Dastak Jo Pahunchey Har Ghar Tak

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*“आँखें !..मुंबई ब्लैकआउट 2004.”* *“ये शहर है अमन का,* *यहाँ की फ़िज़ा है निराली।* *यहाँ पे सब शांति-शांति है,* *यहाँ पे सब शांति-शांति है…!”*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

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*“आँखें !..मुंबई ब्लैकआउट 2004.”*

*“ये शहर है अमन का,*
*यहाँ की फ़िज़ा है निराली।*
*यहाँ पे सब शांति-शांति है,*
*यहाँ पे सब शांति-शांति है…!”*

मुंबई, 2004।

समुद्र की लहरों, लोकल ट्रेनों की चीखती पटरियों, चौपाटी की हवा और मिलों की बंद होती चिमनियों के बीच यह शहर हर रोज़ अपने लोगों को निगलता और फिर अगले दिन नए सपनों के साथ उगल देता था।
डॉ. आदित्य देशमुख इस शहर के उन लोगों में से थे, जो आँखों की रोशनी लौटाने का काम करते थे। गिरगांव में उनका छोटा-सा नेत्र-चिकित्सा क्लिनिक था। सुबह से शाम तक कतारें लगी रहतीं—कभी किसी मज़दूर की आँख में लोहे का कण, कभी किसी बुज़ुर्ग का धुँधलाता संसार।
उनकी पत्नी नयना देशमुख एक स्कूल में हिंदी पढ़ाती थीं। नयना की आँखें बहुत कुछ देख लेती थीं—सिर्फ़ किताबें नहीं, इंसानों के मन भी।
उस सुबह, 17 जुलाई 2004 को, शहर ने पहली बार अपनी आँखें खोनी शुरू कीं।

सुबह 8:42 की लोकल ट्रेन—चर्चगेट से विरार।
डब्बा नंबर 3 में बैठे राजीव मल्होत्रा, एक शेयर ब्रोकर, अचानक चीखे।
“कुछ दिख नहीं रहा… सब सफ़ेद…!”
लोगों ने सोचा—पैनिक अटैक।
लेकिन अगले दस मिनट में उसी डब्बे में तीन और लोग दीवारों से टकराने लगे।
स्टेशन पहुँचते-पहुँचते राजीव पूरी तरह अंधा हो चुका था।
उसे सीधे गिरगांव लाया गया—डॉ. आदित्य के क्लिनिक में।
आदित्य ने जाँच की। आँखों की पुतलियाँ सामान्य थीं। नर्व सही थीं। कोई संक्रमण नहीं।
फिर भी—अंधापन।
“यह मेडिकल साइंस से बाहर है,” आदित्य ने बुदबुदाया।
शाम तक ऐसे सात मरीज़ आ चुके थे।

दो दिन में संख्या सैकड़ों में थी।
तीन दिन में—हज़ारों।
अख़बारों की हेडलाइन बदल गई—
“मुंबई में रहस्यमय अंधत्व”
“सफेद अंधकार का आतंक”
सरकार ने इसे “संभावित जैविक संक्रमण” घोषित कर दिया।
धारावी के पास एक पुराना मानसिक अस्पताल—साने गुरुजी आश्रम—को क्वारंटीन सेंटर बना दिया गया।
डॉ. आदित्य को आदेश मिला—
“आप पहले मरीजों में शामिल हैं। आपको भी अंदर जाना होगा।”
नयना उनके साथ थीं।

आश्रम की दीवारें ऊँची थीं, लेकिन भीतर हालात उससे भी डरावने।
हज़ारों अंधे लोग।
गंदगी।
भूख।
चीखें।
पहले दिन राशन आया। दूसरे दिन देर से। तीसरे दिन आधा।
सैनिक बाहर थे—बंदूकें तनी हुईं।
डर उनकी आँखों में भी था।
नयना ने महसूस किया—
वह अब भी देख सकती है।
उसने किसी को नहीं बताया।
आदित्य भी अंधे हो चुके थे।

दिनों में सभ्यता गलने लगी।
शौचालय भर गए।
बीमारियाँ फैलने लगीं।
इमरान शेख, एक टैक्सी ड्राइवर, ने व्यवस्था बनाने की कोशिश की।
सरला ताई, एक मिल मजदूर की विधवा, बच्चों को संभालती थी।
राहुल पाटील, कॉलेज छात्र, सबके लिए पानी लाता।
पर व्यवस्था टिक नहीं पाई।
खाने की ट्रक जब अनियमित होने लगी, तब अंधों में जानवर जाग उठा।

एक रात, वार्ड नंबर 4 से आवाज़ आई—
“खाना हमारा है!”
विक्रम सावंत—पूर्व गैंगस्टर—ने हथियार जमा कर लिए थे।
उसके लोग लाठियों और चाकुओं से लैस थे।
उन्होंने घोषणा की—
“खाना चाहिए तो हमारी शर्तें मानो।”
शर्तें अमानवीय थीं।
नयना सब देख रही थी।
और भीतर टूट रही थी।

तीन औरतें उस रात नहीं लौटीं।
सरला ताई की बेटी भी।
नयना ने पहली बार हस्तक्षेप किया।
उसने चुपचाप एक कैंची उठाई।
रात के अंधेरे में—जहाँ सब अंधे थे—वह अकेली देखने वाली थी।
विक्रम सावंत उस रात मरा।
गला कटा हुआ।
किसी ने नहीं देखा।
सिवाय नयना के।

अगले दिन अफरा-तफरी मच गई।
लड़ाई।
चीखें।
किसी ने आग लगा दी।
धुआँ फैल गया।
लोग दीवारें तोड़ते हुए बाहर निकले।
और बाहर—
कोई सैनिक नहीं।
सरकार भाग चुकी थी।

बाहर की मुंबई—पहचानी नहीं जाती थी।
लोकल ट्रेनें बंद।
पुलिस नदारद।
दुकानें लूटी हुईं।
अंधे लोग झुंड में घूमते, खाने के लिए लड़ते।
नयना, आदित्य, इमरान, सरला ताई, राहुल—एक छोटा परिवार बन गए।
वे गिरगांव के उसी फ्लैट में पहुँचे, जहाँ कभी हँसी गूँजती थी।

नयना छुपकर सबको रास्ता दिखाती।
रात को।
आदित्य फिर से डॉक्टर बन गए—बिना आँखों के।
वे नियम बनाते—
“हिंसा नहीं।”
“सबका हिस्सा बराबर।”
धीरे-धीरे आसपास के लोग जुड़ने लगे।
एक छोटा समाज जन्म ले रहा था।

एक सुबह—
आदित्य ने कहा,
“नयना… मुझे… कुछ दिख रहा है।”
एक घंटे में—
इमरान।
राहुल।
सरला ताई।
पूरी मुंबई में—
रोशनी लौट आई।
जैसे आई थी, वैसे ही चली गई थी—
बिना कारण।

सब खुश थे।
पर नयना चुप थी।
रात को आदित्य ने उससे पूछा—
“तुम कभी अंधी नहीं हुईं थीं, है ना?”
नयना मुस्कुराई।
“नहीं।”
“क्यों?”
नयना ने खिड़की से बाहर देखा।
मुंबई फिर जग रही थी।
“क्योंकि यह बीमारी आँखों की नहीं थी, आदित्य…
यह अंतरात्मा की रोशनी बुझने की महामारी थी।
और जिनकी अंतरात्मा बची रही…
वे देख सकते थे।”
आदित्य सन्न रह गए।
“और विक्रम?”
नयना ने धीरे से कहा—
“कभी-कभी…
रोशनी बचाने के लिए
अंधेरे को मारना पड़ता है।”
बाहर शहर में फिर से लाइटें जल रही थीं।
लेकिन आदित्य समझ चुके थे—
असली अंधापन कभी गया ही नहीं।”

*✍️ सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, IOA
सेल, आईएसपी, बर्नपुर
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#युवा