*“वो सात दिन !..”*
“आकाश उस दिन असामान्य रूप से शांत था।
बादलों की परतें जैसे किसी अदृश्य आदेश की प्रतीक्षा में ठहरी थीं—न गर्जना, न चमक, न हवा का वेग। फिर अचानक, समय जैसे टूट गया। एक साथ दिव्य बिजली का प्रचंड प्रहार हुआ और नमन झा तथा अमर भरूचा दोनों भस्म हो गए। क्षण भर में उनके शरीर नष्ट हो चुके थे, पर उनकी आत्माएँ अब भी सृष्टि और विनाश के बीच झूल रही थीं—न पूरी तरह मुक्त, न पूरी तरह विलीन।
उस क्षण को गुरु तपन सिन्हा ने देखा। उनकी आँखों में करुणा थी, पर हाथों में निर्णय। वे जानते थे—यदि अभी कुछ न किया गया, तो यह केवल दो जीवन नहीं, बल्कि संतुलन का एक पूरा अध्याय खो देगा। उन्होंने अपने जीवन की सबसे बड़ी तपस्या का संकल्प लिया। सात-रंगी पवित्र कमल—जो केवल तभी खिलता है जब सृष्टि का संतुलन डगमगाता है—उसकी समस्त शक्ति उन्होंने नमन और अमर के लिए अर्पित कर दी। प्रकाश फैला, ऊर्जा जगी, और दोनों के शरीर पुनः बने। पर वे काँच की तरह नाज़ुक थे—ज़रा-सी चूक उन्हें फिर मिटा सकती थी।
उधर अरबियन सागर के गहन गर्भ में, जहाँ जल भी मौन में सांस लेता है, सिंहासन पर बैठे थे अमित भरूचा—समुद्र-राजा, और अमर के पिता। उन्हें यह समाचार मिला कि उनका पुत्र अब इस लोक में नहीं रहा। शोक ने उनके भीतर क्रोध का रूप ले लिया। लहरें उफन पड़ीं, ज्वार चढ़ आया। उन्होंने गुरु शुकबिंदर गंगवा को आदेश दिया—महल के नीचे क़ैद राक्षसों और चारों समुद्रों के अन्य तीन भूत किंग्स के साथ मिलकर दमन पर आक्रमण करो।
दमन पर अँधेरा छा गया।
धुआँ, चीखें और टूटी हुई उम्मीदें—सब एक साथ।
अमर भरूचा, अपनी नाज़ुक देह के बावजूद, नगर की रक्षा के लिए आगे बढ़ा। उसने अपनी सीमा से परे जाकर शक्ति लगाई, और वही उसकी देह के विघटन का कारण बनी। तभी अमित भरूचा के भीतर कुछ टूटकर शांत हुआ। क्रोध की जगह विवेक ने ली। उन्होंने युद्धविराम का प्रस्ताव रखा—एक अंतिम अवसर।
शर्तें कठिन थीं, पर न्यायसंगत।
सात दिनों तक अमर और नमन, नमन के शरीर को साझा करेंगे।
तीन परीक्षाएँ पूरी करनी होंगी।
अमरता प्राप्त करनी होगी।
और एक ऐसी औषधि लानी होगी, जो पवित्र कमल को पुनर्जीवित कर अमर को नया शरीर दे सके।
इन परीक्षाओं का विधान रचा स्वर्गीय दमन संप्रदाय के प्रमुख—अजगर बाहुबली ने। उसकी मुस्कान में धर्म का मुखौटा था, पर आँखों में सत्ता की भूख। उसके शिष्य निगरानी करेंगे—वे कार्य जो सामान्यतः दानव-शिकारी करते हैं। परीक्षा नहीं, चयन था—कि कौन बचे और कौन मिटे।
नमन झा के भीतर दानवी प्रकृति थी। उसे छिपाने के लिए वह नींद की गोलियाँ लेता, जिससे अमर अस्थायी रूप से उसके शरीर पर पूर्ण नियंत्रण पा लेता। यही वह सात दिन थे—जहाँ दो आत्माएँ एक देह में सांस लेती थीं। पहली परीक्षा में उन्होंने मर्मोट दानवों के गाँव को परास्त किया। दूसरी में उस गुरु को हराया, जो “दिउ” परीक्षाओं के लिए दानवों को प्रशिक्षित करता था। हर विजय के साथ उनका बंधन गहराता गया—दो आत्माएँ, एक देह, एक लक्ष्य।
इसी बीच अमित भरूचा ने सायन गंगवा को दमन की रक्षा सौंपी। वर्षों बाद सायन की अपने छोटे भाई से भेंट हुई—पर यह मिलन अल्पकालिक था। शिवा जी गंगवा ने नमन की दूसरी परीक्षा देखी, जहाँ सायन परिवार के मुखिया नयन झांगवा को संप्रदाय की सेनाएँ हिंसक ढंग से उठा ले गईं। शिवा जी गाँव पर हुए आक्रमण और लूट की कथा सायन तक पहुँचाने में सफल हुए—और फिर अपनी चोटों से प्राण त्याग दिए।
तीसरी परीक्षा से पहले समाचार आया—
दमन नष्ट हो चुका है।
नमन झा का धैर्य टूट गया।
क्रोध ने उसे अकेले आगे बढ़ने को विवश किया।
उसने पत्थर के दानव शी जी को पराजित किया, अमरता प्राप्त की और औषधि हासिल की। गुरु तपन ने उसी औषधि से पवित्र कमल को पुनर्जीवित कर अमर भरूचा का शरीर फिर से रचा। पर अब सत्य का दूसरा चेहरा सामने आने वाला था।
नमन, बाहुबली की सेनाओं के साथ मिलकर भूतों को एक विशाल कड़ाहे में फँसाने लगा—जहाँ भूत और दानव औषधियों में बदले जाने थे। तभी अन्य तीन भूत किंग्स ने अमित भरूचा को धोखा दिया और बुलंदी से मिलकर कड़ाहे से निकल भागे।
उसी क्षण ललित स्वामी और माता यशोमती, अमर और गुरु तपन के साथ वहाँ पहुँचे। सच्चाई उजागर हुई—दमन का विनाश भूतों ने नहीं, बाहुबली ने कराया था। संप्रदाय का उद्देश्य था—अमित भरूचा को दोषी ठहराकर भूतों का संहार और स्वर्गीय सत्ता का एकछत्र राज।
भयानक युद्ध छिड़ गया। अंततः बाहुबली ने नमन के समूह को कड़ाहे में फेंक दिया। ताप बढ़ता गया। कैदी अमृत में बदलने लगे—माता यशोमती भी। नमन का हृदय टूट गया। उसी क्षण उसने कड़ाहे की समाधि अग्नि को अपने भीतर समाहित कर लिया। उसका शरीर दृढ़ हुआ—और वह नए रूप में जन्मा।
भूतों और दानवों के साथ मिलकर नमन और अमर ने कड़ाहे को तोड़ डाला। स्वर्गीय सेनाएँ पीछे हट गईं। युद्ध समाप्त हुआ, पर संघर्ष नहीं।
अमित भरूचा शेष भूतों को समुद्र के गुप्त अंधकार में ले गए। अमर भरूचा दमन में रुक गया—नमन के साथ—ताकि बाहुबली के असली स्वरूप को संसार के सामने लाया जा सके।
मध्यांतर दृश्य में, बाहुबली एक गुप्त कारागार में सायन गंगवा और उसके पिता नयन झांगवा को अपने पक्ष में करने आता है। घावों पर उपहास करने वाले प्रहरी को वह नींद का श्राप देता है—और स्वयं उसी कारागार में फँस जाता है। नमन झा के बड़े शनीचर भाई—जानवीर और मिलिंद—बाहुबली से मिलने आते हैं, पर वह वहाँ नहीं मिलता।
कहानी यहीं नहीं रुकती।
क्योंकि जहाँ समाधि अग्नि जलती है—
वहाँ सत्य एक दिन अवश्य प्रकट होता है।
*✍️ सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, IOA
सेल, आईएसपी, बर्नपुर
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