड़ाव। संभव है कि लोकसभा में यह रसायन काम कर जाता हो, पर विधानसभा में समीकरण बदल जाते हों।
कहा जाता है कि हालिया बिहार विधानसभा चुनाव में उन्हें अपेक्षाकृत कम सक्रिय भूमिका दी गई। क्या यह पार्टी की रणनीति थी या महज़ परिस्थितिजन्य निर्णय—यह कहना कठिन है।
लोकतंत्र में हार-जीत स्थायी नहीं होती। जनता अंतिम निर्णायक होती है। राजनीति में हर परिणाम एक संदेश देता है—कभी आत्ममंथन का, कभी रणनीति बदलने का, और कभी नेतृत्व के पुनर्मूल्यांकन का।
भविष्य में सब कुछ बेहतर हो—यही कामना है। पर वर्तमान परिदृश्य को देखकर मन से एक ही वाक्य निकलता है—
सच में, *“अजीब विडंबना है।”*
✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*










