*“आवाज़ें, जो मरती नहीं !..”*
पुरुलिया के घने साल जंगलों के बीच एक पुराना रास्ता था, जो अब नक्शों में भी नहीं दिखता था।
वह रास्ता काई और सूखे पत्तों से ढका हुआ था, जैसे वर्षों से किसी ने उस पर कदम न रखा हो।
उस रास्ते के अंत में खड़ी थी—चंद्रकोठी हवेली।
एक समय यह हवेली जीवन, हँसी और गर्व का प्रतीक थी।
अब यह सिर्फ़ एक खंडहर थी।
उसकी टूटी खिड़कियाँ अंधी आँखों की तरह दिखती थीं।
जंग लगा फाटक हवा में धीरे-धीरे हिलता था—और हर बार एक कराहती आवाज़ निकालता था।
यह हवेली कभी राजेन्द्र नारायण मुखर्जी की थी—पुरुलिया के सबसे प्रभावशाली जमींदार।
लेकिन अब—
यह हवेली किसी और की थी।
उनका नहीं।
जीवितों का नहीं।
1979 की एक भयावह रात थी।
आसमान में बिजली चमक रही थी।
बारिश इतनी तेज़ थी कि ऐसा लग रहा था जैसे आसमान फट गया हो।
हवेली के अंदर, एक कमरे में, सफेद चादर से ढकी एक लाश पड़ी थी।
वह थी—बिमला देवी।
राजेन्द्र नारायण की माँ।
आँगन में चार बच्चे खड़े थे—
अभिजीत – 17 वर्ष, गंभीर और जिम्मेदार
विकास – 5 वर्ष, मौन और अजीब
संदीप – 12 वर्ष, डरपोक
चांदनी – 8 वर्ष, जिज्ञासु और निडर
और उनके साथ थी—पुरानी सेविका, दुलारी।
दुलारी ने धीमी आवाज़ में कहा—
“आज हवेली जाग गई है…”
चांदनी ने पूछा—
“हवेली कैसे जाग सकती है, दुलारी?”
दुलारी ने उसकी ओर देखा।
उसकी आँखों में भय था।
“जब कोई इस हवेली में मरता है… तो वह जाता नहीं है।”
चांदनी का दिल तेज़ धड़कने लगा।
उस रात—
चांदनी आम के पेड़ पर चढ़ गई।
वह खिड़की से अंदर देख रही थी।
दादी माँ की लाश वहीं थी।
अचानक—
बिमला देवी की आँखें खुल गईं।
सीधे चांदनी की ओर।
उनकी आँखें काली थीं।
खाली।
और जीवित।
चांदनी चीख पड़ी।
जब सब लोग अंदर आए—
बिमला देवी की आँखें बंद थीं।
सबने कहा—
“तुमने सपना देखा।”
लेकिन चांदनी जानती थी।
वह सपना नहीं था।
हवेली जाग चुकी थी।
विकास अलग था।
वह कभी बोल नहीं पाया।
डॉक्टरों ने कहा—
“उसका दिमाग सामान्य नहीं है।”
लेकिन वे गलत थे।
विकास सामान्य नहीं था—
वह कुछ अधिक था।
वह रात में जाग जाता।
और दीवारों को देखता रहता।
एक रात—
वह उठा।
और धीरे-धीरे एक बंद कमरे के सामने गया।
उसने दरवाज़े को छुआ।
अंदर से आवाज़ आई—
ठक… ठक… ठक…
जैसे कोई बाहर आना चाहता हो।
विकास मुस्कुराया।
जैसे वह उस आवाज़ को पहचानता हो।
एक दिन दुलारी ने चांदनी से कहा—
“इस हवेली में सिर्फ़ हम नहीं रहते।”
चांदनी काँप गई।
“और कौन?”
दुलारी ने जवाब दिया—
“जो मर चुके हैं।”
उसने बताया—
वर्षों पहले, इस हवेली में कई मौतें हुई थीं।
कुछ प्राकृतिक।
कुछ नहीं।
और उनकी आत्माएँ—
यहीं रह गईं।
दीवारों में।
कमरों में।
हवेली की सांसों में।
1985।
चांदनी अब 14 साल की थी।
एक रात—
उसे किसी ने उसका नाम पुकारते हुए सुना।
“चांदनी…”
वह उठी।
कमरे में कोई नहीं था।
लेकिन आवाज़ फिर आई—
“हम यहाँ हैं…”
दीवार से।
चांदनी भागी।
लेकिन हवेली ने उसे जाने नहीं दिया।
दरवाज़ा बंद हो गया।
अपने आप।
अभिजीत बदलने लगा।
वह रात में जागता।
और किसी से बात करता।
“तुम कौन हो?” दुलारी ने पूछा।
अभिजीत ने जवाब दिया—
“वे… जो यहाँ रहते हैं।”
“वे कहते हैं… यह हवेली उनकी है।”
उसकी आँखें अब उसकी नहीं थीं।
1990।
चांदनी अब 19 साल की थी।
वह एक लड़के से मिली—
अमित सेन
अमित ने कहा—
“यह हवेली ठीक नहीं है।”
लेकिन चांदनी ने उसकी बात नहीं मानी।
एक रात—
अमित हवेली में आया।
अचानक—
सभी दरवाज़े बंद हो गए।
हवा ठंडी हो गई।
और आवाज़ आई—
“यह हमारी जगह है…”
अमित चीखा।
और भाग गया।
वह फिर कभी वापस नहीं आया।
1995।
अभिजीत गायब हो गया।
कोई निशान नहीं।
कोई शरीर नहीं।
लेकिन उसकी आवाज़—
अब भी सुनाई देती थी।
दीवारों से।
“मैं यहाँ हूँ…”
विकास अब 30 साल का था।
वह दीवारों से बात करता था।
एक रात—
उसने दीवार को छुआ।
और मुस्कुराया।
अगली सुबह—
वह मृत था।
उसकी आँखें खुली थीं।
और उनमें—
भय नहीं था।
शांति थी।
जैसे वह अब अकेला नहीं था।
चांदनी अब बूढ़ी हो चुकी थी।
वह हवेली छोड़ना चाहती थी।
उस रात—
वह आम के पेड़ पर चढ़ी।
जैसे बचपन में चढ़ी थी।
अचानक—
सभी खिड़कियाँ खुल गईं।
और आवाज़ आई—
“तुम हमें छोड़कर नहीं जा सकती…”
हवेली कांप रही थी।
जैसे जीवित हो।
चांदनी चीख पड़ी।
और—
गायब हो गई।
उपसंहार: आज भी…
आज भी—
चंद्रकोठी हवेली खड़ी है।
लोग कहते हैं—
रात में वहाँ आवाज़ें आती हैं।
एक लड़की की।
एक लड़के की।
एक बूढ़ी औरत की।
और एक मौन आदमी की—
जो कभी बोल नहीं पाया।
वे सब अब हवेली का हिस्सा हैं।
समय में कैद।
मृत्यु में जीवित।
और हवेली—
अब भी साँस ले रही है।
अब भी इंतज़ार कर रही है।
अगले व्यक्ति का।
जो उसकी आवाज़ सुनेगा।
क्योंकि—
कुछ आवाज़ें… कभी नहीं मरतीं।
✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*










