*“अहंकार से आत्मबोध तक”*
“मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में फैली हुई काली मिट्टी, दूर-दूर तक फैले खेत, और उनमें हवा के साथ लहराती सोयाबीन की फसल — यह दृश्य देखने में जितना शांत था, उतना ही गहरा था उसमें छिपा संघर्ष।
इस कहानी का केंद्र है — विवेक अग्रवाल।
विवेक एक बड़ा उद्योगपति था, मुंबई में उसका कारोबार फैला हुआ था — स्टील, रसायन, और रियल एस्टेट। लेकिन उसे हमेशा एक अलग तरह का शौक था — जमीन का मालिक बनना। उसे लगता था कि जमीन का मालिक होना, असली शक्ति का प्रतीक है।
इसी चाहत में उसने मालवा के एक गाँव — भवानीपुरा — के पास 200 एकड़ जमीन खरीद ली।
विवेक ने जब पहली बार उस जमीन को देखा, तो उसके चेहरे पर संतोष की मुस्कान थी।
“यही है… मेरी अपनी धरती,” उसने अपने मैनेजर अरुण से कहा।
अरुण ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया,
“सर, यहाँ खेती करना आसान नहीं है। मजदूरों के अपने तरीके हैं…”
विवेक ने बात काट दी,
“मैं उन्हें सिखाऊँगा। आधुनिक तकनीक लाऊँगा। यह जमीन अब मेरे हिसाब से चलेगी।”
लेकिन जमीन सिर्फ कागज पर खरीदी जाती है, दिलों में नहीं।
भवानीपुरा गाँव के लोग पीढ़ियों से उस जमीन पर काम करते आए थे।
उनमें सबसे बुजुर्ग था — रामलाल चौधरी।
रामलाल ने विवेक को पहली बार देखा, तो धीरे से बोला,
“बाबूजी, जमीन आपकी हो सकती है… पर इसकी आत्मा तो हम लोगों की है।”
विवेक हँस पड़ा,
“आत्मा-वात्मा कुछ नहीं होती, चौधरी जी। पैसा होता है, और वह मेरे पास है।”
रामलाल ने कुछ नहीं कहा।
बस मिट्टी उठाकर अपने हाथों में रगड़ ली।
विवेक ने शहर से ट्रैक्टर मंगवाए, ड्रिप इरिगेशन सिस्टम लगाया, और केमिकल खाद का इस्तेमाल शुरू किया।
उसने मजदूरों को सख्त नियमों में बाँध दिया —
समय पर आना, तय मजदूरी, और काम का हिसाब।
लेकिन गाँव के लोग अलग थे।
वे जमीन को सिर्फ काम नहीं, जीवन मानते थे।
किशन, एक युवा मजदूर, ने एक दिन कहा,
“साहब, ये केमिकल से मिट्टी खराब हो जाएगी।”
विवेक ने ठंडी नजर से देखा,
“तुम्हें खेती सिखाने की जरूरत नहीं है। जो कहा है, वही करो।”
विवेक अक्सर सप्ताहांत में अपने फार्महाउस आता था।
शानदार बंगला, स्विमिंग पूल, और चारों तरफ फैली हरियाली — सब कुछ था वहाँ।
लेकिन फिर भी…
कुछ खाली था।
रात को जब वह अकेला बैठता, तो दूर कहीं ढोल की आवाज आती, गाँव में कोई शादी या त्योहार होता।
वह खिड़की से बाहर देखता और सोचता —
“ये लोग इतने खुश कैसे रहते हैं?”
एक दिन खेत के किनारे काम करते हुए मजदूरों को मिट्टी में दबा हुआ एक कंकाल मिला।
सब डर गए।
रामलाल ने धीरे से कहा,
“यह कोई पुराना मामला लगता है… शायद किसी गरीब मजदूर की लाश है।”
विवेक ने तुरंत पुलिस को बुलाया।
पुलिस आई, देख-भाल की, और बोली,
“पुराना मामला है… शायद कोई बेघर आदमी रहा होगा।”
मामला वहीं दबा दिया गया।
लेकिन उस कंकाल ने जैसे जमीन की चुप्पी को तोड़ दिया था।
धीरे-धीरे विवेक को एहसास होने लगा कि जमीन उसके नियंत्रण में नहीं है।
मौसम अचानक बदल जाता, फसल खराब हो जाती, मजदूर बिना बताए छुट्टी पर चले जाते।
एक दिन उसने गुस्से में कहा,
“ये सब मेरी जमीन है! यहाँ सब कुछ मेरे हिसाब से होगा!”
तभी रामलाल ने शांत स्वर में कहा,
“बाबूजी, जमीन किसी की नहीं होती… हम सब उसके मेहमान हैं।”
विवेक का अपने परिवार से भी रिश्ता कमजोर था।
उसकी पत्नी नीरा मुंबई में ही रहती थी।
उनका बेटा रोहन विदेश में पढ़ता था।
एक दिन रोहन आया और बोला,
“डैड, आप ये सब क्यों कर रहे हैं? आपको खेती से क्या मिलेगा?”
विवेक ने कहा,
“यह मेरी पहचान है।”
रोहन ने जवाब दिया,
“पहचान जमीन से नहीं, लोगों से बनती है।”
गाँव में धीरे-धीरे असंतोष बढ़ने लगा।
मजदूरों को लगा कि उनकी परंपराएँ खत्म हो रही हैं।
एक दिन किशन और कुछ मजदूरों ने काम बंद कर दिया।
विवेक गुस्से में चिल्लाया,
“तुम लोग भूल रहे हो कि मैं तुम्हारा मालिक हूँ!”
किशन ने जवाब दिया,
“हम मजदूर हैं, गुलाम नहीं।”
उस साल मानसून असामान्य था।
लगातार बारिश हुई, और खेतों में पानी भर गया।
विवेक का सारा आधुनिक सिस्टम फेल हो गया।
फसल बर्बाद हो गई।
वह खेत के बीच खड़ा था, कीचड़ में डूबा हुआ, और पहली बार उसे लगा —
वह हार गया है।
कुछ दिनों बाद वही जगह, जहाँ कंकाल मिला था, फिर से खुल गई।
बारिश के कारण मिट्टी बह गई थी, और हड्डियाँ फिर से बाहर आ गईं।
रामलाल ने कहा,
“देखा बाबूजी… जमीन सब कुछ वापस ले लेती है।”
विवेक चुप रहा।
उसने पहली बार उस कंकाल को ध्यान से देखा —
वह कोई अनजान आदमी नहीं था,
वह उस जमीन का हिस्सा था।
धीरे-धीरे विवेक बदलने लगा।
उसने मजदूरों के साथ बैठना शुरू किया, उनकी बातें सुनना शुरू किया।
उसने केमिकल कम किया, पारंपरिक खेती को अपनाया।
और सबसे महत्वपूर्ण —
उसने यह स्वीकार किया कि वह इस जमीन का मालिक नहीं, सिर्फ एक हिस्सा है।
एक शाम, सूरज ढल रहा था।
विवेक खेत के किनारे बैठा था, और पास में किशन और रामलाल भी थे।
विवेक ने कहा,
“शायद मैं गलत था… जमीन को समझने में।”
रामलाल मुस्कुराया,
“समझने में समय लगता है, बाबूजी।”
किशन ने जोड़ा,
“और जमीन सबको सिखा देती है।”
विवेक ने मिट्टी उठाई, और पहली बार उसे महसूस किया —
न मालिक की तरह,
न उद्योगपति की तरह,
बल्कि एक इंसान की तरह।
यह कहानी सिर्फ एक आदमी की नहीं, बल्कि उस सोच की है जो मानती है कि पैसा और ताकत सब कुछ खरीद सकते हैं।
लेकिन सच यह है —
धरती खरीदी जा सकती है,
पर उसका दिल नहीं।
और अंत में,
हम सब उसी मिट्टी में मिल जाते हैं,
जिसे हम अपना समझते हैं।”
✍️ *सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर
#सुशीलकुमारसुमन
#युवा










