“इतिहास गवाह है बलिदानों का,
हर कण में शहीदों की साँस बसी।
जिस मिट्टी को हमने रक्त से सींचा,
आज वहीं बेगुनाहों की चीखें फँसी।
उन्नीस सौ इकहत्तर की रण-ध्वनि में,
हमने केवल युद्ध नहीं—पहचान रची,
दस हज़ार ज़ख़्म, साढ़े तीन हज़ार बलिदान,
ताकि किसी और की सुबह हँसी।
पर आज “शांति” एक खोखला शब्द,
हकीकत में दहशत का नंगा नाच।
मंदिर जले, विश्वास लहूलुहान,
कानून मौन, मानवता बेबस-लाचार।
दीपू की देह नहीं—चेतावनी जली,
पेड़ से लटकी, आग में राख हुई।
दिन-दहाड़े जब भीड़ देव बन बैठे,
तो समझो सभ्यता शर्म से झुकी।
जनगणना के आँकड़े चीख-चीख कहें—
यह पलायन नहीं, यह सुनियोजित वार।
प्रतिशत घटते, प्रार्थनाएँ टूटतीं,
दुनिया देखे—और करे इंकार।
हम युद्ध भूल बैठे, लड़ना छोड़ा,
नाम भर के वंशज—छत्रपति, महाराणा।
पराक्रम की लौ को ढोंग ने ढक दिया,
मंत्र में उलझा, छूटा विज्ञान का ताना-बाना।
जाति-जाति में बँटा समाज,
अपनी ही जड़ें खुद काट रहा।
दीया ही न बचे तो बाती किसकी?
धर्म न रहे तो पहचान क्या रहा?
बाहर आग—भीतर चुनावी गणित,
एक स्वर उठे तो राहत आए।
मौन की कीमत इतिहास वसूलता है,
आज न जागे तो कल वही घाव खाए।
याद रखो—जो आज पराया दुख है,
कल वही अपने द्वार खड़ा होगा।
कट्टरता के आगे सब एक से होते,
न नाम बचेगा, न क़बीला होगा।
अब बहस नहीं—बस एकता चाहिए,
जाति नहीं—सनातन पहचान चाहिए।
ताक़त यंत्र से भी, विवेक से भी,
अंधविश्वास नहीं—ज्ञान चाहिए।
नेतृत्व से कहो—निंदा से आगे बढ़ो,
कानून को भीड़ पर भारी करो।
दुनिया से कहो—चयनित मौन छोड़ो,
मानवाधिकारों का सच स्वीकारो।
शहीदों का रक्त यह प्रश्न पूछे—
क्या उनकी क़ुर्बानी यूँ ही जाएगी?
यह भूमि शांति के नाम पर नहीं,
उत्पीड़न की आग में जल जाएगी?
सुनो समय की गर्जना, सिंहनाद—
सिंहासन खाली करो कि भारत आ रहा है।
मौन नहीं, न्याय की पदचाप है यह,
इतिहास फिर से करवट ले रहा है।”
✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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