“14 सितंबर की सुबह थी सुनहरी,
1953 में शुरू हुई एक लहर गहरी।
पहली बार देश ने हिंदी दिवस मनाया,
अपनी मातृभाषा का सम्मान बढ़ाया।
तब से हर वर्ष उमंग के साथ,
मनाते हैं हिंदी दिवस पूरे देश के साथ।
हिंदी ने दिलाई हमें विश्व में पहचान,
विदेशी धरती पर भी गूंजे इसका गान।
गांधी ने इसे जनमानस की भाषा कहा,
राष्ट्र भाषा बनाने का संकल्प रखा।
1918 के साहित्य सम्मेलन की पुकार,
हिंदी हो भारत का अभिमान अपार।
फिर भी गुलामी की परछाइयाँ छाई,
भाषा पर भी उसकी चोटें रह गईं दिखाई।
हिंदी बोलने वाला पिछड़ा समझा गया,
अंग्रेज़ी बोलने वाला आधुनिक कहा गया।
इतनी समृद्ध, सरल और प्राचीन भाषा,
फिर भी क्यों झेल रही अपमान की आशा?
तेरे शब्द भंडार के मोती खोते जा रहे,
फिरंगी बोल दिलों में फलते-फूलते जा रहे।
कार्यालयों में तुझे विकल्प बनाया गया,
सभाओं में तेरा तिरस्कार दिखाया गया।
पूर्व में कुछ प्रहरी अब भी तुझे संभाले,
उत्तर, पश्चिम, दक्षिण में हाल हैं निराले।
ऐ हिंदी! तेरे ही घर में तेरा अस्तित्व डगमगा रहा,
हिंद से हिंदी का स्वरूप मिटता जा रहा।
अपनी ही भूमि पर परायी भाषा का राज है,
यह हमारे आत्मसम्मान पर एक भार है।
आओ आज हिंदी दिवस पर शपथ लें हम सब,
तेरे शब्दों से ही गढ़ें अपना हर सबक।
तेरी ही धुन पर बढ़े हमारा विकास,
तेरी ही छांव में खिले भारत का प्रकाश।”
🌸 “राष्ट्रीय हिंदी दिवस की असीम शुभकामनाएँ!” 🌸
✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर..
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*#युवा*








