*“ज़िंदगी तू है!.. कान्हा”*
“भारत की धरती पर अनगिनत कहानियाँ जन्म लेती हैं—कुछ खेतों की मिट्टी से, कुछ शहरों की भीड़ से, और कुछ इंसान के मन के भीतर उठते तूफ़ानों से। यह कहानी भी एक ऐसे ही व्यक्ति की है, जिसके पास धन, प्रतिष्ठा और आराम सब कुछ था, लेकिन उसके भीतर एक बेचैन आवाज़ लगातार उसे पुकारती रहती थी—
“मैं कुछ और चाहता हूँ… कुछ सच्चा… कुछ ऐसा जो मुझे भीतर से जगा दे।”
उस व्यक्ति का नाम था विराज प्रताप सिंह।
उत्तर प्रदेश के बनारस शहर में विराज प्रताप सिंह का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता था। वह एक समृद्ध ज़मींदार परिवार से था। उसके पास गंगा के किनारे विशाल हवेली, कई खेत, ट्रैक्टर, कारें और नौकर-चाकर थे।
लोग कहते थे—
“विराज बाबू से भाग्यशाली आदमी शायद ही कोई होगा।”
लेकिन सच्चाई यह थी कि विराज के भीतर एक गहरी खालीपन की खाई थी।
वह सुबह उठता, योग करता, अख़बार पढ़ता, व्यापार देखता, लेकिन हर काम के बाद उसे लगता—
“क्या यही जीवन है?”
उसकी पत्नी संध्या अक्सर उससे कहती—
“तुम्हें क्या कमी है विराज? सब कुछ तो है।”
विराज मुस्कुरा देता, लेकिन उसके मन में एक अजीब बेचैनी रहती।
रात को वह छत पर बैठकर गंगा की ओर देखता और सोचता
“मुझे कुछ करना चाहिए… कुछ ऐसा जो सच में मायने रखता हो।”
एक दिन बनारस में एक घुमक्कड़ साधु आया।
उसका नाम था स्वामी अद्वैतानंद।
वह गंगा किनारे लोगों को जीवन और आत्मा के बारे में उपदेश देता था।
विराज भी एक दिन वहाँ पहुँच गया।
साधु ने उसे देखते ही कहा—
“तुम्हारे भीतर बहुत शोर है।”
विराज चौंक गया।
“आप कैसे जानते हैं?”
साधु मुस्कुराया।
“तुम्हारी आँखें बता रही हैं। तुम्हारे भीतर एक आवाज़ है जो कह रही है—
‘उठो… कुछ करो… कुछ बड़ा।’”
यह सुनकर विराज का दिल जोर से धड़कने लगा।
साधु ने कहा—
“जब तक आदमी अपने डर और अहंकार से नहीं लड़ता, तब तक वह खुद को नहीं पहचान पाता।”
उस रात विराज सो नहीं पाया।
अगली सुबह उसने अचानक निर्णय लिया—
वह भारत की यात्रा पर निकलेगा।
विराज ने अपना ज़्यादातर काम अपने छोटे भाई अभिषेक को सौंप दिया।
संध्या ने पूछा—
“तुम कहाँ जा रहे हो?”
विराज ने कहा—
“मुझे खुद को ढूँढने जाना है।”
वह एक बैग लेकर निकल पड़ा।
पहले वह मध्य प्रदेश के जंगलों, फिर छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों, और अंत में ओडिशा के पहाड़ी गांवों तक पहुँचा।
उसकी यात्रा उसे एक दूरस्थ आदिवासी क्षेत्र में ले आई—
कोरापुट के जंगलों में बसे एक छोटे से गाँव “देवगढ़” में।
देवगढ़ एक सुंदर लेकिन गरीब गाँव था।
यहाँ के लोग प्रकृति से जुड़े थे—
जंगल, नदी, पहाड़—सब उनके जीवन का हिस्सा थे।
लेकिन उस वर्ष एक बड़ी समस्या थी।
बारिश नहीं हुई थी।
खेत सूख चुके थे।
कुएँ खाली थे।
लोग परेशान थे।
गाँव के मुखिया भीमा नायक ने विराज से कहा—
“हमारे देवता नाराज़ हैं। अगर बारिश नहीं आई तो सब खत्म हो जाएगा।”
विराज ने पहली बार महसूस किया कि यहाँ की समस्या असली है।
यहाँ लोगों की जिंदगी दाँव पर लगी थी।
विराज ने सोचा कि वह कुछ मदद करे।
उसे बचपन में पढ़ी विज्ञान की किताबें याद आईं।
उसने गाँव वालों से कहा—
“अगर हम पानी का बड़ा टैंक बनाएँ और पहाड़ी से पानी रोकें तो शायद खेती बच सकती है।”
गाँव वालों को यह विचार अजीब लगा।
लेकिन उन्होंने कोशिश करने का फैसला किया।
दिन-रात मेहनत शुरू हुई।
मिट्टी खोदी गई।
पत्थर लगाए गए।
लेकिन एक दिन विराज ने गलती से पानी का बड़ा टैंक तोड़ दिया।
पूरा पानी बह गया।
गाँव वाले हँसने लगे।
किसी ने कहा—
“यह शहर वाला आदमी तो पागल है।”
विराज को शर्म आई।
लेकिन वह हार नहीं माना।
गाँव के पास जंगल में एक बूढ़ा साधु रहता था।
उसका नाम था बाबा केदारनाथ।
लोग कहते थे कि वह प्रकृति की भाषा समझता है।
विराज उनसे मिलने गया।
बाबा ने पूछा—
“तुम यहाँ क्यों आए हो?”
विराज ने कहा—
“मैं लोगों की मदद करना चाहता हूँ।”
बाबा हँसे।
“पहले खुद को समझो।”
फिर उन्होंने कहा—
“बारिश सिर्फ बादलों से नहीं आती।
वह लोगों के धैर्य और विश्वास से भी आती है।”
बाबा की बात सुनकर विराज ने एक नया विचार सोचा।
उसने गाँव वालों के साथ मिलकर छोटे-छोटे चेक डैम बनाना शुरू किया।
यह काम आसान नहीं था।
लेकिन धीरे-धीरे गाँव के लोग उसके साथ जुड़ते गए।
भीमा नायक ने कहा—
“तुम अजीब हो… लेकिन अच्छे हो।”
एक शाम अचानक आसमान में बादल घिर आए।
पहले हल्की बूंदें गिरीं।
फिर तेज़ बारिश शुरू हो गई।
गाँव के बच्चे खुशी से नाचने लगे।
लोग चिल्लाए—
“बारिश आ गई!”
देवगढ़ के छोटे-छोटे बाँध पानी से भर गए।
खेतों में हरियाली लौट आई।
गाँव वालों ने विराज को गले लगा लिया।
भीमा नायक हँसते हुए बोला—
“तुम हमारे वर्षा के राजा हो!”
विराज ने महसूस किया कि असली खुशी धन या प्रतिष्ठा में नहीं है।
वह तो दूसरों के जीवन में बदलाव लाने में है।
अब उसके भीतर की बेचैनी शांत हो गई थी।
उसे समझ आ गया था—
जीवन का अर्थ सेवा और साहस में है।
कुछ महीनों बाद विराज बनारस लौटा।
संध्या ने पूछा—
“क्या तुम्हें जवाब मिल गया?”
विराज मुस्कुराया।
“हाँ।”
अब वह पहले जैसा आदमी नहीं था।
उसने अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा ग्रामीण विकास में लगाना शुरू किया।
जल संरक्षण, शिक्षा और खेती के लिए उसने कई योजनाएँ शुरू कीं।
कई साल बाद देवगढ़ के बच्चे एक कहानी सुनाते थे—
“एक शहर से एक अजीब आदमी आया था।
वह बहुत गलतियाँ करता था, लेकिन हार नहीं मानता था।
और एक दिन उसने हमारे गाँव में बारिश ला दी।”
उसका नाम था—
विराज प्रताप सिंह – वर्षा का राजा।”
✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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