Dastak Jo Pahunchey Har Ghar Tak

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*”डॉ. भास्कर”* *(Love & War: एक ऐतिहासिक–प्रेम–दार्शनिक कहानी)*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

*“डॉ. भास्कर”*
*(Love & War: एक ऐतिहासिक–प्रेम–दार्शनिक कहानी)*

“1905 का वह धुँधला-सा शीतकालीन प्रभात।
कोलकाता के बाहरी हिस्से में स्थित हिन्दू श्मशान घाट।
सफेद धूएँ की पतली परत हवा में तैर रही थी।
गंगा की लहरें जैसे किसी अदृश्य शोकगीत का आलाप कर रही थीं।

एक युवक—अभी-अभी डॉक्टर बना था—अपनी माँ की कब्र पर खड़ा था।
उसके हाथ काँप रहे थे।
आँखों में आँसू नहीं, बल्कि आँसुओं का अथाह समुद्र था।

डॉ. भास्कर बनर्जी।

यही वह क्षण था जब उसका स्थायित्व टूट गया।
यही वह क्षण था जब उसका जीवन दो भागों में बँट गया–
माँ के साथ का जीवन और माँ के बिना का जीवन।

उसकी माँ उसके लिए केवल जन्म देने वाली स्त्री नहीं थी–
वह उसकी पहली पाठशाला थी,
पहली कविता थी,
पहली करुणा थी,
पहली सुरक्षा थी।

आज वही सुरक्षा जल चुकी थी।

कब्र पर खड़े होकर वह बुदबुदाया—

“माँ… अब मैं किसके पास लौटूँगा?”

और उसी क्षण से शुरू होती है यह कथा—
एक डॉक्टर की,
एक कवि की,
एक प्रेमी की,
एक भटके हुए आत्मा की।

1905।
बंगाल का विभाजन—केवल भूगोल का नहीं,
मनुष्यों के हृदय का विभाजन था।

भास्कर उस समय केवल बारह वर्ष का था।
उसका घर—शांत, साहित्यिक, संस्कारों से भरा।
पिता एक संस्कृत के विद्वान अध्यापक।
माँ—गृहिणी, पर अंतर्मन से एक कवयित्री।

राजनीतिक उथल-पुथल घर के दरवाजे तक पहुँच चुकी थी।
गलियों में नारे गूँजते थे—
“वंदे मातरम्!”
“बंगभंग नहीं चलेगा!”

माँ उसे गोद में लेकर कहा करती थी—

“बेटा, देश टूटे या जुड़े—
इंसानियत कभी नहीं टूटनी चाहिए।”

उसी माँ की मृत्यु ने भास्कर के भीतर एक स्थायी रिक्तता भर दी।

मेडिकल की पढ़ाई के लिए भास्कर इंग्लैंड पहुँचा।
वहीँ उसकी भेंट हुई डॉ. सुशांत चटर्जी से।

सुशांत—तेजस्वी, स्पष्टवादी, विचारों से क्रांतिकारी।
जहाँ भास्कर भावनाओं से निर्णय लेता था,
वहाँ सुशांत तर्क से।

दोनों मित्र बने,
फिर प्रतिस्पर्धी,
फिर अनजाने ही प्रेम-प्रतिद्वंद्वी।

यूरोप उस समय उबल रहा था।
राजनीतिक विचारधाराएँ बदल रही थीं।
विचारधाराओं की टक्कर में मानवता पिस रही थी।

भास्कर और सुशांत
पेरिस, बर्लिन, वियना—
हर शहर में अस्पतालों में काम करते,
घायलों का इलाज करते,
और रात को कविताएँ लिखते।

पर इन सबके बीच
दोनों के जीवन में एक ही स्त्री प्रवेश कर चुकी थी—

लोलिता बनर्जी।

लोलिता केवल सुंदर नहीं थी—
वह करुणा की मूर्ति थी।
उसकी आँखों में माँ की छाया थी,
और मुस्कान में प्रेम की चिंगारी।

भास्कर उसके पास बैठते ही शांति अनुभव करता।
जैसे कोई बच्चा माँ की गोद में सिर रख दे।

सुशांत उसे चुनौती की तरह देखता।
वह लोलिता में भविष्य देखता,
पर भास्कर उसमें अतीत खोज रहा था—
माँ का अक्स।

यही अंतर दोनों के प्रेम को अलग दिशा देता गया।

भास्कर ने एक बार अपनी डायरी में लिखा—

“मेरा हर प्रेम माँ की खोज है।
मैं स्त्री में प्रेम नहीं ढूँढता,
मैं सुरक्षा ढूँढता हूँ।”

उसके भीतर वही था जिसे बाद में
सिग्मंड फ़्रायड (Sigmund Freud)
ने “मातृ-वस्तु (Maternal Object)” कहा।

भास्कर का हर आकर्षण उस शून्य को भरने का प्रयास था
जो उसकी माँ की मृत्यु से बना था।

भारत लौटने पर
भास्कर का विवाह हुआ—

तनिया दत्ता से।

यह विवाह प्रेम से नहीं,
सहानुभूति से जन्मा था।

तनिया समझदार थी,
ममतामयी थी,
धैर्यवान थी।

धीरे-धीरे वह पत्नी कम
और माँ अधिक बनती गई।

भास्कर उसे आदर देता था,
कृतज्ञता देता था,
पर वह उसे उत्सव नहीं दे सका।

तनिया यह सब समझती थी।
वह जानती थी कि वह
भास्कर का घर है—
लेकिन उसका प्रेम नहीं।

द्वितीय विश्व युद्ध।

World War II
नहीं—यह केवल युद्ध नहीं था;
यह मानवता की सामूहिक परीक्षा थी।

भास्कर और सुशांत
फिर से यूरोप पहुँचे।
घायल सैनिक,
भूखे शरणार्थी,
रोते बच्चे।

हर शरीर घायल था,
हर आत्मा खंडित।

युद्ध के बीच
लोलिता कहीं खो गई।

शहर बदले,
राष्ट्र टूटे,
सीमाएँ खिंची–
और प्रेम दिशाहीन हो गया।

युद्ध के बाद
एक जर्जर रेलवे स्टेशन पर
तीन लोग फिर मिले—

भास्कर,
सुशांत,
और लोलिता।

लोलिता अब वैसी नहीं थी।
उसकी आँखों में अब माँ की ममता नहीं—
बल्कि इतिहास की थकान थी।

सुशांत ने उसका हाथ थामा।
लोलिता चुप रही।

भास्कर दूर खड़ा देखता रहा–
वह समझ गया कि
उसकी माँ की परछाईं
अब किसी और की जीवनरेखा बन चुकी है।

तनिया की बीमारी,
भास्कर की सेवा,
और वर्षों की मौन निष्ठा–

एक दिन तनिया ने उसके हाथ पकड़कर कहा–

“भास्कर,
तुम मुझे कभी प्रेम नहीं कर सके,
लेकिन तुमने मुझे कभी अकेला भी नहीं छोड़ा–
यही तुम्हारा प्रेम था।”

“एक माँ थी,
एक माँ-समान पत्नी थी,
दोनों खो गईं—
शायद अब मुझे खुद से मिलना होगा।”

कुछ यादें !…

1912..
कलकत्ता का बंदरगाह।

भास्कर बनर्जी जहाज़ के डेक पर खड़ा था।
पीछे छूटता भारत,
सामने फैलता अनजान यूरोप।

उसके भीतर केवल एक सपना था—
डॉक्टर बनने का,
मानव पीड़ा को समझने का,
और शायद…
अपने भीतर के शून्य को भरने का।

जहाज़ के सीटी की आवाज़ में उसे
माँ की आखिरी पुकार सुनाई दी—
“भास्कर… लौटना…”

लेकिन वह लौट नहीं रहा था।
वह भाग रहा था—
अपनी स्मृतियों से,
अपने डर से,
अपनी टूटन से।

लंदन।
धुँध, कोयले की गंध और व्यस्त सड़कों का शोर।

मेडिकल कॉलेज के छात्रावास में
उसकी पहली भेंट हुई—

डॉ. सुशांत चटर्जी से।

सुशांत तेज बोलने वाला,
तेज दिमाग,
और अत्यंत राजनीतिक सोच वाला युवक था।

पहली ही मुलाक़ात में उसने कहा—
“डॉक्टर बनना केवल पेशा नहीं,
राजनीतिक कर्तव्य है।”

भास्कर मुस्कराया।
वह राजनीति से अधिक
मनुष्य के भीतर की पीड़ा को समझना चाहता था।

यहीं से दोनों की मित्रता शुरू हुई—
विचारों की टकराहट से।

तीन वर्ष बाद दोनों पेरिस पहुँचे।
यह शहर उनके जीवन की दिशा बदलने वाला था।

यहाँ वे स्वयंसेवक चिकित्सक बने।
दिन में अस्पताल,
रात में कवि-गोष्ठियाँ।

एक शाम एक सांस्कृतिक सभा में
एक युवती मंच पर कविता पढ़ रही थी—

उसका स्वर धीमा था,
लेकिन शब्दों में तूफ़ान था।

“लोलिता बनर्जी।”

वह बंगाल से आई थी,
पर उसके विचार पाश्चात्य और पूर्वी संस्कारों का संगम थे।

भास्कर उसे देखता ही रह गया।
उसे लगा जैसे उसने
अपनी माँ की आँखें
किसी और चेहरे पर देख ली हों।

सुशांत ने भी लोलिता को देखा।
पर उसके देखने में चुनौती थी।
भास्कर के देखने में शरण।

धीरे-धीरे तीनों मिलते रहे।
शहर बदलते रहे—
पेरिस, वियना, बर्लिन।

लोलिता युद्ध-पीड़ित बच्चों के लिए काम करती।
सुशांत राजनीतिक सभाएँ करता।
भास्कर रोगियों में अपनी माँ को खोजता।

एक दिन लोलिता ने भास्कर से कहा—
“तुम जब भी किसी बच्चे का इलाज करते हो,
ऐसे देखते हो जैसे अपनी माँ को छू रहे हो।”

भास्कर चुप रहा।
उसकी आँखों में जवाब था।

एक बरसाती रात पेरिस में।
काँच की खिड़की से बाहर रोशनियाँ काँप रही थीं।

लोलिता ने धीरे से कहा—
“भास्कर,
क्या तुम मुझसे इसलिए प्रेम करते हो
क्योंकि मैं स्त्री हूँ…
या इसलिए कि मैं तुम्हारी माँ जैसी हूँ?”

भास्कर जैसे भीतर से टूट गया।
उसने बहुत देर बाद कहा—
“मैं नहीं जानता…
पर जब तुम पास होती हो,
मुझे मृत्यु से डर नहीं लगता।”

लोलिता की आँखों में आँसू भर आए।
वह समझ गई—
यह प्रेम सामान्य नहीं था।
यह किसी गहरे घाव की पुकार थी।

कुछ ही दिनों बाद,
सुशांत ने लोलिता से विवाह का प्रस्ताव रखा।

वह साफ़ था, व्यावहारिक था,
भावनात्मक रूप से मजबूत था।

उसने कहा—
“युद्ध आ रहा है, लोलिता।
इस अस्थिर संसार में
तुम्हें सुरक्षा चाहिए।”

लोलिता चुप रही।
उसकी निगाहें भास्कर को ढूँढ रही थीं।

पर भास्कर चुप था।
वह बोल नहीं पा रहा था।
उसके भीतर प्रेम बोलना चाहता था
और माँ का डर उसे रोक रहा था।

लोलिता ने सुशांत का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया।
पर भास्कर भी आगे नहीं आया।

कुछ महीनों बाद
लोलिता युद्ध-सेवा के लिए
पूर्वी यूरोप चली गई।

स्टेशन पर विदाई के समय
भास्कर कुछ कहना चाहता था।

लोलिता ने कहा–
“अब मत बोलो।
अगर तुम मुझे माँ बना दोगे,
तो मैं तुम्हारी प्रेमिका कभी नहीं बन पाऊँगी।”

ट्रेन चल पड़ी।
भास्कर वहीं खड़ा रह गया।

उस दिन उसने पहली बार महसूस किया—
उसने प्रेम को खो दिया,
माँ की स्मृति के कारण।

भारत लौटने पर
घरवालों ने विवाह का दबाव बनाया।

यहीं उसका परिचय हुआ—
तान्या दत्ता से।

तान्या शालीन,
संस्कारी,
और अत्यंत संवेदनशील थी।

उसकी आँखों में न आग थी,
न चुनौती–
सिर्फ़ शांति थी।

वह भास्कर की बीमारी समझती थी,
उसकी चुप्पी,
उसकी बेचैनी।

एक दिन उसने कहा–
“तुम मुझसे प्रेम करो या न करो,
मैं तुम्हारा घर बनना चाहती हूँ।”

भास्कर का मन रो उठा।
उसे लगा–
शायद यही वह माँ-समान शरण है
जिसकी उसे तलाश थी।

और उन्होंने विवाह कर लिया।

विवाह शांत था।
न कोई उत्सव, न कोई उन्माद।

तान्या ने उसकी ज़िंदगी को सँभाला।
उसके कपड़े, उसकी दिनचर्या,
उसकी लंबी चुप्पियाँ।

भास्कर उसका सम्मान करता था।
उसका आदर करता था।
पर जब रात को अकेला होता–

उसकी डायरी में
लोलिता के नाम
पंक्तियाँ उभर आतीं।

“मैं तुम्हें भूल नहीं पाता
क्योंकि मैंने तुम्हें प्रेम नहीं किया—
मैंने तुम्हें माँ समझा।”

1939..

यूरोप फिर जलने लगा।
युद्ध की घोषणा।

सुशांत ब्रिटिश सेना के साथ
चिकित्सा सेवा में चला गया।

भास्कर भी बुलाया गया।
तान्या ने उसे चुपचाप विदा किया।

विदाई की रात उसने केवल इतना कहा—
“अगर कभी लौटो,
तो केवल डॉक्टर बनकर नहीं,
मनुष्य बनकर लौटना।”

भास्कर को लगा–
जैसे उसकी “माँ” उसे फिर समझा रही हो।

मैदान-ए-युद्ध।

हर ओर लाशें।
हर ओर चीखें।
हर ओर धुआँ।

भास्कर घायल सैनिकों के बीच
माँ को ढूँढता रहा।
हर कराह में उसे
मातृत्व का विलाप सुनाई देता।

वह रात में कविताएँ लिखता–

“युद्ध मनुष्यों को नहीं मारता,
युद्ध उनके भीतर के घर को जलाता है।”

सुशांत मोर्चे पर अधिक कठोर हो गया था।
वह अब भावनाओं में नहीं उलझता था।
वह जीत में विश्वास करने लगा था।

दोनों बदल चुके थे।

एक दिन रेड क्रॉस के शिविर में
भास्कर को सूचना मिली–

लोलिता जीवित है।
लेकिन शरणार्थी शिविर में।
अकेली।
बीमार।

भास्कर की दुनिया काँप गई।

उसने बिना अनुमति लिए
युद्ध क्षेत्र बदला।

वह उसे ढूँढने निकल पड़ा—
न डॉक्टर बनकर,
न पति बनकर—
सिर्फ़ वह बच्चा बनकर
जो अपनी माँ को ढूँढ रहा हो।

पूर्वी यूरोप का शरणार्थी शिविर।
चारों ओर फटे तंबू,
भीगी मिट्टी,
भूख और बीमारी की बदबू।

यहीं कहीं लोलिता थी।

भास्कर जब शिविर में पहुँचा,
तो उसने देखा–
हज़ारों चेहरों में एक ही चेहरा था–
डर से काँपता हुआ चेहरा।

वह हर तंबू में जाता,
हर रोगी को देखता—
पर लोलिता नहीं मिलती।

तीसरे दिन,
एक छोटी-सी झोपड़ी में,
वह उसे देख पाया।

वह बहुत दुबली हो चुकी थी।
आँखों की चमक बुझ गई थी।
हाथ काँपते थे।
फिर भी, उसे देखते ही
उसके होठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।

“भास्कर…”
उसकी आवाज़ में अब माँ की ममता नहीं,
एक थकी हुई औरत की पुकार थी।

भास्कर की आँखों से आँसू बह निकले।
उसने उसका माथा छुआ–
बुखार तेज़ था।

उस क्षण वह डॉक्टर नहीं था।
वह केवल एक खोया हुआ बच्चा था,
जो अपनी माँ को बीमार बिस्तर पर पाकर
खुद को दोषी मान रहा हो।

लोलिता को टाइफस था।
भूख, ठंड और भय ने उसे भीतर तक तोड़ दिया था।

भास्कर दिन-रात उसकी सेवा करने लगा।
दवाएँ, गर्म पानी,
कमज़ोर सूप,
और हर कुछ घंटे में उसके माथे पर हाथ।

कभी-कभी लोलिता होश में आती और कहती—
“भास्कर…
क्या मैं अब भी कविता लिख सकती हूँ?”

भास्कर जवाब देता—
“तुम जीवित रहो,
तो दुनिया फिर से कविता बन जाएगी।”

एक रात लोलिता ने धीमी आवाज़ में कहा–
“तुम हमेशा मुझे माँ की तरह देखते रहे…
क्या एक बार भी नहीं
सिर्फ़ स्त्री की तरह देखा?”

भास्कर कुछ देर चुप रहा।
फिर भारी स्वर में बोला–
“डरता था…
अगर तुम्हें प्रेम की तरह देख लिया
तो तुम्हें खो दूँगा।”

लोलिता की आँखों में
हल्की-सी पीड़ा उतर आई।
“और अब?” उसने पूछा।

भास्कर ने सिर झुका लिया।
“अब मैं तुम्हें खो चुका हूँ।”

एक शाम शिविर में सैन्य वाहन रुके।
घायल सैनिक उतारे गए।
उनके साथ एक परिचित चेहरा भी उतरा–

सुशांत।

वह अब पहले जैसा नहीं था।
उसका चेहरा सख़्त हो चुका था।
आँखों में आदर्श नहीं,
युद्ध की ठंडक थी।

जैसे ही उसने भास्कर को देखा,
दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

“तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”
सुशांत ने पूछा।

“मैं लोलिता के लिए आया हूँ,”
भास्कर ने शांति से कहा।

सुशांत का चेहरा जैसे स्थिर हो गया।
“वह अब भी जीवित है?”
उसके स्वर में राहत और अपराध—दोनों थे।

भास्कर ने सिर हिलाया।
“मौत से लड़ रही है।”

उन दोनों के बीच अब
न मित्रता थी,
न शत्रुता—
केवल एक साझा भय था।

अगली सुबह सुशांत लोलिता के तंबू में पहुँचा।

लोलिता ने उसकी ओर देखा।
उसकी आँखों में कोई आश्चर्य नहीं था,
केवल एक गहरी थकान थी।

“तुम आ गए?”
उसने धीमे से कहा।

सुशांत का स्वर लड़खड़ा गया।
“मैंने तुम्हें ढूँढने की बहुत कोशिश की…”

लोलिता ने कटु मुस्कान के साथ कहा—
“और मैं युद्ध में खोती रही।”

तीनों चुप थे।
उस छोटे-से तंबू में
पूरे यूरोप की त्रासदी समाई हुई थी।

भास्कर बाहर खड़ा था।
वह भीतर नहीं गया।
उसे लगा–
अब यह युद्ध उसका नहीं रहा।

रात को लोलिता ने भास्कर को बुलाया।

“सुशांत ने मुझसे विवाह की बात दोबारा की है,”
उसने कहा।

भास्कर जैसे भीतर से टूट गया।
लेकिन उसने कोई विरोध नहीं किया।

लोलिता ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा–
“तुम मुझसे प्रेम नहीं कर सके, भास्कर।
तुम मुझे माँ बनाए रखना चाहते थे।
सुशांत मुझे स्त्री बनाना चाहता है।”

भास्कर ने काँपते स्वर में कहा–
“और तुम क्या चाहती हो?”

लोलिता ने गहरी साँस ली।
“मैं अब शरण नहीं चाहती।
मैं साथ चाहती हूँ।”

भास्कर उस क्षण पहली बार
पूरी तरह हार गया।

उसने सिर झुकाकर कहा–
“तो जाओ…
और जीवित रहो।”

लोलिता की आँखों से आँसू गिर पड़े।
उसने धीरे से उसका हाथ पकड़ा,
फिर छोड़ दिया।

यह एक मौन विदाई थी–
बिना स्टेशन,
बिना ट्रेन,
बिना शोर।

कुछ ही दिनों बाद
शिविर के छोटे-से चर्च में
लोलिता और सुशांत ने विवाह कर लिया।

कोई उत्सव नहीं था,
कोई संगीत नहीं था।

सिर्फ़ युद्ध के बीच
एक जीवन की पुनर्स्थापना थी।

भास्कर दूर खड़ा देखा करता।
उसके भीतर
न ईर्ष्या थी,
न क्रोध–
केवल एक थका हुआ शून्य था।

उसे लगा जैसे
उसने अपनी माँ को
हमेशा के लिए किसी और को सौंप दिया हो।

उस रात भास्कर ने अपनी डायरी में लिखा–

“मैंने प्रेम को माँ बना दिया,
और माँ को प्रेम।
इसी भ्रम ने मुझे जीवन भर भटका दिया।
जो स्त्री मुझे प्रेम दे सकती थी,
उससे मैंने शरण माँगी।
और जिसने मुझे शरण दी,
उससे प्रेम नहीं कर सका।”

वह जान चुका था–
उसकी सबसे बड़ी दुर्घटना
युद्ध नहीं था,
लोलिता का जाना नहीं था–
उसकी अपनी मनोवैज्ञानिक कैद थी।

भारत में,
तान्या हर दिन चिट्ठियों का इंतज़ार करती थी।

भास्कर की चिट्ठियाँ अब बहुत कम हो गई थीं।
जब आतीं,
उनमें बीमारी, युद्ध और दवाइयों का विवरण होता–
पर भावनाएँ नहीं होतीं।

तान्या को सब समझ में आ रहा था।
वह जानती थी–
भास्कर का मन कहीं और अटका हुआ है।

एक रात उसने अपने आप से कहा–
“मैं उसकी पत्नी हूँ…
पर वह अभी भी किसी और का अधूरा पुत्र है।”

युद्ध समाप्त हुआ।

यूरोप राख में बदल चुका था।
नगर खंडहर बन चुके थे।
लाखों सपने दफन हो चुके थे।

सुशांत और लोलिता ने भारत लौटने का निर्णय किया।
भास्कर भी लौटने लगा,
पर अलग रास्ते से।

स्टेशन पर तीनों फिर मिले।

लोलिता ने भास्कर की ओर देखा—
उसकी आँखों में कृतज्ञता थी।

“अगर तुम नहीं होते,
तो मैं आज जीवित न होती,”
उसने कहा।

भास्कर ने उत्तर दिया–
“और अगर तुम न होती,
तो मैं कभी समझ न पाता
कि मेरे भीतर माँ और प्रेम
दोनों की परछाइयाँ कैसे टकराती हैं।”

सुशांत ने उसका हाथ दबाया।
तीनों एक-दूसरे को
अंतिम बार देखते रहे।

फिर ट्रेनें अलग-अलग दिशाओं में चल पड़ीं।

भारत लौटकर
भास्कर फिर अपने अस्पताल में लग गया।

लोगों की सेवा,
रोगों का इलाज,
रात में कविताएँ।

पर अब कविताओं में
माँ की जगह
ख़ामोशी ने ले ली थी।

तान्या ने उसे पहले जैसा स्वीकार किया–
शांत, मौन, अधूरा।

भास्कर ने एक दिन उससे कहा–
“मैं तुम्हें कभी वह प्रेम नहीं दे सका
जिसकी तुम्हें ज़रूरत थी।”

तान्या ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“और मैंने तुमसे कभी वह प्रेम नहीं माँगा
जो तुम दे नहीं सकते थे।”

भास्कर की आँखें भर आईं।
वह पहली बार समझा—
कभी-कभी सच्चा त्याग
प्रेम से भी बड़ा होता है।

युद्ध के बाद के वर्षों में
भास्कर अपने अस्पताल में लौट चुका था।
दिन भर रोगियों की भीड़,
रात को कविताओं का सन्नाटा।

लेकिन जीवन अब धीरे-धीरे
एक नई पीड़ा की ओर बढ़ रहा था।

तान्या बीमार रहने लगी।

पहले थकान,
फिर तेज बुखार,
फिर खाँसी में खून।

जाँच में पता चला–
उसे टी.बी. हो चुका है।

भास्कर यह सुनकर
डॉक्टर नहीं रहा,
फिर वही भयभीत बच्चा बन गया
जो कभी अपनी माँ को खो चुका था।

उसने तान्या को
अपने हाथों से दवाएँ दीं,
रात भर उसके पास बैठा रहा,
हर साँस को गिनता रहा।

एक रात तान्या ने धीरे से कहा—
“तुम ऐसे देख रहे हो,
जैसे फिर कोई माँ खो दोगे।”

भास्कर की आँखें भर आईं।
“तुम मेरी पत्नी हो,” उसने कहा।

तान्या मुस्कराई—
“मैं तुम्हारी पत्नी थी…
लेकिन जीवन भर तुम्हारी माँ बनी रही।”

बीमारी बढ़ती गई।
भास्कर हर संभव इलाज करता रहा।
कोलकाता, पटना, कलकत्ता—
हर बड़े डॉक्टर को दिखाया।

लेकिन बीमारी धीमे-धीमे
तान्या को भीतर से खा रही थी।

एक शाम, धूप ढलते समय
तान्या ने भास्कर का हाथ पकड़कर कहा—

“आज मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ।”

भास्कर चुप बैठ गया।

“तुम जीवन भर
माँ की छाया खोजते रहे।
लोलिता में, रोगियों में,
यहाँ तक कि मुझमें भी।
लेकिन आज मैं चाहती हूँ
कि तुम सिर्फ़ एक बार
मुझे पत्नी मान लो–
माँ नहीं।”

भास्कर काँप गया।
उसके होंठ हिले,
लेकिन शब्द नहीं निकले।

तान्या ने धीमे से कहा–
“मुझसे यह मत पूछो
कि तुमने मुझे प्रेम दिया या नहीं।
बस इतना मान लो
कि मैंने तुम्हें पूरा जीने दिया।”

उस रात भास्कर पहली बार
तान्या के पास बच्चे की तरह रोया।

बरसात की एक रात।

खिड़की के काँच पर
पानी बूँदों की तरह गिर रहा था।
कमरे में पीली-सी रोशनी।

तान्या की साँसें टूट-टूट कर चल रही थीं।

भास्कर ने उसका सिर
अपनी गोद में रखा।

तान्या ने अंतिम बार उसकी ओर देखा।
उसकी आँखों में कोई शिकायत नहीं थी।

केवल एक शांति थी।

“डरो मत, भास्कर…”
उसने धीमे से कहा–
“अब तुम्हारी माँ और मैं
एक ही जगह होंगी…”

और यह कहकर
उसकी साँसें रुक गईं।

भास्कर चीखा नहीं।
वह पत्थर की तरह जड़ हो गया।

दूसरी बार
उसके जीवन का स्थायित्व
हमेशा के लिए टूट गया।

तान्या के जाने के बाद
घर सूना हो गया।

रसोई में बर्तन वही थे,
पर हाथ नहीं रहे।
कमरे में पलंग वही था,
पर साँसों की गरमी नहीं रही।

भास्कर काम पर जाता,
रोगियों का इलाज करता,
फिर घर लौट आता
और देर तक अँधेरे में बैठा रहता।

एक रात उसने अपनी माँ की तस्वीर के सामने
पहली बार ज़ोर से कहा–

“मैं तुम्हें हर औरत में ढूँढता रहा,
और हर औरत को खोता रहा।
क्यों, माँ?
क्या मैं कभी बड़ा नहीं हो पाया?”

उस रात
उसे पहली बार
अपने भीतर का बच्चा दिखाई दिया–
डरा हुआ, असहाय, रोता हुआ।

और उसी रात
उसने उसे पहली बार
सीने से लगाया।

कई वर्षों बाद
एक दिन एक चिट्ठी आई।

प्रेषक— लोलिता बनर्जी।

उसने लिखा—

“भास्कर,
सुशांत अब एक अच्छा पिता है।
हमारे दो बच्चे हैं।
युद्ध की राख से
हमने एक छोटा-सा संसार बनाया है।
पर तुम आज भी
मेरी कविताओं में जीवित हो।
यदि संभव हो,
तो अपनी कोई कविता भेजना।
मैं चाहती हूँ कि मेरे बच्चे जानें–
वह आदमी कौन था
जिसने मुझे जीवन के सबसे कठिन समय में
जीवन वापस दिया।”

भास्कर की आँखें भर आईं।
उसने उत्तर नहीं भेजा।
लेकिन उसी रात
उसने अपनी अंतिम महान कविता लिखी।

कविता का शीर्षक था—

“माँ और प्रेम के बीच”

“मैं माँ को खोजता था प्रेम में,
और प्रेम को ढूँढता था माँ में।
इस भ्रम ने जीवन भर
मुझे अधूरा रखा।
आज जब दोनों नहीं हैं,
तब समझ आया–
माँ स्मृति में जीवित रहती है,
और प्रेम जीवन में।
जो स्मृति को जीवन बना दे,
वह कभी प्रेम नहीं कर पाता।
और जो प्रेम को जीवन बना दे,
वह माँ को खो देता है।
मैं दोनों खोकर
पहली बार
खुद को पा सका हूँ।”

यह कविता
उसकी आत्मा का अंतिम उद्घाटन थी।

कुछ महीनों बाद
भास्कर को हृदय-आघात हुआ।

अस्पताल में वही
उसका उपचार कर रहे थे
जिन्हें उसने पढ़ाया था।

उसने आखिरी बार कहा—
“मुझे माँ के पास पहुँचा दो…”

उसके चेहरे पर
एक गहरी शांति थी।

जैसे किसी ने
लंबी यात्रा के बाद
घर पा लिया हो।

उस दिन
डॉ. भास्कर बनर्जी
चला गया।

लोलिता और सुशांत जब यह समाचार सुनकर भारत आए,
तो भास्कर की कब्र पर
तीन परतों की स्मृतियाँ बिछ चुकी थीं—

माँ की,
तान्या की,
और अधूरे प्रेम की।

सुशांत ने कब्र के पास खड़े होकर कहा–
“वह जीत नहीं पाया,
पर हारा भी नहीं।
उसने मनुष्य बनने की
सबसे कठिन लड़ाई लड़ी।”

लोलिता देर तक चुप रही।
फिर उसने कहा–
“वह मुझे प्रेम नहीं दे सका,
पर उसने मुझे जीवन दिया।”

भास्कर की मृत्यु के वर्षों बाद
उसकी कविताएँ प्रकाशित हुईं।

विश्व ने उसे
एक महान कवि–चिकित्सक के रूप में जाना।

लेकिन जिन लोगों ने उसे करीब से देखा,
वे जानते थे–

वह सबसे पहले
एक खोया हुआ बच्चा था
जो माँ को खोजता रहा,
और अंत में
खुद को पा सका।”

✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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*#युवा*