*“सूरज फिर भी उगेगा”*
सन् 1927 का समय था। प्रथम विश्वयुद्ध की विभीषिका को समाप्त हुए कुछ ही वर्ष बीते थे, किंतु उसके घाव अभी भी ताज़ा थे। संसार भर के युवाओं के हृदय में एक अनजाना शून्य घर कर गया था। किसी ने अपने प्रियजनों को खोया था, किसी ने अपने आदर्शों को, तो किसी ने अपने भीतर की उमंग और विश्वास को। भारत भी उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला में तप रहा था। युवा पीढ़ी के भीतर असंतोष की लहर थी—एक ओर अंग्रेज़ी हुकूमत के विरुद्ध, तो दूसरी ओर अपने जीवन की दिशाहीनता के कारण।
इन्हीं परिस्थितियों में यह कथा जन्म लेती है—कुछ ऐसे युवाओं की, जो युद्ध और समय की मार से टूटे मन लेकर जीवन के अर्थ की तलाश में भटक रहे थे।
प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) की सर्द शामों में एक अनोखी गरिमा थी। गंगा और यमुना के पावन संगम के समीप बसा यह नगर साहित्य, राजनीति और प्रेम की संवेदनाओं से धड़कता था। वहीं रहता था अद्वैत त्रिपाठी—एक युवा पत्रकार। युद्ध के दिनों में वह ब्रिटिश भारतीय सेना के लिए संवाददाता बनकर विदेश गया था। उसने बंदूक नहीं उठाई, पर जो दृश्य उसकी आँखों ने देखे, उन्होंने उसके भीतर की मासूमियत को चकनाचूर कर दिया।
अब वह “सारथी” नामक हिंदी दैनिक में कार्यरत था। दिन भर वह समाचार लिखता, और रात को सिगरेट के धुएँ के बीच अपने बिखरे विचारों को समेटने का प्रयास करता। उसका घनिष्ठ मित्र था विराज मेहता—एक समृद्ध व्यापारी परिवार का बेफ़िक्र युवक, जो जीवन को केवल उत्सव मानकर जीना चाहता था।
उन दोनों के जीवन में तीसरी कड़ी थी नैना कपूर—दिल्ली के एक उच्चाधिकारी की पुत्री। आधुनिक, आकर्षक, आत्मविश्वासी, पर भीतर से गहराई तक अस्थिर। उसके व्यक्तित्व में एक चुंबकीय आकर्षण था, जिससे कोई भी अछूता नहीं रह पाता। अद्वैत उससे निस्सीम प्रेम करता था—गंभीर, सच्चा और मौन प्रेम। किंतु वह जानता था कि उसका यह प्रेम पूर्णता नहीं पा सकता।
युद्ध के दौरान हुए एक दुर्घटना ने अद्वैत को शारीरिक रूप से अपूर्ण बना दिया था। वह सामान्य दांपत्य जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता था। यह रहस्य केवल नैना जानती थी। यही वह अदृश्य दीवार थी, जो उन्हें पास होकर भी दूर रखती थी—स्नेह की निकटता, पर पूर्णता का अभाव।
कुछ समय पश्चात् वे सभी दिल्ली आ बसे। नई दिल्ली तब नव-निर्मित हो रही थी। कनॉट प्लेस के श्वेत स्तंभों के बीच अंग्रेज़ी सभ्यता की चकाचौंध थी। क्लबों की रोशनी और संगीत में नई पीढ़ी अपने दुःखों को भुलाने का प्रयत्न करती।
इसी बीच नैना का विवाह राघव सूद से हो गया—एक संपन्न पर मदिरा-प्रिय उद्योगपति। राघव आकर्षक अवश्य था, पर भीतर से खोखला। हर रात शराब और हर शाम विवाद उसकी आदत थी। नैना के जीवन में वैवाहिक बंधन तो था, पर प्रेम का स्पर्श नहीं।
एक संध्या वे सब “इम्पीरियल क्लब” में एकत्र हुए। विराज ने हँसते हुए कहा, “दिल्ली की यह घुटन सहन नहीं होती। कहीं दूर चलें।”
नैना ने प्रस्ताव रखा, “क्यों न राजस्थान चला जाए? जयपुर या जोधपुर… सुना है वहाँ इन दिनों भव्य मेला लगा है।”
अद्वैत चुप रहा। वह जानता था कि स्थान परिवर्तन से मन की रिक्तता नहीं भरती। फिर भी उसने सहमति दे दी।
रेलगाड़ी की यात्रा आरंभ हुई। खिड़की के बाहर दृश्य बदलते गए—हरी-भरी धरती से सुनहरी मरुभूमि तक। वे जोधपुर पहुँचे—नीले रंग से सजा शहर, जहाँ मेहरानगढ़ का दुर्ग आकाश से संवाद करता प्रतीत होता था। उनके साथ शेखर नंदा भी था—एक असफल कवि, जिसकी कविताओं में दर्द अधिक था, प्रशंसा कम। और तपन सेन—युद्ध से लौटा एक सैनिक, जिसकी आँखों में अब भी गोलियों की चमक तैरती थी।
सभी अपने-अपने घावों को भीतर छिपाए हुए थे।
जोधपुर में वार्षिक पशु-मेला और पारंपरिक सांड-प्रतियोगिता का आयोजन हो रहा था। उसी मेले में उन्होंने देखा किशन चौधरी को—उन्नीस वर्ष का निर्भीक युवक। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास की आभा थी। जीवन की ऊर्जा उसकी हर चाल में झलकती थी।
नैना की दृष्टि उसी पर टिक गई। अद्वैत ने पहली बार अपने भीतर ईर्ष्या की लपट महसूस की। उसे लगा, किशन में वही जीवन-रस है, जो उससे छिन गया था।
दिन में मेले की चहल-पहल, रात में संगीत और मदिरा का वातावरण। नैना कभी विराज के साथ हँसती दिखती, तो कभी किशन के साथ घूमती। राघव भले दिल्ली में था, पर उसका साया अब भी नैना के जीवन पर था।
एक रात नैना ने अद्वैत से पूछा, “तुम मुझे रोकते क्यों नहीं?”
अद्वैत ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “किस अधिकार से?”
नैना की आँखें नम हो उठीं—“काश, सब कुछ सामान्य होता।”
दोनों समझते थे कि यह ‘सामान्य’ शब्द कितना भारी है।
मेले के अंतिम दिन किशन ने अद्भुत प्रदर्शन किया। दर्शकों की तालियाँ गूँज उठीं। उसी उत्साह में नैना उसके साथ चली गई। कुछ दिनों बाद वह लौटी—मौन, थकी हुई। किशन अपने गाँव लौट चुका था। उसके लिए यह केवल एक साहसिक प्रसंग था। नैना के लिए—शायद एक और भ्रम।
समय बीतता गया। विराज बंबई चला गया। शेखर ने निराशा में आत्महत्या का प्रयास किया, पर बच गया। तपन पुनः सेना में लौट गया। नैना ने अंततः राघव से नाता तोड़ लिया और दिल्ली लौट आई। अद्वैत प्रयागराज आ गया।
कुछ महीनों पश्चात् नैना उससे मिलने आई। दोनों संगम के तट पर बैठे थे। अस्त होते सूर्य की किरणें जल पर बिखर रही थीं।
नैना ने धीमे स्वर में पूछा, “यदि सब कुछ अलग होता… तो?”
अद्वैत मुस्कराया, “तो शायद हम प्रसन्न होते। पर देखो, नैना—सूरज तो फिर भी उगता है। हमारे सुख-दुःख से परे।”
नैना ने उसका हाथ थाम लिया। दोनों जानते थे—उनका प्रेम अधूरा रहेगा, किंतु जीवन रुकता नहीं।
अगली सुबह प्रयागराज में सूर्य की प्रथम किरण गंगा पर पड़ी। अद्वैत ने अपनी डायरी में लिखा—
“हम वह पीढ़ी हैं जिसने समय से पहले बहुत कुछ खो दिया। हम प्रेम करते हैं, पर पूर्णता नहीं पा सके। हम हँसते हैं, पर भीतर रिक्त हैं। फिर भी—सूरज प्रतिदिन उगता है। प्रकाश हर अंधकार को चुनौती देता है।”
यह कथा केवल कुछ व्यक्तियों की नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की है, जो युद्ध, राजनीति और सामाजिक उथल-पुथल के बीच अपने अस्तित्व की खोज में भटकती रही। प्रेम अपूर्ण रहा, सपने बिखरे, पर जीवन की धारा अविरल रही।
क्योंकि—
“सूरज फिर भी उगेगा।”
✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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