*“रेत से उठी रोशनी”*
साल 1935 के आसपास की बात है। राजस्थान के बाड़मेर जिले के एक दूरस्थ रेगिस्तानी गाँव खारवानी में एक आदमी रहता था — भीखाराम चौधरी।
खारवानी… जहाँ दूर-दूर तक फैली रेत, तपती धूप, और लहराते टीले ही जीवन का हिस्सा थे। यहाँ जीवन आसान नहीं था। पानी सोने से भी ज्यादा कीमती था, और हर दिन प्रकृति से जंग लड़ने जैसा था।
भीखाराम का सपना बहुत बड़ा था, पर उसका जीवन बेहद साधारण। वह किसी के नीचे मजदूरी नहीं करना चाहता था। उसका विश्वास था —
“जिस दिन आदमी ने किसी का सहारा लिया, उसी दिन उसकी आज़ादी खत्म हो जाती है।”
यह वाक्य उसके जीवन का मंत्र था।
गाँव के लोग जमींदारों के खेतों में काम करते, बदले में थोड़ी मजदूरी पाते। पर भीखाराम को यह मंजूर नहीं था।
उसने वर्षों की मेहनत से जो थोड़ी-बहुत पूँजी जमा की थी, उससे गाँव से दूर एक सूखी, बंजर जमीन का टुकड़ा खरीद लिया।
वहाँ न पानी था, न पेड़, न छाँव — सिर्फ़ रेत और आँधी।
लोग हँसे।
“अरे भीखा! वहाँ तो परिंदा भी पानी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते मर जाए।”
पर भीखाराम की आँखों में चमक थी —
“यही मेरी आज़ादी की धरती है।”
उसकी पत्नी कमला शांत स्वभाव की थी। वह अपने पति के स्वाभिमान को समझती थी। पर कभी-कभी वह सोचती —
“क्या यह आत्मसम्मान है… या जिद?”
उनके दो बच्चे थे — मोहन और राधा।
दूसरा अध्याय: संघर्ष की शुरुआत
भीखाराम ने ऊँटों और भेड़ों का छोटा-सा झुंड पाला। दिन-रात वह रेगिस्तान में मेहनत करता। तपती धूप में, कड़कड़ाती सर्दी में — बिना शिकायत।
कमला घर संभालती, बच्चों को संस्कार देती।
गाँव वाले कहते —
“भीखाराम, थोड़ा समझौता कर ले। किसी ज़मींदार के साथ साझेदारी कर ले। पानी का इंतज़ाम हो जाएगा।”
पर उसका उत्तर हमेशा एक ही होता —
“मैं भूखा रह लूँगा, पर किसी के आगे हाथ नहीं फैलाऊँगा।”
उसकी मेहनत रंग लाने लगी। पशुओं की संख्या धीरे-धीरे बढ़ने लगी। पर तभी प्रकृति ने करवट बदली।
एक साल भयानक सूखा पड़ा।
कुएँ सूख गए।
घास खत्म हो गई।
जानवर मरने लगे।
भीखाराम की बचत खत्म हो गई।
कमला बीमार पड़ गई। दवाइयों के लिए पैसे नहीं थे। गाँव के वैद्य ने कहा —
“उधार में ले जा दवा। बाद में दे देना।”
पर भीखाराम ने इंकार कर दिया।
उसकी आँखों में आँसू थे, पर आवाज़ कठोर —
“हम अपना बोझ खुद उठाएँगे।”
कमला मुस्कराई।
“तुम्हारा स्वाभिमान ही तुम्हारी ताकत है भीखा… बस ध्यान रखना कि यही ताकत तुम्हें तोड़ न दे।”
कुछ ही दिनों बाद उसकी हालत बिगड़ गई।
एक रात भयानक आँधी चली। आसमान काला हो गया। रेत के बवंडर उठने लगे।
भीखाराम ने कमला को सीने से लगाया।
और तभी…
अचानक बादल गरजे।
गजब की बारिश शुरू हो गई।
रेगिस्तान की सूखी धरती पहली बार ऐसे भीगी जैसे वर्षों से रोके आँसू बह रहे हों।
सुबह तक कुएँ में पानी भर गया।
चारों ओर हरियाली की हल्की चादर दिखने लगी।
धीरे-धीरे भेड़ों, बकरियों और ऊँटों की संख्या फिर बढ़ने लगी।
और इस बार भीखाराम ने एक फैसला लिया —
वह कमला को शहर ले गया।
“अगर प्रकृति ने हमें दूसरा मौका दिया है… तो मैं भी जीवन को दूसरा मौका दूँगा,” उसने कहा।
कमला का इलाज हुआ। वह ठीक हो गई।
भीखाराम के भीतर जैसे खुशियों का पहाड़ खड़ा हो गया।
पर वह खुशियाँ भी उसने चुपचाप रेत में दबा दीं।
मोहन बड़ा हो रहा था। उसकी आँखों में शहर के सपने थे।
“बाबा, मैं पढ़ना चाहता हूँ… बड़ा आदमी बनना चाहता हूँ।”
भीखाराम चुप रहा।
उसके भीतर दो आवाजें थीं —
एक कहती, “बेटे को अपने पास रख।”
दूसरी कहती, “उसे उड़ने दे।”
अंततः उसने कहा —
“जा बेटा। अपने पैरों पर खड़ा होना सीख।”
मोहन शहर चला गया।
राधा भी पढ़ी-लिखी। उसकी शादी पास के गाँव के एक जमींदार परिवार में हुई।
कमला की आँखों में संतोष था।
साल बीत गए।
मोहन ने पढ़ाई पूरी की। नई तकनीक सीखी।
उसने बाड़मेर और बीकानेर के रेगिस्तानी इलाकों में पानी संरक्षित करने की नई तकनीक विकसित की।
एक दिन वह घर आया।
“बाबा, मैं एक कॉलेज खोलना चाहता हूँ… यहाँ के बच्चों के लिए।”
भीखाराम चौंका।
“कौन सा कॉलेज?”
मोहन ने गर्व से कहा —
“भीखाराम देहरी टेक्नोलॉजी कॉलेज, बीकानेर।”
भीखाराम की आँखें भर आईं।
जिस आदमी ने कभी किसी के आगे सिर नहीं झुकाया… आज उसके नाम से शिक्षा का मंदिर बन रहा था।
अब भीखाराम की दाढ़ी सफेद हो चुकी थी। कमला भी बूढ़ी हो गई थी।
एक दिन वह ऊँट के सहारे खड़ा था और दूर क्षितिज को देख रहा था।
रेगिस्तान की हवा आज कुछ अलग थी।
उसे पहली बार एहसास हुआ —
“क्या सच में मैं स्वतंत्र था? या अपने अहंकार का कैदी?”
उसने जीवन को याद किया।
हाँ, उसने कभी भीख नहीं माँगी।
हाँ, उसने किसी के आगे सिर नहीं झुकाया।
पर उसने अपने परिवार को भी एक नया रास्ता दिया।
उसकी जिद ने बच्चों को आत्मनिर्भर बनना सिखाया।
उसकी मेहनत ने मोहन को प्रेरणा दी।
उसकी स्वतंत्रता ने पूरे क्षेत्र को शिक्षा दी।
वह मुस्कराया।
“स्वतंत्रता अच्छी है…
पर अगर वह हमें आगे ले जाए,
हमारे अपनों को ऊँचाई दे,
तो वही सच्ची स्वतंत्रता है।”
कमला उसके पास आकर खड़ी हो गई।
“देखो भीखा… तुम्हारी रेत अब रोशनी बन गई।”
दूर कहीं कॉलेज की इमारत चमक रही थी।
रेगिस्तान की सूखी धरती अब ज्ञान की हरियाली से भर रही थी।
यह कहानी केवल भीखाराम की नहीं है।
यह हर उस इंसान की कहानी है जो संघर्ष करता है, गिरता है, उठता है, और फिर अपनी मेहनत से दुनिया बदल देता है।
स्वाभिमान जरूरी है।
आत्मनिर्भरता जरूरी है।
पर उससे भी ज्यादा जरूरी है —
अपने सपनों को दूसरों की रोशनी बना देना।
रेत में बीज बोने वाले को पागल कहा जाता है।
पर जब वही बीज पेड़ बन जाता है,
तो इतिहास उसे दूरदर्शी कहता है।
भीखाराम चौधरी कोई राजा नहीं था।
कोई बड़ा जमींदार नहीं था।
वह एक साधारण आदमी था —
जिसने असाधारण सोच रखी।
और यही सोच
रेत से उठी रोशनी बन गई।”
✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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