“अंडमान की सुबहें हमेशा समुद्र की लहरों के साथ जागती थीं। नीले आकाश के नीचे फैला अथाह सागर, नारियल और सुपारी के पेड़ों से ढके द्वीप, और उन सबके बीच खड़ा था ‘नीलराज’ प्राचीन राजमहल—एक ऐसा महल, जो समय की धूल ओढ़े आज भी अपने भीतर इतिहास, रहस्य और पीड़ा को समेटे हुए था।
इसी महल में रहती थीं राजमाता पद्मावती देवी। कभी पूरे अंडमान-निकोबार की राजनीति और राजपरिवार की रीढ़ मानी जाने वाली यह स्त्री अब पार्किंसन रोग से पीड़ित थीं। उनके हाथ अक्सर काँपते रहते, कदम लड़खड़ा जाते और स्मृतियाँ जैसे रेत की तरह फिसलती जातीं। वे वर्तमान को लगभग भूल चुकी थीं, लेकिन एक नाम था जो उनके होठों पर बार-बार आ जाता—
*महाराज कालसिंह।*
कालसिंह…
एक ऐसा नाम, जो कभी राजसत्ता का प्रतीक था और कभी भय का। कहा जाता था कि महाराज कालसिंह सिर्फ एक राजा नहीं, बल्कि महातांत्रिक थे—तंत्र, मंत्र और गूढ़ विद्या के अद्भुत ज्ञाता। वर्षों पहले वे अचानक लापता हो गए थे। कुछ ने कहा वे निर्वासन में हैं, कुछ ने कहा वे मर चुके हैं। लेकिन राजमाता के मन में वे आज भी जीवित थे—अपने उसी रौद्र, तेजस्वी और रहस्यमय रूप में।
राजमाता के साथ इस महल में रहता था उनका पोता—
विक्रमादित्य सिंह।
विक्रमादित्य का जीवन बाहरी तौर पर शांत था, लेकिन भीतर एक निरंतर उथल-पुथल चलती रहती थी। बचपन से उसने अपने दादा के बारे में कहानियाँ सुनी थीं—डरावनी भी, गौरवशाली भी। उसने अपनी दादी को रातों में बुदबुदाते देखा था—
*“कालसिंह लौट आओ…”*
यही शब्द उसके मन में आग की तरह जलते रहते।
एक दिन, जब समुद्र में भयानक तूफ़ान उठा और नीलराज महल की दीवारें हवा से काँपने लगीं, राजमाता ने अचानक विक्रमादित्य का हाथ थाम लिया। काँपती उँगलियों से उन्होंने बस इतना कहा—
*“वह… निकोबार में है… सिंहासन महल…”*
इतना कहकर वे बेहोश हो गईं।
यही वह क्षण था, जब विक्रमादित्य ने निर्णय कर लिया—
अब वह महाराज कालसिंह की सच्चाई जाने बिना नहीं रहेगा।
अगली सुबह वह निकोबार की ओर निकल पड़ा। समुद्री यात्रा आसान नहीं थी—तेज़ लहरें, अजनबी द्वीप, और अनजाने खतरे। रास्ते में उसे कई लोगों से मिलना पड़ा—कुछ मददगार, कुछ शत्रु।
इसी यात्रा में उसकी भेंट हुई वसुधा से।
वसुधा एक संन्यासिनी थी—सफेद वस्त्र, शांत आँखें और गहरी आध्यात्मिक दृष्टि। वह किसी आश्रम से जुड़ी थी और द्वीपों में घूम-घूमकर लोगों की सेवा करती थी। विक्रमादित्य को पहली नज़र में ही उसमें अजीब-सी शांति और आकर्षण महसूस हुआ। दोनों के बीच संवाद शुरू हुआ, और धीरे-धीरे वह संवाद मौन में बदलने लगा—ऐसा मौन, जिसमें भावनाएँ खुद बोलती हैं।
लेकिन यह यात्रा सिर्फ प्रेम की नहीं थी।
निकोबार के घने जंगलों के पास एक रात, जब विक्रमादित्य और वसुधा ने विश्राम के लिए पड़ाव डाला, तभी एक परछाईं आग के पास आई।
वह थी पद्मिनी—तेज़ आँखें, निडर चाल और रहस्यमय मुस्कान।
पद्मिनी ने स्वयं को परिचित कराया—
*“मैं अलीबाबा की पोती हूँ।”*
अलीबाबा… एक ऐसा नाम जो निकोबार और अंडमान में चोरी, चालाकी और रहस्य का पर्याय था।
पद्मिनी ने बताया कि उसे भी कालसिंह की तलाश है। उसके दादा अलीबाबा का मानना था कि निकोबार के किसी भूतिया महल में अपार शक्ति और खजाना छिपा है—और उस सबका केंद्र है बिरान सिंहासन महल।
हालाँकि विक्रमादित्य को उस पर पूरा भरोसा नहीं था, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें साथ चलने को मजबूर कर दिया।
बिरान सिंहासन महल
तीनों की खोज अंततः उन्हें निकोबार के एक सुदूर टापू पर ले आई—
जहाँ खड़ा था बिरान सिंहासन महल।
यह महल किसी शापित स्वप्न जैसा था। काले पत्थरों से बना, जंगली लताओं से घिरा, और भीतर से आती अजीब-सी गूँज। स्थानीय लोग सूर्यास्त के बाद यहाँ आने से डरते थे।
जैसे ही वे भीतर पहुँचे, दरवाज़े अपने आप बंद हो गए।
और तभी गूँजी एक भारी, ठंडी हँसी—
*“मोगैम्बो खुश हुआ…”*
परछाइयों से एक आकृति उभरी—
सिंहासन पर बैठा एक व्यक्ति, जिसकी आँखों में सत्ता का नशा और तंत्र की आग थी।
*वह ‘मोगैम्बो’ था।*
और वही ‘महाराज कालसिंह’ भी।
कालसिंह ने स्वयं स्वीकार किया—
वह कभी शिकार नहीं हुआ था।
वह स्वयं इस पूरी त्रासदी का शिल्पकार था।
उसने जानबूझकर खुद को दुनिया से गायब किया, तंत्र के माध्यम से अपनी पहचान बदली और वर्षों से इस महल से राज करता रहा—मोगैम्बो बनकर। उसका उद्देश्य सिर्फ एक था
विक्रमादित्य को यहाँ लाना।
तीनों को महल में कैद कर लिया गया। बाहर निकलने का हर रास्ता बंद था। महल जैसे जीवित था—दीवारें सुनती थीं, गलियारे साँस लेते थे।
आख़िरी उम्मीद के रूप में उन्होंने बुलाया भैरवनाथ को—एक प्रसिद्ध तांत्रिक विशेषज्ञ।
लेकिन मोगैम्बो की शक्तियों के सामने भैरवनाथ भी टिक न सका।
और भैरवनाथ हार गया!..
सब कुछ हार जाने के बाद, विक्रमादित्य टूट गया। लेकिन उसी क्षण उसके भीतर कुछ जाग उठा—
उसके रक्त में बहता राजवंश, उसकी आत्मा में छुपा सिंहासन।
वह अब सिर्फ विक्रमादित्य नहीं रहा।
वह बना—
महाराज विक्रमादित्य सिंह।
उसकी चेतना ने एक समानांतर संसार रच दिया। वास्तविकता मुड़ गई, समय ठहर गया। उसी आयाम में उसने मोगैम्बो उर्फ़ कालसिंह को परास्त किया।
कालसिंह गिर पड़ा।
सिंहासन महल खाली हो गया।
बिरान सिंहासन महल का अंधकार छँट गया।
लेकिन जाते-जाते परछाइयों में एक जोकर-सरीखा चेहरा दिखा—
जो हूबहू विक्रमादित्य जैसा था।
एक प्रश्नचिह्न।
*“बुरा मत बनो, अच्छा बनके राज्य करो, नहीं तुम्हारा भी मोंगाबो जैसा हाल होगा !..”*
इसके बाद पूरे अंडमान और निकोबार में महाराज विक्रमादित्य सिंह का राज्य स्थापित हुआ।
राजमाता पद्मावती देवी ने अपने पोते को सिंहासन पर देखा—और पहली बार उनके चेहरे पर शांति आई।
समय के साथ राजमाता पद्मावती देवी सामान्य होने लगी।
महाराज विक्रमादित्य सिंह का विवाह वसुधा से हुआ—संन्यास और संसार का अद्भुत मिलन।
और पद्मिनी—उसकी बुद्धि और साहस को देखते हुए—
उसे अंडमान-निकोबार राज्य की सेनापति बनाया गया।
लेकिन समुद्र आज भी कभी-कभी अजीब तरह से हँसता है…
मानो कोई कहानी अभी पूरी नहीं हुई हो।
*✍️ सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, IOA
सेल, आईएसपी, बर्नपुर
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*#युवा*





