*“तुम कौन हो, सुमन?”*
कुछ प्रश्न जीवन में अचानक नहीं आते…
वे समय की धीमी चाल से, अनुभव की चोट से और कर्म की राख से जन्म लेते हैं।
और उनमें सबसे गहरा प्रश्न होता है—
*“Who you, Suman?”*
“तुम कौन हो, सुमन?*
क्या तुम वही हो जो कल थे?
या वही हो जो टूटकर फिर बने?
यह कहानी उसी उत्तर की है…
*“एक रात का अपनापन (1 मार्च 2012)”*
दिन था—1 मार्च 2012।
समय था—रात 1:50 बजे।
उस दिन मेरा जन्मदिन भी था
Burnpur की हवा में एक अजीब सी नमी थी।
नई जगह, नई जिम्मेदारी, नया जीवन।
मैं स्टेशन की ओर देख रहा था,
मन में हल्की घबराहट, हल्का अनजानपन।
तभी एक आवाज़ आई—
*“आइए सुमन जी, बैठिए।”*
यह आवाज़ थी गोवर्धन साहब की—PBS के AGM।
उन्होंने अपनी मारुति कार का दरवाज़ा खोला,
मानो नौकरी नहीं… घर की ओर ले जा रहे हों।
रास्ते भर वे सहज थे,
पर मेरे भीतर प्रश्न थे…
*क्या यह जगह मुझे अपनाएगी?*
क्या मैं इस नए संसार में टिक पाऊँगा?
*और फिर कार रुकी…*
BB टाइप क्वार्टर 3A, RSTS।
गोवर्धन साहब ने मुस्कराकर कहा—
“यह आपका घर है अब।”
मैं अभी सामान भी ठीक से उतार नहीं पाया था
कि सामने एक माँ जैसी आकृति आई।
पर्वत अंकल की मैडम।
उन्होंने मेरी ओर देखा,
और बिना कोई औपचारिकता बोले,
बस पूछा—
*“बेटा… कुछ खाया?”*
उस एक वाक्य में पूरी दुनिया थी।
यह केवल सवाल नहीं था…
यह अपनापन था।
यह जीवन की एक नई गर्माहट थी।
मैं बस इतना ही कह पाया—
“जी… नहीं…”
उन्होंने तुरंत कहा—
“तो पहले कुछ खा लो, फिर बाकी बातें।”
आज भी…
वह दृश्य आँखों में जिंदा है।
*धन्यवाद अंकल जी, आंटी जी और गोवर्धन साहब…*
*‘समय चलता रहा… और फिर टूट गया (1 सितंबर 2013)”*
समय कभी रुकता नहीं।
वह बस चलता रहता है…
कभी फूलों पर, कभी काँटों पर।
और फिर आया—
1 सितंबर 2013।
एक दुर्घटना…
एक क्षण…
और जीवन का पूरा पहिया उलट गया।
दोनों पैर टूट चुके थे।
शरीर दर्द में था,
पर आत्मा डर में।
मैं अस्पताल की छत को देख रहा था
और मन पूछ रहा था—
“क्या मैं फिर चल पाऊँगा?”
“क्या मैं फिर खड़ा हो पाऊँगा?”
उस समय जो साथ खड़े थे
वे सिर्फ अधिकारी नहीं थे…
वे देवदूत थे।
-माननीय श्री अरुण कुमार रथ सर
(CEO BSP एवं DSP)
-राकेश रौशन जी (AGM Civil TS)
-मुकुल सर (ED P&A, BSL)
-सरकार सर, मेरे बॉस
हर किसी ने अपने स्तर पर कोशिश की,
हर किसी ने अपने भीतर का इंसान जगाया।
फिर मुझे रेफर किया गया—
Peerless Hospital।
और वहीं मेरी जिंदगी ने एक नया नाम देखा—
*“डॉ. पी. के. बनर्जी”*
75 वर्ष की उम्र,
लेकिन हाथों में विश्वास की ऊर्जा।
15 डॉक्टरों की टीम थी,
पर सबसे स्थिर आवाज़ उन्हीं की थी।
उन्होंने कहा—
*“डरो मत… तुम चलोगे।”*
मैंने काँपती आवाज़ में पूछा—
“सच, डॉक्टर साहब?”
उन्होंने बस इतना कहा—
“हाँ… क्योंकि मुझे भरोसा है।”
*“हाँ..और वही भरोसा’*
आज मेरे कदमों में है।
जय महाप्रभु। !..
शायद वही दुर्घटना थी
जिसने मुझे तोड़ा…
और वही दुर्घटना थी
जिसने मुझे बनाया।
कभी-कभी जीवन हमें चोट देकर
हमारी असली पहचान निकालता है।
“दोनों पैर का ऑपरेशन हो चुका था,
पैर की हड्डी की अलाइनमेंट के लिए,
ऑपरेशन के बाद पैर ऊपर करके
वज़न दे दिया जाता है !.”
उस समय एक संदेश आता था—
*“Vote for Me as IOA Members”*
(डॉ. रेनू उपाध्याय का संदेश)
उस समय मैं सोच भी नहीं सकता था
कि आगे क्या होने वाला है।
पर कर्म अपनी दिशा स्वयं लिखता है।
और आज…
मैं हूँ—
IOA का President।
बीती बातें बीत गईं।
*पर जीवन का अध्याय खुला रह गया।*
*“Men Arrange Tactfully”*
आज Burnpur Club का AGM था।
एक बड़ा आयोजन।
“जिम्मेदारी… व्यवस्था… समय… भरोसा।”
मैंने हमेशा माना है—
“Men Arrange Tactfully.”
यह केवल एक प्रबंधन वाक्य नहीं…
यह एक मैनेजर की आत्मा है।
लोगों को जोड़ना,
व्यवस्था बनाना,
सम्मान देना,
और फिर सफलता को साझा करना—
यही नेतृत्व है।
आज IOA के साथ-साथ
Burnpur Club का AGM भी समय पर सफल रहा।
मेरे सहयोगी,
IOA के GS श्री निशिकांत चौधरी जी ने कहा—
“आपका हर कार्यक्रम सफल होगा,
क्योंकि आप दिल से काम करते हैं…”
और शायद यही सच है।
“जीवन भरोसे का दूसरा नाम है”
आज मैं धन्यवाद देता हूँ—
-Honorable DIC Sir
-ED MM Sir
-ED Works Sir
-ED Finance Sir
-ED Projects Sir
-ED HR Sir
-CGM HR Sir
-सभी Resident Members
-Committee Members
-Burnpur Club Staff
-Vendors
-सभी CGMs
और उस जीवन को…
जिसने मुझे सिखाया—
*“अगर भरोसा है, तो सब ठीक होगा।”*
अब यदि कोई पूछे—
*“तुम कौन हो, सुमन?”*
तो उत्तर है—
मैं वह हूँ
जो अपनापन पाकर मुस्कराया,
दुर्घटना में टूटकर भी चला,
कर्म के रास्ते पर बढ़ता गया,
और विश्वास बन गया।
ज़िंदगी बस चल रही है…
पर अब मजबूरी से नहीं…
मजबूती से।
✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, IOA
सेल, आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*









