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*“ईद मुबारक!..* – *कोडाइकनाल* की वादियों से उठती एक पुकार” *ईद मुबारक!..*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

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*“ईद मुबारक!..* – *कोडाइकनाल* की वादियों से उठती एक पुकार”
*ईद मुबारक!..*

“आज मैं अपनी फैमिली के साथ कोडाइकनाल में हूँ—प्रकृति की गोद में बसा एक स्वर्ग।
सुबह की हल्की ठंडी हवा, पहाड़ियों पर तैरते बादल, और दूर-दूर तक फैली हरियाली—मानो प्रकृति ने अपनी सबसे सुंदर तस्वीर यहीं उकेरी हो।
कोडाइकनाल… जिसे “दक्षिण भारत का स्विट्ज़रलैंड” कहा जाता है… तमिलनाडु के पलानी पहाड़ियों में लगभग 2100 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह स्थान, सच में किसी जन्नत से कम नहीं।

यहाँ की वादियाँ जैसे मन के शोर को चुप कर देती हैं… और आत्मा को एक अजीब-सी शांति से भर देती हैं।
हम सुबह-सुबह कोडाइकनाल झील के किनारे पहुँचे।
झील का पानी शांत था… जैसे किसी साधु का मन।
बच्चे नाव चला रहे थे, कुछ लोग फोटो ले रहे थे… और हम बस उस पल को महसूस कर रहे थे।
फिर हम कोकर्स वॉक की ओर बढ़े—जहाँ से नीचे झांकते ही ऐसा लगता है जैसे बादल धरती को छू रहे हों।
आगे पिलर रॉक्स—प्रकृति के बनाए विशाल स्तंभ—जैसे समय के प्रहरी बनकर खड़े हों।
और ब्रायंट पार्क… रंग-बिरंगे फूलों से सजी एक जीवंत कविता।
दिन जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था, रास्तों पर भीड़ बढ़ती जा रही थी।
हर तरफ खुशियाँ… हर चेहरे पर मुस्कान…
मैंने सोचा—आज कुछ खास है।
तभी एक दुकान वाले ने मुस्कुराकर कहा—
“साहब, आज ईद है… ईद मुबारक!”

मैंने भी मुस्कुराकर जवाब दिया—
“ईद मुबारक!”
उस एक शब्द ने जैसे दिल को छू लिया।
एक अजीब-सा सुकून… जैसे कोई पुराना रिश्ता फिर से जीवित हो गया हो।
रमज़ान के पूरे महीने के रोज़े, संयम, धैर्य और आत्मशुद्धि के बाद जब चाँद दिखाई देता है, तो ईद का त्योहार आता है।
यह सिर्फ एक त्योहार नहीं… बल्कि इंसानियत, भाईचारे और कृतज्ञता का उत्सव है।
मैंने अपने दोस्तों, सीनियर्स, जूनियर्स, और सहकर्मियों को भी फोन और मैसेज करके कहा—

“ईद मुबारक!”
और हर बार यही लगा—जैसे दिल हल्का होता जा रहा है।
दोपहर की फुर्सत में, होटल के कमरे में बैठकर हमने गुलज़ार द्वारा निर्देशित ईदगाह देखनी शुरू की—जो मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी पर आधारित है।
जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती गई… दिल कहीं गहरे उतरता गया।
अमीना के रूप में सुरेखा सिकरी—मानो एक जीवित दादी बनकर सामने आ गईं।
और हामिद… एक छोटा-सा बच्चा… लेकिन दिल इतना बड़ा कि पूरी दुनिया उसमें समा जाए।

ईद का दिन…
घर में गरीबी…
ईदी नहीं…
लेकिन फिर भी दादी का अपने पोते के लिए नया कुर्ता-पायजामा लाना…
और फिर उसे एक आना देकर मेले भेजना…
ये दृश्य आँखों को नम कर देते हैं।
और फिर…
वह क्षण… जब हामिद मिठाइयों और खिलौनों को छोड़कर चिमटा खरीदता है…

ताकि उसकी दादी के हाथ न जलें…
यह सिर्फ एक कहानी नहीं…
यह एक भावना है…
एक सीख है…
एक आईना है… जो हमें खुद से सवाल करने पर मजबूर कर देता है।
लेकिन…
कहानी खत्म होते-होते, मेरे मन में एक धुंधली-सी याद उभर आई—
मेरे गाँव की…
समीना आंटी…
वो और सलीम अंकल, मेरे पिता सत्यनारायण जी के बहुत अच्छे दोस्त थे।

पूरा गाँव उन्हें “सेठ” कहता था—इतनी संपत्ति, इतना सम्मान…
उनके तीन बेटे—रहीम, अली, शमीम…
और दो बेटियाँ—सलीमा और शबनम…
समय बदला…
बेटियाँ कुवैत चली गईं…
बेटे सऊदी अरब में बस गए…
घर बड़ा था…
लेकिन धीरे-धीरे खाली होने लगा।
1983 में सलीम अंकल का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।
उससे पहले उनके भाई जफ्फर भी एक दुर्घटना में चल बसे थे।
जफ्फर का बेटा सुलेमान…
जिसे सलीम अंकल ने अपने बेटे की तरह पाला…
सुलेमान और उसकी पत्नी जिया ने शुरुआत में बहुत सेवा की।

दिन-रात समीना आंटी का ख्याल…
हर ईद पर नए कपड़े…
हर दिन आदर…
भावनाओं में बहकर, समीना आंटी ने अपनी सारी संपत्ति उनके नाम कर दी।
लेकिन…
समय के साथ सब बदल गया।
वही जिया…
जो कभी बेटी से भी बढ़कर थी…
अब दूर होने लगी…
और धीरे-धीरे…
समीना आंटी की हालत वैसी हो गई…
जैसी प्रेमचंद की *“बूढ़ी काकी”* …
एक कोने में सिमटी जिंदगी…
अपनों के बीच होकर भी अकेली…
आज यह सिर्फ एक कहानी नहीं है…
यह एक सच्चाई है…

मैं IISCO Steel Plant में काम करता हूँ।
वहाँ फ्लाईओवर गेट के पास एक बूढ़ी माँ रोज़ भीख मांगती है।
एक दिन मैंने गाड़ी रोकी और पूछा—
“माँ, घर में कोई नहीं है?”
वो मुस्कुराईं… लेकिन आँखें नम थीं—
“सब हैं बेटा…
पर कोई आता नहीं…”
उनकी आवाज़ में जो दर्द था…
वह किसी भी कहानी से गहरा था।
उस दिन मुझे हामिद याद आया…

और लगा—
काश… हर घर में एक हामिद होता…
जो अपनी “अमीना” का ख्याल रखता…
जो प्यार को संपत्ति से ऊपर रखता…
जो त्याग को जीवन का सबसे बड़ा धर्म मानता…
ईद का असली मतलब यही है—
दूसरों की खुशी में अपनी खुशी ढूंढना…
शाम होते-होते, मैं गुना केव्स पहुँच चुका था।
घने जंगल… रहस्यमयी गुफाएँ… और प्रकृति की गहराई…
मैंने आसमान की ओर देखा…
शायद वही चाँद… जिसने ईद का संदेश दिया था…
मैंने मन ही मन कहा—
*“ईद मुबारक!..”*

और एक छोटी-सी दुआ की—
हे खुदा…
हर घर में एक हामिद दे…
और हर दिल में एक अमीना…”
कल हम अपने अगले पड़ाव मुन्नार के लिए निकलेंगे…
शायद एक नई कहानी के साथ…
लेकिन यह कहानी…
यह एहसास…
यह ईद…
हमेशा दिल में जिंदा रहेगी… 🌙✨

✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, आईओए
सेल आईएसपी, बर्नपुर
#सुशीलकुमारसुमन
#युवा