*“पल जो जीवन बन गए !..”*
“उत्तर भारत के मैदानों में, सरयू नदी के किनारे बसा था एक छोटा-सा कस्बा — देवपुर।
यहीं, एक पुराने लेकिन विशाल हवेली जैसे घर में जन्म हुआ था अनिरुद्ध मिश्र का।
उस घर की दीवारें चूने से पुती थीं, छतें ऊँची थीं और आँगन इतना बड़ा कि दोपहर की धूप वहाँ आराम से बैठ सके। घर के पीछे आम, जामुन और कटहल के पेड़ थे, और सामने दूर तक फैले खेत — जहाँ हवा भी धीमे-धीमे बहती थी, जैसे समय को परेशान न करना चाहती हो।
अनिरुद्ध का बचपन किसी किताब के पहले अध्याय जैसा था — सरल, शांत और रहस्यमय।
उसके पिता रामशंकर मिश्र, कभी इलाके के प्रतिष्ठित ज़मींदार माने जाते थे। ज़मीन अब कम रह गई थी, रुतबा भी, पर उनकी आवाज़ में अब भी आदेश का कंपन था।
माँ कौशल्या देवी कम बोलने वाली स्त्री थीं — उनकी चुप्पी में करुणा थी, त्याग था और एक अनकहा भय भी, जैसे जीवन उनसे कुछ छीन लेगा।
अनिरुद्ध बचपन से ही अलग था।
वह चीज़ों को केवल देखता नहीं था — महसूस करता था।
उसे लगता था कि पेड़ों की छाया भी कुछ कहती है, और रात का सन्नाटा भी किसी पुराने गीत की तरह है।
गाँव के बच्चे शोर करते, खेलते, झगड़ते — पर अनिरुद्ध अक्सर अकेला रहता।
वह नदी के किनारे बैठकर पानी को देखता और सोचता —
“यह पानी कहाँ से आता है? और कहाँ चला जाता है?”
स्कूल में वह औसत छात्र था, पर किताबों से उसका रिश्ता गहरा था।
इतिहास पढ़ते हुए वह बीते युगों में चला जाता, और कविताओं में उसे अपनी ही भावनाएँ दिखतीं।
एक दिन उसके दादा का निधन हो गया।
दादा, जो उसे रामायण सुनाया करते थे, अब चुप थे — हमेशा के लिए।
चिता की आग, मंत्रों की आवाज़ और माँ की सिसकियाँ —
उस दिन अनिरुद्ध ने पहली बार मृत्यु को देखा।
वह समझ नहीं पाया, पर कुछ टूट गया उसके भीतर।
उसे लगा —
जीवन कुछ ऐसा है, जो किसी भी क्षण चुपचाप चला जाता है।
समय बदला।
अनिरुद्ध बड़ा होने लगा।
देवपुर वही था, पर उसे देखने की आँख बदल चुकी थी।
अब वह अपने पिता की चिड़चिड़ाहट समझने लगा था —
ज़मींदारी का पतन, बदलता समय, शहरों की ओर भागती दुनिया।
एक दिन उसे पढ़ाई के लिए प्रयागराज भेज दिया गया।
कस्बे से शहर का यह पहला सफ़र, उसके लिए किसी निर्वासन से कम नहीं था।
छोटा-सा कमरा, भीड़, धुआँ, और हर तरफ़ भागते लोग।
यहाँ कोई किसी को नहीं जानता था।
यहाँ स्मृतियों की कोई कीमत नहीं थी।
प्रयागराज के कॉलेज में उसकी मुलाक़ात हुई नंदिनी वर्मा से।
नंदिनी तेज़ थी — बोलने में, सोचने में, सपने देखने में।
उसकी हँसी में शहर की चंचलता थी और आँखों में अजीब-सी उदासी।
दोनों की बातचीत साहित्य से शुरू हुई।
कब बातचीत भावनाओं में बदल गई — पता ही नहीं चला।
वे घंटों गंगा किनारे बैठते।
नंदिनी भविष्य की बातें करती,
और अनिरुद्ध अतीत में खोया रहता।
अनिरुद्ध नंदिनी से प्रेम करने लगा —
पर उस प्रेम में एक डर था।
वह जानता था —
ऐसे प्रेम टिकते नहीं।
एक दिन नंदिनी ने बताया कि उसका विवाह तय हो गया है।
किसी और शहर में।
किसी और जीवन में।
उस रात अनिरुद्ध देर तक जागता रहा।
उसने रोया नहीं।
पर उसके भीतर कुछ स्थायी रूप से बदल गया।
उसे समझ आया —
प्रेम कभी-कभी इसलिए आता है, ताकि हम अधूरे रहना सीख सकें।
कॉलेज के बाद अनिरुद्ध को नौकरी मिल गई — दिल्ली में।
ऊँची इमारतें, समय की कमी, रिश्तों की औपचारिकता।
सब कुछ था —
सिवाय आत्मा के सुकून के।
वह काम करता, लौटता, सो जाता।
हर दिन एक जैसा।
कभी-कभी उसे लगता —
क्या यही जीवन है?
वह लिखने लगा — पहले डायरी में, फिर कहानियों में।
वह अपनी स्मृतियों को शब्द देता,
क्योंकि वर्तमान उसे कुछ नहीं देता था।
एक दिन पिता के निधन की खबर आई।
अनिरुद्ध वर्षों बाद देवपुर लौटा।
घर वही था —
पर आवाज़ें नहीं थीं।
माँ की आँखें बुझ चुकी थीं।
आँगन सूना था।
वह उसी कमरे में सोया, जहाँ बचपन में डर लगता था।
आज डर नहीं था —
बस एक गहरा खालीपन।
रात को वह छत पर लेटा।
आकाश वही था,
पर उसे देखने वाला बदल चुका था।
उस रात अनिरुद्ध ने समझा —
जीवन आगे बढ़ने का नाम नहीं है।
जीवन समझने का नाम है।
हम जो खोते हैं,
वही हमें बनाता है।
सुबह उसने घर की अलमारी से पुरानी तस्वीरें निकालीं।
हर तस्वीर एक कहानी थी।
उसने तय किया —
वह लिखेगा।
अपने लिए।
उनके लिए, जो अब नहीं हैं।
अनिरुद्ध शहर लौट गया।
पर अब वह अकेला नहीं था।
उसके साथ थीं —
उसकी स्मृतियाँ।
उसने अपनी डायरी में लिखा —
“मेरा जीवन कोई महान गाथा नहीं,
बस स्मृतियों की एक शृंखला है।
पर शायद,
यही मनुष्य होना है।”
सरयू अब भी बह रही थी।
समय भी।
और अनिरुद्ध —
आख़िरकार, स्वयं से मिल चुका था।”
✨
✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
*#पलजोजीवनबनगए*
#स्मृतियाँ
#जीवनकथा
#हिंदीसाहित्य
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*








