*“धरती और धड़कन !..”*
बनियारा… झारखंड, हंसडीहा-दुमका के पास बसा हुआ वह छोटा-सा गाँव, जहाँ सुबहें हमेशा पक्षियों की तेज़ चहचहाहट से शुरू होती थीं और रातें मिट्टी की सौंधी गंध से भरी होती थीं। उसी मिट्टी में एक साधारण-सा घर था—फूस की छत, मिट्टी की दीवारें, और आँगन में लगे दो आम के पेड़।
यही घर था सत्यनारायण का—एक गरीब किसान, लेकिन दिल का राजसी।
सत्यनारायण के दिन का आरंभ सूरज से पहले होता था। वह धोती पहनकर, काँधे पर फावड़ा उठाकर खेतों की ओर निकल जाता था। गाँव के लोग कहते—
“यह लड़का मेहनत को भी शर्मिंदा कर दे।”
अपने बूढ़े पिता का वह बहुत आदर करता था। पिता जी का शरीर अब साथ नहीं देता था, लेकिन सलाहें आज भी खेत की मिट्टी जैसी उपयोगी थीं।
उसकी शादी हुई थी सौमित्रा मंडल से—मंडल परिवार की बेटी, जो गाँव में संपन्नता और मान-प्रतिष्ठा के लिए जानी जाती थी। उस परिवार की बेटी का एक गरीब किसान के घर आना गाँव वालों के लिए किसी कहानी जैसा था।
कई लोग पूछते—
“मंडल की बेटी वहाँ क्यों गई?”
और उत्तर हमेशा एक ही आता—
“क्योंकि वह लड़की दिल देखती है, दौलत नहीं।”
सौमित्रा शांत थी, पर उसकी आँखों में इतनी दृढ़ता थी कि कठिनाइयाँ भी डर जाएँ। वह सुबह-सुबह नीम के नीचे बैठकर दही जमा देती, रोटी बेलती, चूल्हा जलाती और फिर सत्यनारायण के साथ खेतों पर निकल जाती।
दोनों एक टीम थे—धरती से बात करने वाली टीम।
सूरज ढलता, पर दोनों की मेहनत नहीं ढलती। खेतों में फसलें भी जैसे उनके प्रेम का ही प्रतिबिंब थीं—हरी-भरी, लहराती हुई।
धीरे-धीरे हालात सुधरने लगे।
हर साल थोड़ा-थोड़ा बचत…
और फिर वह दिन आया जब सत्यनारायण ने गाँव में थोड़ी और जमीन खरीदी।
उसने जमीन को माथे से लगाया और कहा—
“जमीन ही असली धन है, इसके बिना मनुष्य अधूरा है।”
सौमित्रा मुस्कुराई—
“धरती हमें कभी धोखा नहीं देती।”
और जैसे धरती उनकी मेहनत पर मुस्कुरा रही थी, जीवन में नई-नई खुशियाँ आती रहीं।
दो बच्चे हुए—रवि और गौरी।
घर में हँसी गूँजने लगी।
रातों में चूल्हे की लौ के आसपास परिवार बैठकर कहानियाँ सुनता, और सुबहें नए सपनों के साथ शुरू होतीं।
लेकिन…
जीवन हमेशा एक जैसा रहता तो जीवन कहलाता ही नहीं।
एक साल बारिश समय पर नहीं आई।
फसलें आधी सूख गईं।
तालाब का पानी धीरे-धीरे सिकुड़कर एक छोटे से गड्ढे में बदल गया।
गाँव में भूख की हवा बहने लगी—किसी के घर में चावल खत्म, किसी के घर में दाल का दाना नहीं।
सत्यनारायण रोज़ आकाश की ओर देखता—
“बस एक बादल मिल जाए… बस एक बारिश…”
लेकिन बादल भी जैसे किसी और दिशा में भटक गए थे।
सौमित्रा ने अपने पाजेब बेचे, फिर चूड़ियाँ।
गौरी रोती—
“माँ… ये क्यों बेचती हो?”
सौमित्रा उसे सीने से लगा लेती—
“बेटी, कभी-कभी गहने नहीं, पेट की भूख बड़ी हो जाती है।”
आख़िर वह दिन आया, जब घर का अंतिम मुट्ठी चावल भी खत्म हो गया।
पिता जी सिर पकड़कर बैठ गए।
“अब क्या करेंगे, बेटा?”
लंबे मौन के बाद सत्यनारायण बोला—
“जाना होगा… गाँव छोड़कर। पुरब की ओर। कोलकाता।”
सौमित्रा ने एक गहरी सांस ली।
वह जानती थी कि यह निर्णय आसान नहीं। वह मंडल परिवार की बेटी थी—जिसने कभी घर से बाहर खेत की मेड़ तक अकेले पैर न रखा था।
लेकिन आज…
जीवित रहने के लिए उसे अपने सारे अहंकार और सारी शान छोड़नी थी।
संपत्ति के नाम पर केवल दो बिस्तर, एक लोटा, और कुछ कपड़े।
सबकुछ बाँधकर एक पुरानी बैलगाड़ी में रखा और परिवार निकल पड़ा।
कोलकाता की दूरी लंबी थी—दिन-रात सफर करते हुए।
गाँव की मिट्टी पीछे छूटती जा रही थी और आँखों में अनिश्चित भविष्य का धुआँ भरता जा रहा था।
जब वे कोलकाता पहुँचे, शहर का शोर कानों को चीर गया।
ऊँची-ऊँची इमारतें…
भिखारियों की लंबी कतारें…
कारखानों से निकलता काला धुआँ…
ट्राम की खड़खड़ाहट…
सौमित्रा ने धीरे से सत्यनारायण का हाथ पकड़ा।
“हम यह सब झेल लेंगे, बस साथ रहना।”
कोलकाता में रहने के लिए कोई झोपड़ी नहीं मिली।
एक दिन काम खोजते-खोजते, वह हुगली नदी के किनारे पहुँच गया, जहाँ मजदूर बोरी ढो रहे थे।
थकान, धूल और पसीने से भरी जगह।
एक मुखिया ने सत्यनारायण को देखकर पूछा—
“कितना बोझ उठा लेगा?”
सत्यनारायण ने जवाब दिया—
“जितना घर को बचाने के लिए ज़रूरी हो।”
और वह कोलकाता का मजदूर बन गया।
दिन भर बोरी ढोता, सामान लादता, रस्सियाँ खींचता।
हाथों में छाले, कंधों में दर्द।
पर हर शाम घर लौटकर बच्चों को जरूर हँसाने की कोशिश करता।
सौमित्रा भी पीछे नहीं रही।
एक अमीर घर में बर्तन साफ करने और झाड़ू-पोछा लगाने का काम मिला।
उसके हाथ जो कभी हल्दी और कुमकुम से रंगे रहते थे, अब साबुन और राख से फटने लगे।
लेकिन… वह हारी नहीं।
उसकी समझदारी, बचत, और सफाई से घर में धीरे-धीरे कुछ रुपए इक्ठ्ठा होने लगे।
रात को दोनों बच्चे सो जाते, तब पति-पत्नी आँगन में बैठकर चुपचाप आसमान देखते—जहाँ एक सितारा हमेशा ज्यादा चमकता था।
सौमित्रा कहती—
“यही हमारा गाँव है… आसमान का यही कोना। चाहे जहाँ रहें।”
उनकी आँखों में उम्मीद का एक छोटा-सा दीप जलता रहता।
कोलकाता की मिट्टी पर जो आँसू गिरे थे, वे बेकार नहीं गए।
दो साल की कड़ी मशक्कत ने सत्यनारायण और सौमित्रा को फिर थोड़ा सक्षम बना दिया।
कुछ बचत, कुछ ताक़त, और बहुत सारी सीख—ये सब साथ लेकर एक सुबह उन्होंने निर्णय लिया—
“अब लौट चलें अपने गाँव… बनियारा।”
जब बैलगाड़ी बनियारा की कच्ची सड़क पर मुड़ी, तो धूल ही नहीं, भावनाएँ भी हवा में उड़ने लगीं।
गाँव के लोग हैरान थे—
“जो एक समय भूख से लड़ रहा था, वह फिर लौट आया है?”
लेकिन सत्यनारायण के चेहरे पर आत्मविश्वास था।
वह खेत की मिट्टी को छूकर बोला—
“हम फिर से उगाएँगे… फिर से शुरू करेंगे।”
सौमित्रा ने घर को साफ किया, टूटे हिस्से ठीक किए, पुराने बर्तनों को रगड़कर चमकाया।
सभी काम मानो उसकी थकी आत्मा को फिर से जीवंत कर रहे थे।
नई प्रेरणा, नई उम्मीद।
सत्यनारायण दिन-रात खेतों में काम करने लगा।
इस बार अनुभव साथ था—किस मौसम में कौन फसल बोनी है, किस तरह पानी बचाना है, कैसे अनाज रखना है।
और फिर… धरती ने चमत्कार दिखाया।
फसलें पहले से बेहतर हुईं।
धान के खेत सोने की चादर बन गए।
तिल और गेहूँ की पैदावार बढ़ी।
लोग कहने लगे—
“सत्यनारायण की किस्मत खुल गई।”
लेकिन किस्मत नहीं—मेहनत खुली थी।
धीरे-धीरे वह गाँव का प्रमुख किसान बन गया।
नई जमीन खरीदी, बैलों की जोड़ी ली, नए लोग काम पर रखे।
परंतु… धन कभी अकेला नहीं आता
जैसे-जैसे धन आया, सत्यनारायण बदलने लगा।
अब वह खेत पर कम जाता, मजदूरों पर ज्यादा निर्भर रहने लगा।
घर में भी उसका मन कम रहता।
बच्चों की बातें उसे कम सुनाई देतीं और सौमित्रा की सलाहें उसे पुरानी लगने लगीं।
सौमित्रा अक्सर कहती—
“सावधान रहना… संपत्ति जितनी बढ़े, मन उतना विनम्र होना चाहिए।”
लेकिन सत्यनारायण के कानों तक वह आवाज पहुँचती ही नहीं थी।
एक समय आया जब सौमित्रा के शरीर ने जवाब देना शुरू कर दिया।
सालों की मेहनत, तप, और थकान ने उसे भीतर से खोखला कर दिया था।
वह कम बोलने लगी, अधिक लेटने लगी।
एक दिन वह खेत की मेड़ पर बैठी चुपचाप आसमान देख रही थी।
सत्यनारायण वहाँ से गुज़रा भी…
लेकिन रुककर पूछा तक नहीं—
वह अपनी नई जमीन देखने में व्यस्त था।
रात को सौमित्रा ने धीमी आवाज़ में कहा—
“तुम अब बदल गए हो, सत्य… जमीन बहुत पा ली, पर मन की धरती सूखने लगी है।”
लेकिन सत्यनारायण ने इसे बीमारी की बात समझकर टाल दिया।
कुछ महीनों बाद, उसकी हालत इतनी बिगड़ गई कि वह उठ भी नहीं पाती थी।
बच्चों ने पिता से कहा—
“बाबा, माँ को शहर ले चलिए इलाज के लिए।”
पर उसने हाथ उठा दिया—
“अभी खेत में काम का समय है… फसल काटनी है।”
सौमित्रा यह सुनकर बस मुस्कुराई।
मन में एक चुभन, लेकिन चेहरे पर शांति।
उसी शांति के साथ, एक सुबह वह दुनिया से चली गई—इतनी चुपचाप, जैसे किसी ने दीपक की लौ बिना हवा के बुझा दी हो।
सौमित्रा की मृत्यु ने उसके चारों ओर एक विशाल खालीपन छोड़ दिया।
वह घर में चलता तो हर कोने से उसकी यादें झरतीं—
उसकी चूड़ियों की खनक, चूल्हे की आंच में उसका चेहरा, बच्चों को पुकारने की उसकी मधुर आवाज़।
लेकिन समय क्रूर है।
लोग कहते—
“दुःख भी आदत बन जाता है।”
सत्यनारायण का दुःख भी धीरे-धीरे पत्थर बन गया।
साल बीत गए।
सत्यनारायण बूढ़ा हो रहा था।
रवि अब जवान हो चुका था—शहर से पढ़कर लौट रहा था।
एक दिन उसने अपने पिता से कहा—
“बाबा, जमीन बेच देते हैं। मैं शहर में बिजनेस करना चाहता हूँ।”
ये सुनते ही सत्यनारायण की रगों में खून मानो ठहर गया।
वह उठकर बैठ गया—
“जमीन बेचना? यह तो तुम्हारी माँ की आखिरी निशानी है… यही तो हमारी पहचान है!”
रवि हल्का हँसकर बोला—
“इन सब पुरानी बातों का अब क्या मतलब? जमीन से कौन अमीर होता है?”
और यह वाक्य सुनते ही सत्यनारायण के भीतर वर्षों से दबा दर्द फूट पड़ा।
उसने कांपती आवाज़ में कहा—
“बेटा… इंसान जमीन से अमीर नहीं होता… जमीन इंसान को अमीर रखती है।
जिस दिन तुम इसे छोड़ दोगे, तुम खुद को खो दोगे।”
लेकिन रवि आगे बढ़ चुका था।
नई पीढ़ी के सपने पुराने मूल्यों को कहाँ समझते हैं?
उस रात सत्यनारायण खेत में गया।
वह उसी जगह बैठा जहाँ सौमित्रा बैठा करती थी।
मुट्ठी भर मिट्टी उठाकर आँखों से लगाया—
“मैंने सब कुछ इसी मिट्टी से पाया… और आज सबकुछ इसी के साथ छोड़ जाना चाहता हूँ।”
धीरे-धीरे वह जमीन पर लेट गया।
आसमान में वही पुराना चमकता सितारा उसे दिखाई दिया—
वही, जिसे कोलकाता में सौमित्रा देखा करती थी।
उसकी आँखें बंद हुईं।
एक लंबी साँस…
और फिर शांत।
सत्यनारायण अपने सबसे प्रिय मित्र—जमीन—की गोद में हमेशा के लिए सो गया।
सत्यनारायण की कहानी सिर्फ एक किसान की कहानी नहीं थी।
यह कहानी थी—
धरती से प्रेम की
मेहनत और संघर्ष की
रिश्तों के महत्व की
और अंत में, धन के मोह से रिश्तों के टूटने की।
सौमित्रा की निस्वार्थता और सत्यनारायण का जमीन से जुड़ाव जीवनभर बना रहा, परंतु धन के आने से जो दूरी दिलों में आई, उसने धीरे-धीरे परिवार की आत्मा को खोखला कर दिया।
और अंत में यह प्रश्न छोड़ गई—
“असली अमीरी क्या है?
जमीन, धन, या अपने प्रियजन?”
✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*










