*“आशा”*
“आशा—
एक नन्ही-सी चिड़िया,
जो मन की डाल पर
चुपचाप आ बैठती है।
न शब्द माँगती है,
न कारण पूछती है,
बस भीतर-भीतर
जीवन का गीत गुनगुनाती है।
जब हालात आँधी बन जाते हैं,
और सपनों के पंख भीग जाते हैं,
तब वही आशा
सबसे मधुर स्वर में
हौसले की तान छेड़ती है।
टूटते भरोसे,
बिखरते रिश्ते,
अंधेरी रातें—
कुछ भी उसे
चुप नहीं करा पाता।
वह हर तूफ़ान में
और ऊँची उड़ान भरती है।
आशा न इनाम चाहती है,
न धन्यवाद की भूखी है,
वह तो बस
मानव आत्मा की
सबसे सच्ची साथी है।
जब सब कुछ छिन जाता है,
तब भी जो बची रहती है—
वही आशा है,
जो कहती है धीमे से,
“अभी अंत नहीं हुआ।”
क्योंकि
आशा न दिखती है,
न तौली जा सकती है,
पर उसके बिना
कोई भी सपना
पूरा नहीं उड़ सकता।”
*✍️सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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