*“एक थकी हुई मुस्कान !…”*
*(आख़िरी किस्त!)*
आज का दौर!..बात है!
झारखंड और पश्चिम बंगाल की सीमा से लगा एक छोटा-सा कस्बा था — नवजीवनपुर।
कभी यह इलाका हरियाली और खेतों के लिए प्रसिद्ध था, पर अब यहाँ की तस्वीर बदल चुकी थी।
खेत सिकुड़ रहे थे…
युवाओं के सपने शहरों की ओर भाग रहे थे…
और गाँवों में बच रही थी केवल बूढ़े लोगों की थकी हुई साँसें।
इसी गाँव में रहता था रामेश्वर महतो।
उम्र लगभग पचपन वर्ष।
चेहरे पर समय की गहरी रेखाएँ।
आँखों में संघर्ष का धुआँ।
और दिल में एक ऐसा सपना, जिसे वह पिछले बीस वर्षों से पूरा करने की कोशिश कर रहा था।
वह सपना था —
अपने बेटे अंकित को “बड़ा आदमी” बनाना।
रामेश्वर के पास पहले पाँच बीघा जमीन थी।
लेकिन समय के साथ सब बिकती चली गई।
कभी बेटी की शादी में…
कभी पत्नी के इलाज में…
कभी बैंक के कर्ज में…
अब उसके पास केवल एक छोटा-सा घर और आधा बीघा जमीन बची थी।
उसकी पत्नी सावित्री दिनभर घरों में काम करती थी।
लोगों के बर्तन माँजती…
झाड़ू-पोंछा करती…
और रात को थकी हुई हड्डियों के साथ घर लौटती।
लेकिन जब भी वह अपने बेटे अंकित को मोबाइल पर ऑनलाइन पढ़ाई करते देखती, उसकी आँखों में चमक आ जाती।
“हमारा बेटा अफसर बनेगा…”
वह अक्सर कहती।
रामेश्वर मुस्कुरा देता।
उसे लगता — यही उम्मीद उसकी जिंदगी का अंतिम सहारा है।
अंकित पढ़ने में बहुत तेज था।
सरकारी स्कूल से पढ़कर उसने इंजीनियरिंग की तैयारी शुरू की।
लेकिन आज के दौर में पढ़ाई केवल किताबों से नहीं होती थी।
ऑनलाइन कोर्स…
महँगा लैपटॉप…
कोचिंग ऐप्स…
हाई-स्पीड इंटरनेट…
हर चीज पैसे माँगती थी।
एक दिन अंकित बोला —
“बाबूजी… अगर मुझे अच्छा लैपटॉप मिल जाए तो मैं और अच्छी तैयारी कर सकता हूँ।”
रामेश्वर चुप हो गया।
उसके पास उस समय कुल तीन हजार रुपये थे।
लेकिन बेटे की आँखों में सपना देखकर उसने तय कर लिया —
कुछ भी हो जाए, वह लैपटॉप जरूर खरीदेगा।
अगले ही दिन वह कस्बे के सबसे बड़े फाइनेंस एजेंट महेन्द्र सिंह के पास पहुँचा।
महेन्द्र सिंह इलाके का बड़ा आदमी था।
उसके पास पैसा था…
राजनीतिक पहुँच थी…
और गरीबों को कर्ज देकर उन्हें जिंदगीभर गुलाम बनाए रखने की कला भी।
उसने रामेश्वर को ऊपर से नीचे तक देखा और मुस्कुराया।
“कितना चाहिए?”
“सत्तर हजार…”
“गारंटी?”
रामेश्वर चुप।
“जमीन?”
“बस आधा बीघा बची है…”
महेन्द्र हँसा।
*“तुम लोग भी अजीब हो… खुद भूखे रहोगे लेकिन बच्चों को शहर भेजोगे।”*
रामेश्वर ने सिर झुका लिया।
कुछ देर बाद महेन्द्र बोला —
“ठीक है… पैसे मिल जाएँगे। लेकिन ब्याज थोड़ा ज्यादा लगेगा।”
“कितना?”
“तीन प्रतिशत महीना।”
रामेश्वर समझ गया —
यह कर्ज नहीं, फाँसी है।
लेकिन उसने दस्तखत कर दिए।
कुछ दिनों बाद अंकित के हाथ में नया लैपटॉप था।
उस दिन घर में जैसे त्योहार आ गया।
सावित्री ने खीर बनाई।
रामेश्वर देर तक बेटे को पढ़ते हुए देखता रहा।
उसे लगता था —
यह लैपटॉप नहीं, उनके भविष्य की चाबी है।
लेकिन जिंदगी केवल सपनों से नहीं चलती।
उसी साल गाँव में सूखा पड़ गया।
बचे हुए खेत भी बर्बाद हो गए।
दूसरी ओर महेन्द्र सिंह हर महीने ब्याज माँगने आने लगा।
“पैसा समय पर चाहिए… वरना घर चला जाएगा।”
रामेश्वर हर बार हाथ जोड़ लेता।
एक दिन गाँव में चुनावी रैली हुई।
बड़े-बड़े नेता आए।
उन्होंने मंच से कहा —
“भारत बदल रहा है!”
“डिजिटल इंडिया गाँवों तक पहुँच चुका है!”
“हर युवा को रोजगार मिलेगा!”
भीड़ तालियाँ बजा रही थी।
लेकिन रामेश्वर को केवल अपना कर्ज याद आ रहा था।
इधर अंकित का चयन एक बड़े प्राइवेट कॉलेज में हो गया।
पूरा गाँव खुश था।
लेकिन फीस सुनकर रामेश्वर के पैरों तले जमीन खिसक गई।
पहले साल की फीस — ढाई लाख रुपये।
उस रात रामेश्वर सो नहीं पाया।
सावित्री ने धीरे से पूछा —
“अब क्या होगा?”
रामेश्वर काफी देर तक चुप रहा।
फिर बोला —
“घर गिरवी रखना पड़ेगा…”
सावित्री की आँखें भर आईं।
“और अगर नौकरी नहीं लगी तो?”
रामेश्वर ने आकाश की ओर देखा।
“भगवान इतना अन्याय नहीं करेगा…”
लेकिन शायद भगवान व्यस्त था।
घर गिरवी रख दिया गया।
अंकित शहर चला गया — बेंगलुरु।
वहाँ की चमचमाती दुनिया देखकर उसकी सोच बदलने लगी।
अब उसे गाँव छोटा लगने लगा था।
गरीबी शर्म लगने लगी थी।
वह धीरे-धीरे माता-पिता से दूर होता गया।
फोन कम आने लगे।
उधर गाँव में रामेश्वर की हालत बिगड़ती जा रही थी।
दिन में मजदूरी…
रात में चिंता…
उसकी खाँसी बढ़ती जा रही थी।
लेकिन इलाज के पैसे नहीं थे।
एक दिन सावित्री बोली —
“तुम अस्पताल चलो।”
रामेश्वर हँसा।
*“गरीब आदमी बीमारी से नहीं मरता… चिंता से मरता है।”*
इसी बीच महेन्द्र सिंह फिर आया।
इस बार उसके साथ दो गुंडे थे।
“तीन महीने का ब्याज बाकी है।”
रामेश्वर हाथ जोड़कर बोला —
“बस थोड़ा समय और दे दो…”
महेन्द्र ने घर की दीवार पर हाथ मारा।
“समय खत्म हो चुका है।”
सावित्री रोने लगी।
लेकिन महेन्द्र के चेहरे पर कोई दया नहीं थी।
उसी रात रामेश्वर ने अंकित को फोन किया।
बहुत देर बाद कॉल उठा।
“हाँ बाबूजी… मीटिंग में हूँ।”
“बेटा… थोड़ा पैसा चाहिए था…”
अंकित झुँझला गया।
“मैं खुद संघर्ष कर रहा हूँ यहाँ!”
“लेकिन घर…”
“आप लोग समझते क्यों नहीं? शहर में खर्च बहुत है!”
फोन कट गया।
रामेश्वर देर तक मोबाइल को देखता रहा।
उसे पहली बार महसूस हुआ —
शायद उसका बेटा अब उससे दूर जा चुका है।
कुछ महीनों बाद अंकित की नौकरी लग गई।
अच्छी सैलरी…
बड़ी कंपनी…
कॉर्पोरेट ऑफिस…
उसने सोशल मीडिया पर तस्वीरें डालनी शुरू कर दीं।
महँगे कैफे…
नई कार…
ब्रांडेड कपड़े…
गाँव वाले गर्व से कहते —
“रामेश्वर का बेटा बड़ा आदमी बन गया।”
लेकिन किसी को यह नहीं पता था कि रामेश्वर के घर में कई दिनों से दाल नहीं बनी थी।
एक दिन सावित्री बेहोश होकर गिर पड़ी।
उसे अस्पताल ले जाया गया।
डॉक्टर ने कहा —
“हार्ट की बीमारी है।”
इलाज महँगा था।
रामेश्वर ने अंकित को फिर फोन किया।
इस बार अंकित ने पैसे भेज दिए।
लेकिन साथ में एक मैसेज भी —
“मैं हमेशा मदद नहीं कर सकता।”
उस संदेश ने रामेश्वर के दिल को भीतर तक तोड़ दिया।
धीरे-धीरे रामेश्वर बूढ़ा होने लगा।
अब उससे मजदूरी भी नहीं होती थी।
गाँव के लोग सहानुभूति तो देते, पर मदद कोई नहीं करता।
क्योंकि आज के दौर में हर आदमी अपनी लड़ाई में उलझा था।
एक दिन गाँव में खबर आई —
महेन्द्र सिंह चुनाव जीत गया है।
अब वह विधायक बन चुका था।
पूरा गाँव जश्न मना रहा था।
उधर रामेश्वर अपने टूटे हुए घर में बैठा सोच रहा था —
*“गरीब आदमी चाहे जितना ईमानदार हो… जीत हमेशा पैसे वालों की होती है।”*
सर्दियों की एक रात…
रामेश्वर की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई।
सावित्री घबराकर पड़ोसियों को बुलाने लगी।
लेकिन रात बहुत ठंडी थी।
कोई जल्दी बाहर नहीं निकला।
रामेश्वर खाँसते-खाँसते बोला —
“अंकित को फोन कर दो…”
फोन लगाया गया।
लेकिन नेटवर्क नहीं मिला।
रामेश्वर ने धीरे से सावित्री का हाथ पकड़ा।
“मैंने जिंदगीभर बस एक सपना देखा…”
सावित्री रो पड़ी।
“ऐसा मत कहो…”
रामेश्वर की आँखें छत की ओर टिक गईं।
“मैं चाहता था… मेरा बेटा वो जिंदगी जिए… जो मैं नहीं जी सका…”
कुछ देर बाद उसकी आवाज धीमी पड़ने लगी।
*“लेकिन शायद… सपनों की कीमत बहुत ज्यादा होती है…”*
और फिर…
सब शांत हो गया।
सुबह गाँव में खबर फैल गई।
“रामेश्वर नहीं रहा…”
लोग आए…
कुछ देर दुख जताया…
फिर अपने-अपने काम में लौट गए।
अंकित दो दिन बाद पहुँचा।
अब वह पूरी तरह शहर का आदमी बन चुका था।
महँगे कपड़े…
आधुनिक भाषा…
आँखों पर काला चश्मा…
लेकिन जैसे ही उसने अपने पिता का निर्जीव चेहरा देखा, उसके भीतर कुछ टूट गया।
उसे याद आने लगा —
वह पुराना घर…
माँ की खीर…
बाबूजी की थकी हुई मुस्कान…
और वह दिन जब उन्होंने कर्ज लेकर लैपटॉप खरीदा था।
अंतिम संस्कार के बाद अंकित देर तक अकेला बैठा रहा।
तभी सावित्री उसके पास आई।
उसने एक पुरानी डायरी उसके हाथ में रख दी।
“तुम्हारे बाबूजी लिखते थे…”
अंकित काँपते हाथों से डायरी खोलने लगा।
पहले पन्ने पर लिखा था —
“अगर मेरा बेटा सफल हो जाए…
तो समझूँगा मेरी जिंदगी सफल हो गई।”
अंकित की आँखों से आँसू गिरने लगे।
अगले पन्ने पर लिखा था —
*“मैं चाहता हूँ अंकित कभी गरीब होने का दर्द न समझे…”*
और अंतिम पन्ने पर —
“अगर मैं न रहूँ…
तो उसे कहना…
मैंने उससे कभी शिकायत नहीं की…”
अंकित फूट-फूटकर रो पड़ा।
उस रात वह सो नहीं पाया।
उसे महसूस हुआ —
उसने नौकरी तो पा ली…
लेकिन अपने पिता को खो दिया।
उसने शहर की चमक में उस आदमी को भुला दिया था जिसने अपना सबकुछ बेचकर उसके सपनों को जिंदा रखा।
कुछ महीनों बाद…
अंकित ने अपनी बड़ी नौकरी छोड़ दी।
लोग हैरान रह गए।
वह वापस नवजीवनपुर लौट आया।
उसने गाँव में एक छोटा-सा डिजिटल शिक्षा केंद्र खोला।
जहाँ गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ाई, इंटरनेट और कंप्यूटर सिखाए जाते थे।
केंद्र के बाहर एक बोर्ड लगा था —
“रामेश्वर शिक्षालय”
नीचे लिखा था —
*“हर गरीब पिता के अधूरे सपनों को समर्पित…”*
उद्घाटन वाले दिन सावित्री की आँखें नम थीं।
उसने आसमान की ओर देखा।
मानो कह रही हो —
*“देखो रामेश्वर…*
*तुम हारकर भी जीत गए…”*
शाम को अंकित अकेला बैठा था।
सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था।
उसे लग रहा था जैसे उसके पिता कहीं पास ही खड़े मुस्कुरा रहे हों।
अब वह समझ चुका था —
“*गरीबी केवल पैसों की कमी नहीं होती…*
गरीबी वह दर्द है जहाँ इंसान अपने सपनों की कीमत अपनी जिंदगी देकर चुकाता है।
और शायद…
यही इस देश की सबसे बड़ी सच्चाई थी।”
*✍️ सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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