*”आप सभी को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।”*
*“आईएसपी वाली दीदी!!..”*
“पिछले 2–3 दिनों से मैं लगातार बर्नपुर स्टेशन जा रहा था। वहाँ मैंने रोज़ एक रेहड़ी वाले को देखा।
“बाबूजी, केला के दाम का बा?”
रामदुलारे ने फलों के थोक विक्रेता पन्नालाल से पूछा।
“पचास रुपये दर्जन मिलेंगे।” पन्नालाल ने कहा।
रामदुलारे ने आश्चर्य से कहा—
“अरे भगवान! ई सब तो बहुत महंगा बा। ग्राहक अइसन महंगा केला ना खरीदीहे।”
पन्नालाल ने गहरी साँस लेते हुए कहा—
“पीछे से ही माल बहुत महंगा आ रहा है। कुछ भी बचत नहीं होती। लेकिन क्या करें रामदुलारे, मजबूरी है… पापी पेट का सवाल है।”
रामदुलारे ने अनमने मन से कुछ दर्जन केले खरीदे, उन्हें अपनी रेहड़ी पर सजाया और बेचने निकल पड़ा।
कुछ देर बाद वह के-टाइप कॉलोनी की सड़कों पर आवाज लगा रहा था—
“केला ले लो… मीठा केला…”
दोपहर हो चुकी थी, लेकिन अभी तक एक भी केला नहीं बिका था। उसकी आवाज क्वार्टरों और आसपास के घरों के बीच कहीं दबकर रह जाती थी।
गर्मी से परेशान होकर रामदुलारे एक घर की बड़ी दीवार की छाया में बैठ गया। उसने अंगोछे से पसीना पोंछा और बीड़ी सुलगा ली। थोड़ी देर आराम करने के बाद उसने बीड़ी पाँव के नीचे मसल दी और फिर से रेहड़ी लेकर चल पड़ा।
तभी एक घर से महिला की आवाज आई—
“अरे केले वाले, केले क्या भाव दिए?”
एक महिला क्वार्टर से बाहर निकलते हुए रामदुलारे के पास आई।
रामदुलारे को उम्मीद की एक किरण दिखाई दी। उसने मन ही मन भगवान से प्रार्थना की कि कम से कम आज बोहनी हो जाए।
“दीदी जी, केला के दाम साठ रुपया दर्जन बा।”
यह कहकर रामदुलारे ने रेहड़ी उस घर के सामने रोक दी और केलों को उलट-पुलट करने लगा, शायद वह गल चुके केलों को छिपाने की कोशिश कर रहा था।
महिला बोली—
“यह तो बहुत महंगे हैं भैया।”
रामदुलारे बोला—
“दीदी जी, मंडी से माल महंगा हो रहल बा। का करई… आवे त दू-पाँच रुपया कम दे देई।”
महिला ने कहा—
“नहीं भैया, अभी कौन सा डॉक्टर ने बोला है खाने को। जब सस्ते हो जाएंगे तब ले लेंगे।”
इतना कहकर वह घर के अंदर चली गई।
रामदुलारे उसे जाते हुए ऐसे देख रहा था जैसे कोई उसकी उम्मीदें साथ ले गया हो।
धीरे-धीरे शाम हो गई, लेकिन रामदुलारे के केले बिके ही नहीं। कुछ केलों का रंग काला पड़ने लगा था, मानो उन्हें भी अपने न बिकने की चिंता हो।
आखिरकार थक-हारकर रामदुलारे अपनी झुग्गी की ओर लौट आया। उसने रेहड़ी दीवार के सहारे लगा दी और बोरी का पर्दा हटाकर कमरे में प्रवेश किया।
उसकी पत्नी विद्या, जो टूटी-फूटी चारपाई पर लेटी थी, उसके आने की आहट से जाग गई। बेटा विजय फर्श पर बोरी बिछाकर बैठा स्कूल का गृहकार्य कर रहा था।
विद्या ने धीमे से पूछा—
“आइल बाड़े का विजय के बाबूजी? आज कुछ केला बिकाइल कि ना?”
रामदुलारे ने गहरी साँस लेते हुए कहा—
“का बताईं विद्या… महंगाई बहुत बढ़ गईल बा। माल महंगा बा, लेकिन ग्राहक पुरान दाम पर खरीदना चाहतारे।”
विजय बोला—
“बाबूजी, माँ के बहुत तेज बुखार बा। दवाई भी खत्म हो गईल बा।”
रामदुलारे ने बेटे को दिलासा दिया—
“कवनो दिक्कत ना बेटा… काल्ह तोहरा माँ के दवाई लेके आईब।”
लेकिन उसके मन में चिंता बढ़ती जा रही थी। वह बाहर गया और केलों को ऐसे देखने लगा जैसे कोई डॉक्टर मरीज की हालत देखता है।
अब तो केले और भी काले पड़ गए थे। उसके मन में बस एक ही बात बार-बार आ रही थी—
काश जितने दाम में खरीदे हैं उतने में ही बिक जाएं।
अगले दिन भी उसने शहर के कई हिस्सों में फेरी लगाई, लेकिन कोई खास बिक्री नहीं हुई।
शाम को वह एक कॉलोनी के बाहर सड़क किनारे खड़ा हो गया, जहाँ रोज़ कई रेहड़ी वाले लाइन से खड़े हो जाते थे। लोग आते-जाते उनसे सामान खरीद लेते थे।
उसी रास्ते से रोज़ ऑफिस से घर लौटते समय अनामिका जी भी गुजरती थीं। उस दिन उन्होंने कोने में खड़े रामदुलारे को देखा। फटी कमीज, टूटी चप्पल और काले पड़ते केले देखकर उनके मन में दया जाग उठी।
उन्होंने पूछा—
“भैया, केले कैसे दिए?”
रामदुलारे ने धीरे से कहा—
“पचास रुपये दर्जन।”
“ठीक है, एक दर्जन दे दो। लेकिन अच्छे केले देना। तुम निकाल कर रखो, मैं आगे से कुछ सामान लेकर आती हूँ।”
यह कहकर अनामिका जी ने पैसे दिए और आगे बढ़ गईं। लेकिन गलती से उन्होंने 100 रुपये का नोट दे दिया था।
100 का नोट देखते ही रामदुलारे की आँखों के सामने बीमार विद्या और बेटे विजय का चेहरा घूमने लगा।
उसके मन में संघर्ष शुरू हो गया—
क्या अनामिका जी भूल गई होंगी?
क्या वह वापस आएंगी?
गरीबी और ईमानदारी के बीच उसकी अंतरात्मा लड़ रही थी।
आखिरकार उसने नोट अपनी जेब में रख लिया।
कुछ देर बाद अनामिका जी को अपनी गलती का एहसास हुआ और वह वापस आ गईं।
“अरे भैया, शायद मैंने तुम्हें सौ का नोट दे दिया है।”
रामदुलारे नजरें चुराते हुए बोला—
“न दीदी जी, आप पचास रुपया ही देले बानी।”
अनामिका जी समझ गईं कि वह झूठ बोल रहा है।
उन्होंने शांत स्वर में कहा—
“भैया, मुझे अच्छे से याद है कि मैंने सौ का नोट दिया था। लेकिन लगता है पैसे देखकर तुम्हारी नियत बदल गई। मैं तुम्हारी तलाशी नहीं लेना चाहती, लेकिन याद रखना—बेईमानी का पैसा कभी फलता नहीं।”
इतना कहकर वह आगे बढ़ गईं।
रामदुलारे को बहुत ग्लानि हुई।
कुछ दूर जाते ही उसकी अंतरात्मा ने उसे झकझोर दिया।
वह दौड़कर अनामिका जी के पास पहुँचा और बोला—
“दीदी जी, हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई। घर में बहुत परेशानी बा… मेहरारू बहुत बीमार बा। आपके सौ रुपये देख के नियत खराब हो गई। हमका माफ कर दीजिए दीदी जी।”
रामदुलारे की सच्चाई सुनकर अनामिका जी की आँखें नम हो गईं।
उन्होंने उसे 500 रुपये और दिए और कहा—
“जाओ, पहले अपनी पत्नी का इलाज करवाओ।”
उसी समय नगर निगम की गाड़ी आ गई और कर्मचारियों ने रेहड़ी वालों को हटाना शुरू कर दिया।
एक कर्मचारी रामदुलारे की रेहड़ी की ओर बढ़ा, लेकिन अनामिका जी ने विनम्रता से कहा—
“कृपया इन्हें मत हटाइए। ये लोग मेहनत करके अपना घर चला रहे हैं।”
कर्मचारी मान गए।
उस दिन रामदुलारे बहुत खुश था। वह बार-बार कह रहा था—
“आईएसपी वाली अनामिका दीदी बहुत अच्छी हैं।”
समय बीतता गया।
धीरे-धीरे रामदुलारे का कारोबार अच्छा चल पड़ा।
आज बर्नपुर स्टेशन बाजार में उसकी एक अच्छी फल की दुकान है।
उसका बेटा विजय डिप्लोमा पूरा करके आईएसपी प्लांट के ब्लास्ट फर्नेस विभाग में काम कर रहा है।
आज भी जब कोई ग्राहक उसकी दुकान से फल खरीदता है, तो रामदुलारे मुस्कुराकर कहता है—
“आईएसपी वाली अनामिका दीदी ने मेरी जिंदगी बदल दी!”
यह कहानी मेरी पत्नी की सबसे अच्छी दोस्त को समर्पित है।
✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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