*“अलविदा बशीर साहब”*
*(“एक शायर के जाने के बाद की कहानी!..” (*
*(यह उल्टा क्यों ..हैं जरा सोचिए!.)*
*“मुझे फर्क नहीं पड़ता मुझे मार दो…*
*लेकिन मेरे शब्दों को कैसे मारोगे..”*
–सुशील कुमार सुमन
*उस सुबह आसमान कुछ अलग था।*
बरनपुर की फैक्ट्री की ऊँची चिमनियों से उठता धुआँ भी जैसे धीमा हो गया था। मई की गर्म हवा में भी एक अजीब-सी ठंडक थी। मोबाइल की स्क्रीन पर अचानक आई एक खबर ने जैसे पूरे दिन को रोक दिया—
*“मशहूर शायर बशीर बद्र साहब नहीं रहे…”*
कुछ सेकंड तक मैं स्क्रीन को देखता रह गया।
उँगलियाँ जड़ हो गईं।
दिल जैसे किसी ने भीतर से मरोड़ दिया हो।
कमरे की खिड़की खुली थी। बाहर पेड़ों पर बैठी चिड़ियाँ चहचहा रही थीं, लेकिन मेरे भीतर एक गहरा सन्नाटा उतर आया था।
मैं कुर्सी पर बैठ गया। सामने टेबल पर वही किताब खुली पड़ी थी—
*“मुसाफ़िर”*
कल ही तो मैंने उसे पढ़ना शुरू किया था।
कितना अजीब इत्तेफ़ाक़ है!
कल रात उनके शब्दों में डूबा था, और आज वही शब्द मेरे भीतर रो रहे थे।
मैंने धीरे से किताब उठाई। उसके पन्नों से एक परिचित खुशबू उठी—पुरानी किताबों की खुशबू… जैसे किसी पुराने दोस्त की याद।
पहला पन्ना पलटा।
और अचानक उनकी आवाज़ कानों में गूँजने लगी—
*“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,*
*न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए…”*
मेरी आँखें भर आईं।
बशीर बद्र सिर्फ़ शायर नहीं थे।
*वो एहसास थे।*
वो उन लोगों की आवाज़ थे जो चुपचाप टूट जाते हैं लेकिन मुस्कुराना नहीं छोड़ते।
उनकी ग़ज़लें किसी महफ़िल की सजावट नहीं थीं।
वो दिल के जख्मों पर रखी हुई ठंडी पट्टी थीं।
जब कॉलेज के दिनों में पहली बार उनका शेर सुना था, तब समझ नहीं पाया था कि शब्द इतने गहरे भी हो सकते हैं।
साइंस कॉलेज, पटना.. के हॉस्टल की वह शाम आज भी याद है।
बारिश हो रही थी। बिजली चली गई थी। कमरे में मोमबत्ती जल रही थी। मेरा दोस्त अजय अचानक बोला—
*“सुनो, एक शेर सुनाता हूँ…”*
और फिर उसने धीमे स्वर में पढ़ा—
*“कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,*
*यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता…”*
उस रात पहली बार लगा कि शायरी सिर्फ़ तुकबंदी नहीं होती।
शायरी इंसान के टूटने की आवाज़ होती है।
उस दिन के बाद बशीर बद्र मेरे जीवन का हिस्सा बन गए।
समय बीतता गया।
नौकरी लगी।
ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं।
फैक्ट्री की मशीनों की आवाज़ों के बीच जिंदगी दौड़ने लगी।
लेकिन हर मुश्किल दौर में कहीं न कहीं बशीर साहब मिल जाते।
जब प्रमोशन हुआ,
जब अपने ही लोगों ने पीठ पीछे बातें कीं,
जब संघर्ष लंबा हो गया,
जब दोस्त बिछड़ गए…
तब उनकी ग़ज़लें किसी हमसफ़र की तरह साथ खड़ी रहीं।
कभी देर रात ऑफिस से लौटते समय कार में उनकी नज़्में सुनता था।
कभी मीटिंग के तनाव के बाद अकेले कमरे में बैठकर उनके शेर पढ़ता था।
और हर बार लगता था—
*“ये आदमी मेरे दिल को मुझसे ज़्यादा जानता है।”*
उस दिन फैक्ट्री जाना था।
लेकिन मन नहीं था।
मैंने किताब बंद की और बालकनी में आ गया। दूर आसमान में धूप फैल चुकी थी। नीचे सड़क पर लोग अपने-अपने कामों में व्यस्त थे।
दुनिया चल रही थी।
लेकिन मेरे भीतर कुछ रुक गया था।
तभी फोन बजा।
दूसरी तरफ़ मेरे पुराने मित्र राजेश थे।
उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा—
“सुना तुमने…?”
मैंने बस इतना कहा—
“हाँ…”
कुछ सेकंड दोनों तरफ़ ख़ामोशी रही।
फिर राजेश बोले—
*“यार… ऐसा लग रहा है जैसे घर का कोई बड़ा चला गया हो।”*
मैं चुप रहा।
क्योंकि यही सच था।
कुछ लोग हमारे रिश्तेदार नहीं होते, लेकिन हमारी आत्मा के बहुत करीब होते हैं।
*बशीर बद्र उन्हीं में से थे।*
दोपहर तक सोशल मीडिया शोक संदेशों से भर गया।
हर कोई उनका कोई न कोई शेर लिख रहा था।
लेकिन मुझे लग रहा था कि कोई भी शब्द उस खालीपन को बयान नहीं कर पा रहा।
*मैंने फिर “मुसाफ़िर” खोली।*
एक पन्ने पर उँगली रुक गई।
उसमें लिखा था—
*“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,*
*तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में…”*
मैं देर तक उस शेर को देखता रहा।
कितनी सादगी…
कितनी गहराई…
यही तो उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।
वो कठिन शब्दों के शायर नहीं थे।
वो इंसानी दर्द के शायर थे।
शाम को अचानक बारिश शुरू हो गई।
गरजते बादलों के बीच मैं बरामदे में बैठा चाय पी रहा था। बारिश की बूंदें जमीन पर गिरकर मिट्टी की खुशबू फैला रही थीं।
ऐसे मौसम में बशीर साहब बहुत याद आते थे।
उनकी शायरी में भी तो बारिश होती थी—
यादों की बारिश…
मोहब्बत की बारिश…
तन्हाई की बारिश…
मुझे याद आया, एक बार दिल्ली के एक मुशायरे का वीडियो देखा था।
सफेद कुर्ता, हल्की मुस्कान, बेहद सादा अंदाज़…
कोई बनावट नहीं।
कोई दिखावा नहीं।
उन्होंने माइक पकड़ा और कहा—
*“मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला,*
*अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला…”*
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा था।
लेकिन मैं उस समय सिर्फ़ उन्हें देख रहा था।
उनकी आँखों में एक अजीब थकान थी।
जैसे बहुत कुछ देखकर आए हों।
शायद यही वजह थी कि उनके शब्द सीधे दिल में उतर जाते थे।
रात गहरा गई।
मैं अपने स्टडी रूम में चला गया।
बुकशेल्फ़ खोली।
*वहाँ प्रेमचंद थे, हरिवंश राय बच्चन थे, गुलज़ार थे, निदा फ़ाज़ली थे…*
और बीच में मुस्कुराती हुई *“मुसाफ़िर”* रखी थी।
मैंने उसे हाथ में लिया और कुर्सी पर बैठ गया।
अचानक ऐसा लगा जैसे बशीर साहब सामने बैठे हों।
धीरे से मुस्कुरा रहे हों।
मैंने मन ही मन पूछा—
*“आप चले क्यों गए…?”*
*और भीतर कहीं से आवाज़ आई—*
*“शायर कहाँ जाते हैं…?”*
सच ही तो है।
शायर मरते नहीं।
वो अपने शब्दों में ज़िंदा रहते हैं।
*जब भी कोई टूटा हुआ इंसान रात के दो बजे उनकी ग़ज़ल पढ़ेगा—*
वो वहीं होंगे।
जब कोई प्रेम में हारकर उनका शेर लिखेगा—
वो वहीं होंगे।
जब कोई अकेला आदमी खिड़की के पास बैठकर बारिश देखेगा और धीरे से कहेगा—
*“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से…”*
तब बशीर बद्र फिर जीवित हो उठेंगे।
रात के लगभग बारह बजे थे।
मैंने डायरी निकाली।
कलम उठाई।
और लिखना शुरू किया—
*“मेरे पसंदीदा शायर ‘बशीर बद्र’ साहब आज नहीं रहे…”*
लिखते-लिखते हाथ काँप गए।
आँखों के सामने उनकी तस्वीर घूम रही थी।
एक पूरा दौर खत्म हो गया था।
आज सिर्फ़ एक शायर नहीं गया था—
*आज उर्दू की वो नरम रूह चली गई थी जो मोहब्बत को इंसानियत से जोड़ती थी।*
आज ग़ज़ल का एक दरवाज़ा बंद हो गया था।
धीरे-धीरे यादों का सिलसिला खुलता गया।
मुझे अपने पिता याद आए।
वो अक्सर रेडियो पर ग़ज़लें सुना करते थे।
उन दिनों समझ नहीं आता था कि लोग इतने उदास गीत क्यों सुनते हैं।
लेकिन उम्र के साथ समझ आया—
ग़ज़ल उदासी नहीं देती,
*ग़ज़ल उदासी को सहने की ताकत देती है।*
और बशीर बद्र इस कला के उस्ताद थे।
उन्होंने दर्द को खूबसूरती में बदल दिया।
रात के सन्नाटे में बाहर बारिश अब भी हो रही थी।
मैंने खिड़की खोली।
ठंडी हवा कमरे में भर गई।
*दूर कहीं ट्रेन की सीटी सुनाई दी।*
अचानक लगा जैसे जिंदगी भी एक मुसाफ़िर ही तो है।
कुछ लोग थोड़ी देर साथ चलते हैं,
फिर उतर जाते हैं।
लेकिन उनकी बातें, उनकी हँसी, उनके शब्द… *सफ़र में रह जाते हैं।*
बशीर साहब भी शायद अपनी मंज़िल पर उतर गए थे।
लेकिन उनकी ग़ज़लें अभी भी हमारी सीट के पास बैठी थीं।
मैंने आखिरी बार किताब बंद की।
धीरे से उसे सीने से लगाया।
और फुसफुसाया—
*“अलविदा बशीर साहब…”*
लेकिन अगले ही पल भीतर से आवाज़ आई—
*“नहीं… अलविदा नहीं…”*
क्योंकि जो इंसान लोगों के दिलों में घर बना ले, वो कभी जाता नहीं।
वो हर उस शेर में ज़िंदा रहता है जिसे पढ़कर आँखें नम हो जाएँ।
वो हर उस तन्हा रात में ज़िंदा रहता है जहाँ कोई इंसान अपने टूटे दिल को संभालने के लिए किताब खोलता है।
वो हर उस मोहब्बत में ज़िंदा रहता है जहाँ शब्द कम पड़ जाते हैं।
सुबह होने लगी थी।
पूर्व दिशा में हल्की रोशनी फैल रही थी।
मैंने खिड़की से बाहर देखा।
नई सुबह आ रही थी।
लेकिन उस सुबह में एक खालीपन हमेशा रहेगा।
अब जब भी ग़ज़ल का नाम आएगा,
एक चेहरा ज़रूर याद आएगा—
*हल्की मुस्कान वाला, बेहद सादा, गहरी आँखों वाला चेहरा…
बशीर बद्र।*
आज भी उनकी किताब मेरे सामने रखी है।
उसके पन्नों में जैसे उनकी साँसें बाकी हैं।
और मैं सोचता हूँ—
*कुछ लोग सचमुच मुसाफ़िर होते हैं।*
वो आते हैं…
दिलों में उजाला भरते हैं…
और फिर चुपचाप चले जाते हैं।
लेकिन जाते-जाते हमें इतना अमीर बना जाते हैं कि जिंदगी भर उनके शब्दों की रोशनी कम नहीं होती।
,zअलविदा बशीर साहब।*
आपने मोहब्बत को अल्फ़ाज़ दिए।
तन्हाई को आवाज़ दी।
और टूटे हुए दिलों को जीने का हुनर दिया।
आप चले गए…
लेकिन आपकी ग़ज़लें अब भी हमारे कमरों में साँस ले रही हैं।
और शायद हमेशा लेती रहेंगी…
*“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,*
*न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए…”*
✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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