*“जब बर्नपुर थम-सा गया था”*
“पश्चिम बंगाल की इस्पात नगरी— बर्नपुर स्टील सिटी।
यह शहर हर सुबह एक परिचित और दृढ़ ध्वनि के साथ जागता था—
IISCO स्टील प्लांट की तीखी सीटी, जो हजारों कर्मचारियों को उनके कर्तव्य का संकेत देती थी।
चिमनियों से उठता धुआँ, शिफ्ट बदलते मजदूरों की चहल-पहल, साइकिलों की लंबी कतारें, और क्वार्टरों की खिड़कियों से झांकती सुनहरी धूप— यही बर्नपुर की पहचान थी। यहाँ जीवन इस्पात की तरह कठोर भी था और अनुशासित भी।
लेकिन मार्च 2020 की एक सुबह हवा में कुछ अनजाना-सा बदलाव था।
टीवी चैनलों पर एक शब्द बार-बार गूँज रहा था— कोरोना वायरस।
लोगों ने पहले इसे दूर देशों की समस्या समझकर टाल दिया।
चाय की दुकान पर बैठे किसी ने हँसते हुए कहा—
“अरे, ये सब विदेश की बीमारी है, यहाँ तक नहीं आएगी।”
पर कुछ ही हफ्तों में बर्नपुर की रफ्तार थम गई।
गलियों में सन्नाटा उतर आया।
बर्नपुर के मुख्य चिकित्सा केंद्र— बर्नपुर अस्पताल में अचानक बुखार और साँस लेने में तकलीफ वाले मरीजों की संख्या बढ़ने लगी।
वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. संजीव मुखर्जी ने सबसे पहले खतरे को पहचाना।
उन्होंने गंभीर स्वर में अपनी टीम से कहा—
“यह सामान्य फ्लू नहीं है, मामला गंभीर है।”
उनके साथ नर्स पूजा शर्मा, वार्ड सहायक रफीक अंसारी, और युवा इंटर्न अंकिता सेन दिन-रात जुटे रहे।
तीन दिनों में पाँच मरीजों की हालत बिगड़ गई।
फिर संख्या दस पर पहुँची।
डॉ. संजीव ने तत्काल जिला प्रशासन को रिपोर्ट भेजी—
“यह कोविड है। हमें तुरंत सख्त कदम उठाने होंगे।”
जिला मजिस्ट्रेट अनामिका राय के सामने कठिन निर्णय था।
अगर शहर बंद किया जाता, तो IISCO स्टील प्लांट की उत्पादन श्रृंखला प्रभावित होती।
हजारों मजदूरों की आजीविका संकट में पड़ जाती।
एक अधिकारी ने सुझाव दिया—
“क्या कुछ दिन इंतजार नहीं किया जा सकता?”
पर आँकड़े तेजी से बढ़ रहे थे।
अंततः घोषणा हुई—
“बर्नपुर स्टील सिटी अगली सूचना तक पूर्ण लॉकडाउन में रहेगी।”
रेलवे स्टेशन पर अफरा-तफरी मच गई।
बस अड्डों पर मजदूरों की भीड़ उमड़ पड़ी।
लेकिन शहर के द्वार बंद हो चुके थे।
मंदिरों के घंटे शांत हो गए।
मस्जिदों की अजान अब लाउडस्पीकर से नहीं, दिलों में गूँजती थी।
स्कूलों के मैदान सूने पड़े थे।
IISCO के गेट पर सैनिटाइज़र टनल लगाई गई।
केवल आवश्यक कर्मचारियों को ही प्रवेश की अनुमति थी।
बर्नपुर अब एक टापू था—
दुनिया से कटा हुआ।
बर्नपुर अस्पताल अब एक युद्धभूमि में बदल चुका था।
डॉ. संजीव और उनकी टीम पीपीई किट में घंटों पसीना बहाते, मरीजों की सेवा में लगे रहते।
एक रात पूजा ने थककर पूछा—
“सर, कब खत्म होगा यह सब?”
डॉ. संजीव ने संयत स्वर में कहा—
“जब तक हम हार नहीं मानते।”
लेकिन उनके भीतर भी भय था।
घर लौटकर वे अपने बूढ़े पिता को दूर से देखते।
उन्हें छूने का साहस नहीं कर पाते।
IISCO स्टील प्लांट में उत्पादन कम कर दिया गया।
प्रबंधन ने कर्मचारियों को आश्वासन दिया—
“उत्पादन घटेगा, पर मजदूरों की तनख्वाह नहीं कटेगी।”
यह सुनकर कई आँखें नम हो गईं।
भट्ठियाँ धीमी पड़ गईं,
लेकिन उम्मीद की आग अब भी सुलग रही थी।
स्थानीय पत्रकार देवाशीष बनर्जी ने अपने लेख में लिखा—
“हमने खतरे को देर से समझा,
पर अब समय है एकजुट होकर लड़ने का।”
कुछ अधिकारियों ने उन्हें चेतावनी दी—
“डर मत फैलाइए।”
देवाशीष ने शांत उत्तर दिया—
“सच कहना डर फैलाना नहीं है।”
उनकी पत्नी और बेटा कोलकाता में फँसे थे।
वे अकेले थे, लेकिन कलम उनके साथ थी।
श्मशान घाट पर चिताएँ लगातार जल रही थीं।
रफीक ने एक दिन भारी आवाज़ में कहा—
“मैंने इतने जनाजे कभी नहीं देखे।”
फिर एक दिन अंकिता संक्रमित हो गई।
उसने मास्क के पीछे से पूछा—
“सर, मैं ठीक हो जाऊँगी न?”
डॉ. संजीव ने उसे ढाँढस बंधाया—
“तुम बहुत मजबूत हो।”
लेकिन दो दिन बाद वह नहीं रही।
उस रात अस्पताल के एक कोने में संजीव की आँखों से आँसू रुक नहीं पाए।
बर्नपुर के युवाओं ने मिलकर “स्टील सिटी सेवा दल” बनाया।
रफीक ने नेतृत्व संभाला।
उन्होंने घर-घर भोजन पहुँचाया।
दवाइयाँ वितरित कीं।
अकेले बुजुर्गों का हालचाल लिया।
धर्म और जाति की दीवारें मानो पिघल गईं।
पूजा ने कहा—
“कोविड ने सिखाया कि इंसानियत सबसे पहले है।”
कुछ महीनों बाद टीकाकरण अभियान शुरू हुआ।
लोग लंबी कतारों में खड़े हुए।
पहली डोज़ लगते ही कई चेहरों पर उम्मीद की रोशनी झलक उठी।
एक दिन डॉ. संजीव ने देखा—
अस्पताल में कोई नया कोविड मरीज नहीं आया।
उन्होंने गहरी साँस ली।
सरकार ने घोषणा की—
“बर्नपुर स्टील सिटी अब धीरे-धीरे खुलेगी।”
IISCO की सीटी फिर तेज गूँजी।
मंदिरों में घंटियाँ बजीं।
बच्चों की हँसी मैदानों में लौट आई।
रेलवे स्टेशन पर लोग गले मिलने लगे।
देवाशीष ने अपने अंतिम लेख में लिखा—
“महामारी ने हमें सिखाया कि
हम भले अलग-अलग घरों में रहें,
पर हमारी साँसें एक-दूसरे से जुड़ी हैं।”
डॉ. संजीव अस्पताल की छत पर खड़े शहर को देखते रहे।
उन्हें पता था—
वायरस पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है,
बस कहीं छिप गया है।
बर्नपुर ने सीखा कि यह संकट केवल बीमारी का नहीं था,
बल्कि मनुष्यता की परीक्षा थी।
कुछ लोग डर गए।
कुछ टूट गए।
पर कई लोग डटे रहे।
IISCO की भट्ठियाँ फिर प्रज्वलित हुईं।
बर्नपुर अस्पताल फिर सामान्य मरीजों से भरने लगा।
लेकिन हर चेहरे पर उन दिनों की स्मृति अंकित थी—
जब हवा काली थी।
यह कहानी केवल कोविड की नहीं,
उन लोगों की है जिन्होंने
डर के बीच साहस चुना,
अकेलेपन में सेवा को अपनाया,
और निराशा में भी उम्मीद को थामा।
बर्नपुर ने साबित किया—
इस्पात केवल कारखानों में नहीं बनता,
वह मनुष्यों के भीतर भी गढ़ा जाता है।
और यही जीवन का शाश्वत सत्य है—
अंधेरा चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो,
मानव करुणा की ज्योति
उसे चीरकर प्रकाश फैला ही देती है।”
✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*










