Dastak Jo Pahunchey Har Ghar Tak

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*”उलझन”*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

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*“उलझन”*

“मध्य भारत के मध्य प्रदेश के पहाड़ी अंचल में बसा एक शांत-सा नगर था — अमरपुर।
न तो वह बहुत बड़ा था, न बहुत छोटा।
सड़कें सँकरी थीं, पेड़ों की छाया गहरी थी, और शामें अक्सर एक अजीब-सी खामोशी ओढ़ लेती थीं।
यहीं कुछ महीनों पहले आकर रहने लगा था आरव त्रिपाठी।
दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ चुका, कुछ समय तक शोध किया, फिर अचानक सब छोड़कर इस छोटे नगर में आ बसा।

लोग कहते —
“शोध करने आया है।”
“कोई किताब लिख रहा है।”
“शायद किसी से भागकर आया है।”
लेकिन सच्चाई इन सबके बीच कहीं धुंधली-सी पड़ी थी।
आरव खुद भी नहीं जानता था कि वह यहाँ क्यों है।

अमरपुर की सुबहें शांत थीं।
तालाब के किनारे बैठकर आरव अक्सर अपनी डायरी में लिखता रहता।
वह स्थानीय जमींदार परिवार के इतिहास पर काम करने आया था।
पुराने कागज़, धूल से भरे रजिस्टर, टूटे हुए मकान — सब उसे आकर्षित करते थे।
लेकिन कुछ दिनों से उसे एक अजीब-सी अनुभूति होने लगी थी।
वह पार्क की बेंच पर बैठा था। सामने एक पीपल का पेड़ था।
हवा नहीं थी, फिर भी पत्तियाँ हल्की-सी काँप रही थीं।
अचानक उसे लगा —
यह पेड़ केवल पेड़ नहीं है।
यह बस है।
बिना किसी कारण के है।
उसने तने को देखा।
खुरदुरा, मोटा, स्थिर।
उसे अचानक भीतर से एक अजीब-सी बेचैनी ने घेर लिया।
जैसे यह पेड़, यह मिट्टी, यह बेंच — सब बिना कारण मौजूद हैं।
और वह स्वयं भी।
“मैं यहाँ क्यों हूँ?”
यह प्रश्न पहली बार नहीं उठा था।
लेकिन इस बार उसमें एक ठंडक थी।
उसे लगा जैसे चीज़ें अपने अर्थ खो रही हैं।
नाम केवल लेबल हैं।
पेड़, पत्थर, आदमी — सब बस अस्तित्व हैं।
और यह अनुभूति उसे भीतर तक हिला गई।

आरव ने अपने अतीत को याद करने की कोशिश की।
दिल्ली के दिन —
कॉफी हाउस की बहसें।
दोस्तों के साथ दर्शन पर चर्चाएँ।
प्रेम — जो अधूरा रह गया।
उसकी एक मित्र थी — नंदिनी।
तेज, संवेदनशील, और भविष्य को लेकर स्पष्ट।
नंदिनी कहती थी —
“जीवन को अर्थ देना पड़ता है, आरव।
वह अपने आप नहीं आता।”
तब आरव हँस देता था।
लेकिन अब अमरपुर की खामोशी में उसे वही शब्द गूँजते सुनाई देते।
क्या अर्थ वास्तव में गढ़ना पड़ता है?
या जीवन स्वयं में ही निरर्थक है?
उसने महसूस किया कि स्मृतियाँ भी उतनी ही अस्थिर हैं जितनी वर्तमान की वस्तुएँ।
वे भी बस घटित हुई घटनाएँ हैं।
उनमें कोई स्थायी सार नहीं।

अमरपुर में उसकी पहचान केवल एक व्यक्ति से थी —
मीरा सेन, जो नगर पुस्तकालय में काम करती थी।
मीरा शांत स्वभाव की थी।
वह आरव की डायरी के बारे में जानती थी, लेकिन कभी झाँकती नहीं थी।
एक दिन उसने पूछा —
“आप हमेशा इतने खोए हुए क्यों रहते हैं?”
आरव ने उत्तर दिया —
“क्योंकि मुझे लगता है कि जो कुछ भी है, उसका कोई कारण नहीं।”
मीरा मुस्कुरा दी।
“कारण खोजने की ज़रूरत किसने बताई?”
उस दिन आरव देर तक सोचता रहा।
क्या कारण केवल मानव निर्मित आवश्यकता है?
क्या संसार को हमारी व्याख्या की आवश्यकता है?
लेकिन उसके भीतर जो उलझन थी, वह केवल बौद्धिक नहीं थी।
वह शारीरिक थी।
उसे कभी-कभी सचमुच मितली-सी महसूस होती।
जैसे अस्तित्व स्वयं एक भारीपन बन गया हो।

एक शाम वह फिर तालाब के किनारे गया।
सूरज डूब रहा था।
पानी पर लालिमा तैर रही थी।
उसने एक पत्थर उठाकर पानी में फेंका।
लहरें बनीं।
फिर शांत हो गईं।
उसे लगा —
मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही है।
कुछ क्षणों की हलचल।
फिर शांति।
तो फिर संघर्ष क्यों?
इतिहास क्यों?
लेखन क्यों?
उसने डायरी बंद कर दी।
उस क्षण उसे लगा कि यदि वह यहाँ से चला जाए,
या यदि वह कल न रहे —
तो दुनिया पर कोई अंतर नहीं पड़ेगा।
यह विचार उसे भयभीत नहीं कर रहा था।
बस खाली कर रहा था।

रात को उसने अपने कमरे में आईने में खुद को देखा।
चेहरा वही था।
आँखें वही।
लेकिन उसे लगा जैसे वह किसी अजनबी को देख रहा है।
“मैं कौन हूँ?”
इतिहास का शोधकर्ता?
प्रेम में असफल व्यक्ति?
एक पलायनवादी?
या केवल एक शरीर जो साँस ले रहा है?
उसे अचानक समझ आया —
पहचान भी एक कहानी है।
हम अपने लिए जो कथा गढ़ते हैं, वही बन जाते हैं।
और यदि कथा छोड़ दें?
तो केवल अस्तित्व बचता है।

कुछ दिनों बाद मीरा ने पूछा —
“आप कब तक यहाँ रहेंगे?”
आरव ने उत्तर दिया —
“जब तक समझ न आ जाए कि रहना है या जाना।”
लेकिन उसी रात उसने महसूस किया —
समझ कभी पूरी नहीं होगी।
जीवन का कोई पूर्व-निर्धारित अर्थ नहीं है।
न ही कोई अंतिम निष्कर्ष।
यदि अर्थ है, तो वह उसके अपने चुनाव में है।
वह अगले दिन पुस्तकालय गया।
मीरा को कहा —
“मैं यहाँ रुकूँगा।
शोध पूरा करूँगा।
लेकिन इस बार अर्थ खोजने के लिए नहीं —
बल्कि उसे बनाने के लिए।”
मीरा ने केवल इतना कहा —
“शायद यही पर्याप्त है।”

अमरपुर वैसा ही रहा।
पेड़ वैसे ही खड़े रहे।
तालाब वैसे ही शांत रहा।
पर आरव के भीतर कुछ बदल गया था।
उसे अब भी कभी-कभी वही अजीब-सी मितली महसूस होती।
जब चीज़ें अपने अर्थ खो देतीं।
लेकिन अब वह उससे भागता नहीं था।
वह जान गया था —
अस्तित्व स्वयं में न तो सुंदर है, न कुरूप।
न सार्थक, न निरर्थक।
वह बस है।
और मनुष्य —
उस ‘होने’ के बीच अपना रास्ता चुन सकता है।
आरव ने अपनी डायरी के अंतिम पन्ने पर लिखा —
“जीवन मुझे दिया नहीं गया,
मैं उसे हर दिन चुनता हूँ।”
अमरपुर की सुबह फिर आई।
सूरज उगा।
पीपल के पत्ते हिले।
और इस बार आरव ने उन्हें देखकर मुस्कुराया।”

✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*