*कुलदीप नैयर : निर्भीक कलम के प्रहरी*
*सौजन्य : नरेश कुमार अग्रवाल*
कुलदीप नैयर (14 अगस्त 1923 – 23 अगस्त 2018) का नाम भारतीय पत्रकारिता, साहित्य और जनजीवन में सदा स्मरणीय रहेगा। वे न केवल एक तेज़तर्रार पत्रकार थे, बल्कि एक सजग लोकतंत्र प्रहरी, मानवाधिकारों के पैरोकार और सच्चे गांधीवादी विचारों के संवाहक भी थे।
पंजाब के सियालकोट (अब पाकिस्तान) में जन्मे नैयर जी ने अपनी शिक्षा लाहौर से पूरी की। भारत विभाजन के समय उन्होंने सांप्रदायिक हिंसा, विस्थापन और पीड़ा को बहुत करीब से देखा, जिसने उनकी सोच और लेखन को गहराई दी। पत्रकारिता में उनकी शुरुआत ‘उर्दू प्रेस’ से हुई, लेकिन जल्द ही वे अंग्रेज़ी पत्रकारिता के अग्रिम पंक्ति में आ गए।


कुलदीप नैयर की लेखनी का सबसे बड़ा गुण था— निर्भीकता। आपातकाल (1975-77) के समय, जब अधिकांश मीडिया भयभीत होकर चुप था, तब नैयर जी ने सत्ता के दमनकारी रवैये के खिलाफ आवाज़ उठाई और जेल भी गए। उनका मानना था कि पत्रकार का पहला कर्तव्य सत्ता से सवाल पूछना और जनता के अधिकारों की रक्षा करना है।
उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस, द स्टेट्समैन, और द टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित अख़बारों में काम किया और बाद में ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के संपादकीय पृष्ठ पर भी अपनी कलम चलाई। उनकी लोकप्रिय कॉलम “Between the Lines” न केवल भारत में, बल्कि दक्षिण एशिया के कई देशों में पढ़ी जाती थी।
नैयर जी को लेखक के रूप में भी ख्याति मिली। उनकी किताबें— Beyond the Lines, India After Nehru, Emergency Retold, और Distant Neighbours— भारतीय राजनीति और समाज को समझने के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज़ हैं। उन्होंने भारत-पाकिस्तान दोस्ती और शांति प्रयासों के लिए भी लगातार काम किया, और ‘अमन की आशा’ जैसी पहलों में सक्रिय भूमिका निभाई।

कुलदीप नैयर जी का जीवन संदेश देता है कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी है। उन्होंने अपनी कलम को कभी बिकने नहीं दिया और सच को लिखने में कभी समझौता नहीं किया।
आज उनकी जयंती पर हम उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं और उनकी विरासत से प्रेरणा लेते हैं—
कि सच्चा पत्रकार वही है जो निडर होकर जनता की बात कहे, सत्ता से सवाल पूछे और समाज में न्याय की मशाल जलाए रखे।


















