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*“धरती कहे पुकार के !..”*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

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*“धरती कहे पुकार के !..”*

‘कल मैं बर्नपुर स्टेशन रोड पर, जगन्नाथ महाप्रभु मोड़ के पास, एक छोटी-सी चाय की दुकान पर बैठकर चाय की चुस्की ले रहा था। शाम का समय था। सड़क पर हलचल थी, लोग अपने-अपने काम से लौट रहे थे। चाय की भाप में जैसे दिनभर की थकान घुल रही थी।
तभी एक सज्जन पास आकर रुके। विनम्र मुस्कान, सादगी भरा व्यक्तित्व।
उन्होंने कहा — “नमस्ते सर, मैं मोहन हूँ… आईएसपी में कार्यरत हूँ… 31 मई 2026 को रिटायर होने वाला हूँ।”
मैंने उन्हें बैठने का आग्रह किया।

मोहान जी बोले —
“सर, आप बहुत हृदयस्पर्शी कहानियाँ लिखते हैं। मैं रोज आपकी कहानी, संपादकीय और कविताओं का इंतज़ार करता हूँ। अब मैं रिटायर होने वाला हूँ… एक विनती है… मेरे बाबा और माँ पर एक कहानी लिख दीजिए।”
उनकी आँखों में एक अजीब-सी चमक और नमी थी।
फिर जो उन्होंने कहा, वही आज शब्दों में ढलकर आपके सामने है…

 

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के एक छोटे से गाँव — कुसुमतराई में रहता था एक साधारण किसान — सत्यनारायण साहू।
उसकी दुनिया बहुत छोटी थी — एक बूढ़ा पिता, दो एकड़ धान की जमीन और मिट्टी की दीवारों वाला एक कच्चा घर।
सत्यनारायण की सबसे बड़ी पूँजी थी उसकी जमीन।
वह अक्सर कहा करता था —
“धरती मइया कभी धोखा नहीं देती, बस मन से सींचो तो सोना उगाती है।”
उसका विवाह पास के गाँव हरमोरा की एक शांत और परिश्रमी लड़की सुशीला से हुआ।
सुशीला ज्यादा बोलती नहीं थी, पर उसके हाथों में अद्भुत श्रम-शक्ति थी। शादी के दूसरे ही दिन वह सत्यनारायण के साथ खेत में उतर गई।
धान के खेतों में जब पहली बार दोनों ने साथ रोपाई की, बादलों से घिरा आसमान जैसे उन्हें आशीर्वाद दे रहा था।

साल दर साल दोनों की मेहनत रंग लाने लगी।
बरसात ठीक हुई। फसल भरपूर आई।
घर में पहला बेटा हुआ — मोहन।
सत्यनारायण की आँखों में गर्व था। उसने पहली बार महसूस किया कि उसकी मेहनत अब अगली पीढ़ी तक जाएगी।
कुछ वर्षों बाद दूसरा बेटा संतोष और फिर बेटी देवकी का जन्म हुआ।
सुशीला ने हर बच्चे को जन्म देते समय भी खेत का साथ नहीं छोड़ा। प्रसव के कुछ ही दिनों बाद वह फिर खेत में उतर जाती।
धीरे-धीरे सत्यनारायण ने कुछ और जमीन खरीद ली। गाँव में उसकी प्रतिष्ठा बढ़ गई। लोग उसे “सत्तू भैया” कहकर सम्मान देने लगे।

पर प्रकृति हमेशा दयालु नहीं रहती।
एक वर्ष मानसून ने धोखा दे दिया।
आसमान सूना रहा। धरती फटने लगी। धान की बालियाँ सूख गईं।
घर में अनाज खत्म होने लगा। बच्चे रोते। बूढ़ा पिता चुपचाप लेटा रहता।
तब सुशीला ने अपनी शादी में मिले चाँदी के कड़े उतार दिए।
धीरे से बोली — “इसे बेच दो…”
पर वह धन भी ज्यादा दिन नहीं चला।
अंततः सत्यनारायण ने निर्णय लिया — शहर जाना होगा।
वे सब मिलकर बिलासपुर चले गए।

 

बिलासपुर की भीड़-भाड़ में सत्यनारायण को अपने खेतों की हरियाली याद आती रहती।
वह मजदूरी करने लगा। कभी ईंट ढोता, कभी रिक्शा चलाता।
सुशीला भी घरों में काम करने लगी।
बच्चे स्टेशन के पास बैठकर भीख माँगते।
यह जीवन अपमान से भरा था, पर जीने की जिद उन्हें टिकाए रही।
एक दिन शहर में दंगा भड़क उठा। भीड़ ने एक व्यापारी के गोदाम को लूट लिया।
अराजकता के बीच सत्यनारायण के हाथ कुछ पैसे लग गए।
उसने सबसे पहले क्या किया?
वह गाँव लौटा — अपनी जमीन वापस खरीदने।

 

जब वह कुसुमतराई पहुँचा, धरती सूखी थी, पर जीवित थी।
उसने उसे फिर सींचा।
कुछ वर्षों में फसल फिर लहलहाने लगी।
अब उसके पास पहले से ज्यादा जमीन थी।
उसने पक्का घर बनवाया। नए बैल खरीदे।
पर समृद्धि के साथ मन में बदलाव आने लगा।

 

अब सत्यनारायण को गाँव की सादगी कम लगने लगी।
वह अक्सर शहर जाने लगा।
वहीं उसकी मुलाकात एक स्त्री — सुंदरी से हुई।
उसकी हँसी में मोह था, बातों में मिठास।
धीरे-धीरे सत्यनारायण उसके आकर्षण में बँध गया।
उसने उसके लिए अलग कमरा बनवाया।
सुशीला सब समझती थी।
पर उसने कुछ नहीं कहा।
उसका मौन ही उसकी तपस्या था।
वह भीतर-ही-भीतर जलती रही।

 

धीरे-धीरे सुशीला की तबीयत गिरने लगी।
एक दिन वह खेत के किनारे बैठी थी।
उसने मिट्टी को हाथ में लिया और कहा —
“धरती मइया, अब थक गई हूँ…”
कुछ ही दिनों में उसने प्राण त्याग दिए।
सत्यनारायण का जीवन जैसे सूना हो गया।
तब उसे एहसास हुआ — असली समृद्धि क्या थी।

 

मोहन और संतोष अब बड़े हो चुके थे।
मोहन नौकरी करना चाहता था।
संतोष व्यापार करना चाहता था।
उन्होंने कहा —
“बाबा, ये जमीन बेच देते हैं…”
सत्यनारायण का दिल काँप उठा।
“ये जमीन तुम्हारी माँ है… इसी ने तुम्हें पाला है…”
पर बेटे मुस्कुरा दिए।

बुढ़ापे में सत्यनारायण रोज खेतों में बैठता।
धान की बालियों को सहलाता।
उसे सुशीला की याद आती।
एक दिन गाँव वालों ने देखा —
वह खेत में ही लेटा है।
चेहरे पर शांति थी।
जैसे धरती ने उसे अपने में समेट लिया हो।
बेटों ने अंततः जमीन बेच दी।
वहाँ फैक्ट्री बनने लगी।
धान के खेतों की जगह कंक्रीट ने ले ली।

 

इतना कहकर मोहन जी रुके।
धीरे से बोले —
“सर… ये कहानी केवल मेरे बाबा सत्यनारायण की नहीं है… हर किसान की है…”
मैं मौन था।
चाय ठंडी हो चुकी थी।
आँखें नम थीं।
धरती सचमुच पुकार रही थी —
“मुझसे मत दूर हो जाओ,
मैं ही तुम्हारा अस्तित्व हूँ…”

यह कहानी एक किसान की नहीं — हर उस माँ-बाप की है, जिनका जीवन मिट्टी से जुड़ा है।
समृद्धि तब तक सुंदर है, जब तक जड़ों से जुड़ी है।
जड़ें कट जाएँ, तो हरियाली भी बेजान हो जाती है।
इतना लिखते-लिखते मेरी भी आँखों में आँसू आ गए।
धन्यवाद मोहन जी…
आपने कहानी नहीं, एक जीवन सौंप दिया। 🌾🙏

✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*