Dastak Jo Pahunchey Har Ghar Tak

Share on facebook
Share on twitter
Share on whatsapp
Share on email

*”अरावली !.. एक अमर-प्रेम कथा”*

Share on facebook
Share on twitter
Share on whatsapp
Share on email
ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

*“अरावली !.. एक अमर-प्रेम कथा”*

“अरावली पर्वतश्रेणी…
भारत की आत्मा की तरह प्राचीन,
धैर्यवान, मौन और साक्षी।
इन पर्वतों ने सभ्यताओं को जन्म लेते देखा था,
प्रेम को पनपते देखा था,
और रक्त से सींचे गए विश्वासघात को भी।

दक्षिणी राजस्थान के “राजसमंद”–उदयपुर क्षेत्र में,
अरावली की ऊँची, घनी और वनाच्छादित पहाड़ियों के बीच
बसा था कुम्भलगढ़ गाँव।
यहीं रहते थे—
जमींदार भैरव सिंह और राघव सिंह—
मेहनतकश किसान,
मिट्टी से जुड़े हुए,
इज़्ज़त को जीवन से बड़ा मानने वाले।
उनकी छोटी बहन थी—
सुंदरवती,
जिसे सब प्यार से सुंदरी कहते थे।
अरावली की गोद में पली सुंदरी
स्वभाव से शांत,
नज़र में संकोच
और मन में गहराई लिए थी।

उसी अरावली का उत्तरी सिरा था—
मंगर गाँव,
दिल्ली–फरीदाबाद की सीमा पर स्थित।
जहाँ जैव-विविधता साँस लेती थी,
और जहाँ का हर वृक्ष
हज़ारों वर्ष पुरानी कथा कहता था।
मंगर में राज करता था
एक समृद्ध राजपूत परिवार—
जिसके मुखिया थे
जमींदार आनंद सिंह।
उनका छोटा पुत्र था—
पवन सिंह।

पवन और सुंदरी का प्रेम
अरावली की छाया में पनपा।
चुपचाप,
डरते हुए,
पर सच्चे मन से।
लेकिन प्रेम जब असहाय होता है,
तो सबसे पहले
नारी की देह को सज़ा मिलती है।
सुंदरी गर्भवती हुई।
और पवन—
डर गया।

वह पहले से ही
किसी और से
विवाह के बंधन में बँधा था।
जब भैरव और राघव
मंगर पहुँचे
और न्याय की माँग की,
तो पवन ने सब नकार दिया।
आनंद सिंह का निर्णय कठोर था—
“एक अविवाहित गर्भवती लड़की
हमारे घर की बहू नहीं बन सकती।
हमारी इज़्ज़त मिट्टी में नहीं मिल सकती।”
पवन की माँ रोई।
उसने कहा—
“मैंने सुंदरी को
घर के बाहर
अपने गर्भ का सत्य
पवन से कहते सुना है।”
पर आनंद सिंह नहीं पिघले।

कुम्भलगढ़ लौटकर
भैरव टूट गया।
उसने निर्णय लिया—
यह धरती अब उन्हें स्वीकार नहीं करेगी।
दिल्ली में
उनकी दूसरी बहन सपना रहती थी—
पति चरणदास
और पुत्र घनश्याम के साथ।

लेकिन इससे पहले
कि वे जा पाते—
सुंदरी
अपमान और पीड़ा में
अपने जीवन से हार गई।
उसकी चिता नहीं जली—
राघव का रक्त जल उठा।
वह सुंदरी का शव
पवन के विवाह मंडप में ले गया
और वहीं
पवन का अंत कर दिया।

उस दिन
दो परिवार नहीं—
दो पीढ़ियाँ
दुश्मन बन गईं।
राघव कारागार गया।
भैरव दिल्ली चला आया—
राघव की पत्नी सुमन
और पुत्र विजय को लेकर।
अरावली की छाया
अब दिल्ली तक फैल चुकी थी।

समय किसी के लिए नहीं रुकता।
अरावली की पहाड़ियाँ वहीं थीं—
स्थिर, मौन और साक्षी।
पर उनके बीच रहने वाले लोग
समय के साथ बदल चुके थे।
दिल्ली की भागती हुई ज़िंदगी में
विजय बड़ा हो रहा था।
उसकी आँखों में
माँ सुमन की चुप पीड़ा थी,
चाचा भैरव का संयम था,
और पिता राघव की अनुपस्थिति का
एक स्थायी खालीपन।
विजय पढ़ाई में तेज़ था,
पर उससे भी अधिक
वह संगीत में डूबा रहता।
तारों की तरह
सुर उसकी उँगलियों से निकलते
और सीधे दिल में उतरते।
चाचा भैरव कहते—
“यह लड़का
अरावली की मिट्टी लेकर पैदा हुआ है।”
विजय ने
दिल्ली के श्रेष्ठ शिक्षण संस्थान में
विद्युत अभियंत्रण की पढ़ाई पूरी की।
उस दिन
जब उसका विदाई समारोह था,
भीड़ में एक चेहरा
चुपचाप खड़ा था।

वह राघव था।
चौदह वर्षों की कैद
उसके चेहरे पर लिखी थी,
पर आँखों में
आज पहली बार
संतोष था।
वह छिपकर
अपने बेटे को देख रहा था—
जिसे उसने
चलना तक नहीं सिखाया था।

समारोह के बाद
विजय और घनश्याम
उसे घर ले आए।
वह मिलन
शब्दों से परे था।
पिता और पुत्र
रोए नहीं—
क्योंकि आँसू
बहुत पुराने थे।
धीरे-धीरे
राघव भी
जीवन की धारा में लौट आया।

वह भैरव और चरणदास के साथ
व्यवसाय में जुड़ा।
पर उसके मन का एक कोना
अब भी
अरावली में अटका था।
मंगर की यात्रा
एक दिन
व्यापारिक विवाद के कारण
विजय और घनश्याम
मंगर गाँव पहुँचे।

विजय को नहीं पता था
कि यह यात्रा
केवल मुकदमे की नहीं—
भाग्य की है।
मंगर की हवा में
अरावली की वही पुरानी गंध थी—
जैसी कुम्भलगढ़ में होती थी।

और तभी
विजय ने उसे देखा।
विजेता।
सफेद वस्त्र,
आँखों में आत्मविश्वास,
और चेहरे पर
ऐसी शांति
जो केवल
पर्वतों के पास रहने से आती है।
एक पल के लिए
विजय ठहर गया।

अरावली ने
फिर से साँस ली।
उस रात
विजेता का जन्मदिन था।
विजय ने
अनिच्छुक घनश्याम को मनाया
और दोनों
चोरी-छिपे समारोह में पहुँचे।
विजय ने अपना नाम बताया—
विनायक सिंह।
यह नाम
एक झूठ था,
पर भावना—
सत्य।
रणवीर सिंह
उससे मिलकर प्रसन्न हुआ,

पर सत्य
अधिक देर छुपा नहीं।
जब असली विनायक आया,
तो भ्रम टूटा।
विजय और घनश्याम
भाग निकले।
और उसी रात
अरावली ने तय कर लिया—
यह प्रेम
सरल नहीं होगा।

प्रेम का अंकुर
कुछ समय बाद
एक पर्यटन स्थल पर
विजय और विजेता
फिर मिले।
इस बार
नाम,
परिचय,
सब गौण थे।
केवल
दो मनुष्य थे।
धीरे-धीरे
दोस्ती
प्रेम में बदली।
विजय जान गया था—
विजेता

उसी घर की बेटी है
जिससे उसका रक्त जुड़ा है।
पर उसने
कुछ नहीं कहा।
वह सोचता था—
“सच कहूँगा
तो यह प्रेम मर जाएगा।”
पर नियति
खुद सच बनकर आई।
एक दिन
भोजन के दौरान

विजेता ने कहा—
“मैं रणवीर सिंह की बेटी हूँ,
मंगर से।”
राघव
जमीन पर बैठ गया।
उसने स्वीकार किया—
“मैंने
तुम्हारे चाचा की हत्या की थी।”
उस क्षण
अरावली
सिर झुकाकर
खामोश हो गई।

विजेता रोई।
विजय ने कहा—
“मैंने तुम्हें
भुलाने की कोशिश की थी,
पर असफल रहा।”
वह विदाई
अंत नहीं थी—
शुरुआत थी।

अरावली की हवाओं में
अब पहले जैसी निष्कलुषता नहीं थी।
वे जानती थीं—
प्रेम फिर जन्म ले चुका है,
और इस बार
उसके सामने दीवारें
और भी ऊँची हैं।
दिल्ली लौटकर
विजय और विजेता
खुद से अधिक
समय से लड़ रहे थे।

वे जानते थे—
यह प्रेम
दो परिवारों का नहीं,
दो पीढ़ियों का संघर्ष है।
फिर भी
वे चोरी-छिपे मिलते रहे।
कभी किसी पुस्तकालय में,
कभी किसी संगीत सभा में,
तो कभी
अरावली की परछाइयों में।

हर मुलाक़ात
एक जोखिम थी,
हर विदाई
एक युद्ध।
विजय के घर में
हवा बदल चुकी थी।
भैरव ने
उसकी आँखों में
वही जिद देखी
जो कभी
राघव की आँखों में थी।
उसने पूछा—
“सच बताओ,
क्या तुम रणवीर की बेटी से
प्रेम करते हो?”
विजय झुक गया।

उसने कहा—
“मैं उससे
केवल यह कहने गया था
कि यह प्रेम समाप्त हो।”
यह झूठ
परिवार को बचाने के लिए था,
पर आत्मा को
और घायल कर गया।

उधर
रणवीर सिंह
सब समझ चुका था।
उसने विजेता को
महाविद्यालय में
विजय के साथ देखा।
और एक दिन
घर में
फोन पर बातचीत भी
सुन ली।

उसका निर्णय
तलवार की तरह था—
“अब विवाह होगा,
और तुरंत।”
विजेता की सगाई
विनायक सिंह से तय कर दी गई।
उस दिन
विजेता की हँसी
मर गई।

रणवीर
दिल्ली पहुँचा।
उसने भैरव,
सुमन
और सपना के सामने
कठोर स्वर में कहा—
“अगर विजय
मेरी बेटी के आसपास
दुबारा दिखा,
तो मैं उसे
जीवित नहीं छोड़ूँगा।”

उस रात
विजय को
रणवीर के आदमियों ने
पीटा।
जब वह
लहूलुहान घर लौटा,
तो राघव ने
उसके घावों को नहीं—
उसकी आँखों को देखा।

उसे समझ आ गया—
यह प्रेम
अब रुकेगा नहीं।
पिता ने कहा—
“अगर जाना है,
तो पूरे सम्मान के साथ जाओ।
छिपकर नहीं—
पर लौटने की आशा
मत रखना।”

सगाई के दिन
विजय
अपने पिता की बाँहों में
रो पड़ा।
उसने कहा—
“मैं दुश्मन से
प्रेम कर बैठा हूँ।”
राघव ने
उसे गले लगाया।
उधर
विजेता
अपने ही घर में
कैद थी।

उसकी सहेली
कोकिला
उसके आँसू पोंछते हुए बोली—
“अगर आज नहीं गई,
तो जीवन भर
मरती रहोगी।”
रात होते-होते
विजेता
घर छोड़ चुकी थी।

घनश्याम
उसे विजय तक
ले आया।
विजय ने
उसे देखा—
और समझ गया—
अब निर्णय
अरावली करेगी।

भागने का निर्णय
वे दोनों
अनंगपुर की पहाड़ियों की ओर
चल पड़े।
वहाँ
एक वीरान किला था—
जहाँ समय
रुक जाता है।

विजेता ने कहा—
“क्या हम
गलत कर रहे हैं?”
विजय ने उत्तर दिया—
“अगर प्रेम गलत है,
तो मैं
सही नहीं बनना चाहता।”
अरावली ने
उन्हें शरण दी।

पहाड़ों ने
कुछ नहीं पूछा—
केवल
आशीर्वाद दिया।

अरावली की पहाड़ियाँ उस रात असामान्य रूप से शांत थीं।
हवा बह रही थी,
पर उसमें गीत नहीं था—
उसमें प्रतीक्षा थी।
अनंगपुर की पहाड़ियों के बीच स्थित
वह वीरान किला
अब केवल पत्थरों का ढाँचा नहीं था—
वह विजय और विजेता का स्वप्नलोक बन चुका था।
दिन के उजाले में
वे दोनों भविष्य की बातें करते—
सरल जीवन,
पेड़ों के बीच एक छोटा घर,
और वह दुनिया
जहाँ किसी का उपनाम
किसी के प्रेम से बड़ा न हो।
रात में
अरावली की हवाएँ
उन्हें आशीर्वाद देतीं।
पहाड़ जानते थे—
यह प्रेम सत्य है।
पर नफ़रत
पहाड़ों से भी ऊँची होती है
जब उसे
अहंकार सींचता है।

क्रोधित रणवीर सिंह
अख़बारों में
विजय का चित्र छपवाता है—
इनाम घोषित करता है।
विजेता का नाम वह नहीं लिखता,
क्योंकि उसे डर था—
समाज की लानत से।
जब चित्र राघव ने देखा,
तो उसकी आँखें फिर
वही कारागार बन गईं।

उसने कहा—
“अगर मेरी बहन के भाग्य की तरह
इस लड़की को कुछ हुआ,
तो अरावली
आज फिर खून देखेगी।”
उधर
रणवीर की माँ—
जिसने वर्षों पहले
सुंदरी की पीड़ा को
अनदेखा किया था—
आज काँप रही थी।
वह भैरव के घर पहुँची
और पहली बार
एक ठाकुर ने
हाथ जोड़कर कहा—
“इन बच्चों को बचा लो।”

पर समय
अब मनुष्य के हाथ में नहीं था।
उस दिन
विजय
विजेता के लिए
लकड़ियाँ लाने निकला।
पीछे से
हत्यारे आए—
रणवीर,
उसका बहनोई,
और भतीजा बलवीर।

विजय नहीं था,
तो रणवीर
विजेता के पास पहुँचा।
उसने कहा—
“मैं मान गया हूँ।
घर चलो।”
विजेता की आँखों में
सूरज उग आया।
उसने अरावली को धन्यवाद कहा।

उधर
हत्यारे
विजय का पीछा कर रहे थे।
उसी समय
राघव, भैरव, घनश्याम
और रणवीर की माँ
किले पहुँचे।
“विजय कहाँ है?”
प्रश्न हवा में गूँज गया।
विजेता
उसे खोजने निकल पड़ी।

और उसी क्षण—
जब गोली विजय के लिए चली—
किस्मत ने
विजेता को आगे कर दिया।
दो गोलियाँ।
अरावली काँप उठी।
विजेता
विजय की बाहों में गिर पड़ी।

उसकी साँसें
पहाड़ों में घुल गईं।
विजय ने
आसमान की ओर देखा—
जहाँ अब कोई उत्तर नहीं था।
उसने कहा—
“मैं तुम्हारे बिना
इस धरती पर नहीं रह सकता।”
और उसने
स्वयं को समाप्त कर लिया।
सूरज
अरावली के पीछे
डूब गया।
दोनों परिवार
दौड़ते हुए पहुँचे—
पर अब
केवल दो शरीर थे
और एक अमर प्रेम।

उस दिन से
अरावली का स्वर बदल गया।
लोग कहते हैं—
अब भी
अनंगपुर की पहाड़ियों में
रात के समय
दो परछाइयाँ
साथ चलती हैं।
क्योंकि—
जब भी अरावली में
प्रेम पनपा है,
उसने उसकी रक्षा की है।
इस बार
मानव ने भूल की।

पर विजय–विजेता ने
अरावली को
क्षमा कर दिया।
अब उनका प्रेम
भूगोल नहीं—
धरोहर है।

“जय ‘विजय–विजेता’!..”
“जय अरावली !..”

*✍️ सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, IOA
सेल, आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*