*“सच का धर्म !..”*
“‘सम्मान’ शब्द नहीं,
एक खड़ा हुआ मनुष्य है—
जिसकी आँखों में झुका हुआ आकाश नहीं,
सीधी खड़ी धरती होती है।
‘अधिकार’ कोई दान नहीं,
यह साँस की तरह स्वाभाविक है,
जो छीनी जाए
तो जीवन ‘असहज’ हो जाता है।
‘न्याय’ अदालत की दीवारों में
कैद कोई फ़ाइल नहीं,
यह उस अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति की
काँपती ‘उम्मीद’ है।
‘असहमति’ अपराध नहीं,
यह लोकतंत्र की धड़कन है,
जो चुप हो जाए
तो व्यवस्था शव बन जाती है।
‘हाशिए की आवाज़ें’
फुसफुसाती नहीं—
उन्हें जानबूझकर
अनदेखा किया जाता है।
‘संस्कृति’ केवल पर्व नहीं,
यह स्मृति की मिट्टी में
गड़ा हुआ ‘अस्तित्व’ है,
जिसे मिटाने के लिए
इतिहास बार-बार जलाया गया।
जो ‘असहज’ करता है
वही सच होता है,
और ‘सच’ अक्सर
आरोप बनकर ही
सत्ता के दरवाज़े पर पहुँचता है।
“लेखन’ फूलों का हार नहीं,
यह घावों पर रखा गया
नमक भी है,
क्योंकि
लेखन का सबसे बड़ा धर्म है—
सच कहना।
इसीलिए उस पर
‘आरोप’ सबसे पहले लगते हैं,
और उसे सबसे पहले
किनारे किया जाता है।
“महाश्वेता देवी”
शब्दों से नहीं,
सच से डर पैदा करती हैं—
सत्ता के लिए,
समाज की झूठी शांति के लिए।
आज जब साहित्य
पुरस्कारों की चमक,
बाज़ार की तालियों
और लोकप्रियता की गिनती में
सिमटता जा रहा है !…
“मेरी लेखनी
‘महाश्वेता देवी’ की याद दिलाती है,
कि लेखक का काम
मन बहलाना नहीं,
बल्कि
सम्मान, अधिकार और न्याय
के पक्ष में
खड़ा होना है।
क्योंकि अंततः—
लेखन का सबसे बड़ा धर्म है
सच कहना।”
*महाश्वेता देवी जी की जयंती पर उन्हें शत-शत् सादर नमन।*
*✍️ सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, IOA
सेल, आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*










