हिंदी और उर्दू साहित्य की सरहदों को महकाने वाले गुलज़ार का नाम आज किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है। शब्दों के इस जादूगर ने गीत, कविता, कहानी, पटकथा और निर्देशन के माध्यम से जिस तरह भारतीय कला-संस्कृति को समृद्ध किया है, वह अपने आप में अतुलनीय है। उनका जन्म 18 अगस्त 1934 को दीना (अब पाकिस्तान) में हुआ था। बचपन में बिछड़ने, देश के विभाजन का दर्द, और संघर्ष की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उन्होंने अपने अनुभवों को जिस सादगी और मार्मिकता के साथ शब्दों में पिरोया — वही शैली आज “गुलज़ारियत” कहलाती है।
साहित्य के मायावी कारीगर
गुलज़ार की लेखनी में भावनाओं की बारिश होती है — न तो बाढ़ की तरह, न बूँद-बूँद — बल्कि एक ऐसी रिमझिम फुहार की तरह जो मन की मिट्टी को महका देती है। उनकी कविताओं में प्रेम है तो पीड़ा भी, विरह है तो प्रतीक्षा भी। रोज़मर्रा की साधारण घटनाओं को असाधारण बना देने की कला उनके पास है। शब्द उनके पास आते नहीं, वह शब्दों के पास जाते हैं, उन्हें माँजते-चमकाते हैं, और फिर अपने पाठकों-श्रोताओं के सामने कुछ नया रच देते हैं।
फिल्मों में गुलज़ार की कविताई
गीतकार के रूप में गुलज़ार ने भारतीय फिल्मों को एक नया सौंदर्यबोध दिया। “मोरा गोरा अंग लै ले”, “तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं”, “दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन”, जैसे गीतों ने प्रेम को न तो शायरी की पुरानी लीक पर सजाया, न ही बाजारू फ़िल्मी भाषा में ढाला — उन्होंने बीच का एक रास्ता चुना, जहाँ विचारों की गहराई और बोलचाल की सरलता एक साथ चलती है।
निर्देशक के तौर पर मेरे अपने, अनुभव, आंधी, इजाज़त, माचिस जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने सामाजिक और भावनात्मक पहलुओं को संवेदनशीलता से परदे पर उतारा। उनके निर्देशन में रिश्ते ‘कथानक’ नहीं बनते, वे स्वयं कहानी कहते हैं।
व्यक्तित्व और विरासत
सादा सफेद कुरता-पायजामा, मोटे फ्रेम का चश्मा, शांत मुस्कान और भीगी आवाज़ — गुलज़ार का व्यक्तित्व उतना ही आत्मीय लगता है जितना उनका लिखा हुआ। उनके भीतर का बच्चा आज भी जिंदा है — यही कारण है कि “किताबें करती हैं बातें” जैसी बाल कविताएँ भी उनकी कलम से निकलती हैं और “दिल तो बच्चा है जी” भी।
साहित्य, सिनेमा और संगीत – तीनों क्षेत्रों में योगदान के लिए उन्हें पद्म भूषण, दादा साहब फाल्के पुरस्कार, कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। लेकिन इन सबसे ऊपर, उन्हें अपने पाठकों और श्रोताओं के दिलों में जो प्यार मिला है, वही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
समापन में…
गुलज़ार सिर्फ एक नाम नहीं, एक एहसास हैं। उनके शब्दोंहै ने अनगिनत दिलों को सहलाया, सहेजा और सजाया है। जन्मदिन के इस अवसर पर हम प्रार्थना करते हैं कि यह गुलशन यूँ ही महकता रहे और गुलज़ार साहब बरसों तक अपनी सादगी, संवेदना और शब्दों के जादू से हमें यूँ ही सराबोर करते रहें।
“होठ से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो…”
इसी कामना के साथ —
*जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ, गुलज़ार साहब! 🎉🌹*
**सौजन्य:*
*नरेश कुमार अग्रवाल**




























