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*”पवित्र पापी !…”*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

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*“पवित्र पापी !…”*

गोवा का समुद्र…
जहाँ लहरें कभी थपकियाँ देती हैं, तो कभी जीवन छीन लेती हैं।
जहाँ मछुआरों की नावें हर सुबह उम्मीद के सहारे समुद्र की गोद में उतरती हैं और हर शाम थकान, कहानी और रहस्य लेकर लौटती हैं।

इन्हीं अनगिनत कहानियों में से एक कहानी है—
‘पवित्र पापी’,
जिसमें प्रेम समुद्र की लहरों-सा उतार–चढ़ाव भरा है,
विश्वास समुद्र की अथाह गहराई जितना विशाल है,
और अंत उतना ही मार्मिक है जितनी सांझ ढलते क्षितिज की अंतिम लालिमा।

मडगांव, गोवा का छोटा-सा तटीय गाँव…
साँवली झोपड़ियाँ, संकरी गलियाँ, सुबह-सुबह जाल खींचते पुरुषों की पुकारें,
और शाम को समुद्र के खारेपन में घुली थकान।

यहाँ समुद्र सिर्फ पानी नहीं—
वह भगवान है, रोज़ी-रोटी है, और कई बार मृत्यु भी।

गाँव में एक पुरानी आस्था पीढ़ियों से चली आ रही थी—

“अगर मछुआरे की पत्नी अपने पति के प्रति पवित्र रहे,
तो समुद्र उसके पति को सुरक्षित वापस कर देता है।”

हर लड़की यही सुनते-सुनते बड़ी होती—सागर ईमान देखता है,
मन की पवित्रता और अपवित्रता को तौलता है।

इसी गाँव में रहती थी शकुंतला,
गोअन सूरज जैसी चमकती आँखें,
साँवला मगर बेहद आकर्षक चेहरा,
और भीतर अनगिनत सपने।

वह समुद्र से डरती भी थी,
और उससे एक अनजाना लगाव भी रखती थी—
उसे लगता था कि लहरें इंसानों की तरह बात करती हैं—
कभी कोमल, कभी कठोर।

शकुंतला की बेटी थी परिणीता—
एक कोमल, शांत और सुन्दर लड़की।

और परिणीता का मन बसा था एक युवक में—
फ्रांसिस डी’कोस्टा
गाँव का शांत स्वभाव का एक युवा ईसाई लड़का।

तूफ़ान वाली एक शाम परिणीता डर से तट पर पहुँची।
लहरें विकराल थीं।
वहीं उसने फ्रांसिस डी’कोस्टा को देखा—
डरा हुआ, मगर उसकी मदद के लिए आगे बढ़ता हुआ।

बस वही पल दोनों के मन में कुछ बीज बो गया।
धीरे-धीरे
नज़रें मिलना,
हल्की मुस्कानें,
और फिर ख़ामोशियों में बँधी अनकही बातें—

समुद्र उनकी प्रेम-दूत बन चुका था।

गाँव को सब पता था,
पर गाँव की रूढ़ियाँ इस रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं कर सकती थी

शकुंतला का पति, कालीचरण, एक अनुभवी मछुआरा था।
समुद्र में जाने से पहले वह शकुंतला को हमेशा कहता—

“अगर तू पवित्र रहेगी, तो समुद्र मेरा रखवाला बनेगा।”

इसी विश्वास के चलते शकुंतला अपनी बेटी को बार-बार समझाती—

“समुद्र के नियम मत तोड़।
तेरे एक कदम से पूरे परिवार की किस्मत डूब सकती है।”

लेकिन प्रेम सब समझकर भी दिल में जगा रहता है।
परिणीता चाहकर भी फ्रांसिस डी’कोस्टा को भूल नहीं पा रही थी।

अंततः जब गाँव में चर्चाएँ बढ़ने लगीं,
कालीचरण ने गुस्से में उसका विवाह प्रेमानंद,
एक गरीब मगर नेक मछुआरे से तय कर दिया।

प्रेमानंद ने उसे पूरा मान-सम्मान दिया।
परिणीता ने भी परिवार और परंपरा निभाना चाहा—
पर दिल का कोना अब भी फ्रांसिस डी’कोस्टा के नाम लिखे पन्नों से भरा था।

जिस दिन फ्रांसिस डी’कोस्टा को परिणीता की शादी की खबर मिली,
उसी दिन उसके भीतर की रोशनी बुझ गई।

वह एक साहूकार के यहाँ काम करता था—
पर मन कहीं नहीं लगता।
धीरे-धीरे कर्ज़, अकेलापन और अवसाद उसे घेरते रहे।

गाँव वाले उससे दूरी बनाने लगे—
जैसे वह कोई अभिशाप हो।

उसका घर
एक अँधेरी, उदास खामोशी का कुआँ बन गया।

उधर परिणीता
घर, धर्म, संबंध—सब निभाती रही।
पर दिल में दबी एक टीस हर रात उसे काटती रही।

वह जानती थी—
समुद्र सब देखता है।
समुद्र मन पढ़ता है।
समुद्र न्याय करता है।

फिर भी…
फ्रांसिस डी’कोस्टा की याद एक धुँधली लौ की तरह भीतर जलती रहती।

गाँव वाले फुसफुसाहटें फैलाने लगे।
किसी ने प्रेमानंद के कान भरे,
किसी ने परिणीता को ताने मारे।

प्रेमानंद ने कभी उस पर शक नहीं किया,
पर उसके भीतर भी एक भय जन्म लेने लगा—

“क्या मेरी पत्नी का मन मेरे साथ नहीं है?”

इस भय को समुद्र ने भी महसूस कर लिया था।

एक शाम मौसम बिगड़ गया।
दोस्तों ने चेताया—

“प्रेमानंद, मत जाना! लहरें सही नहीं हैं।”

पर वह बोला—

“मेरी पत्नी पवित्र है।
समुद्र मेरा कुछ नहीं बिगाड़ेगा।”

वह नाव लेकर समुद्र के भीतर चला गया।

उधर घर पर परिणीता बेचैन थी।
हवा में एक अजीब-सी चेतावनी थी।
तूफ़ान की गुर्राहट में उसे फ्रांसिस डी’कोस्टा याद आने लगा—
वह आज भी अकेला था, उसके प्रेम का बोझ ढोता हुआ।

उसका दिल टूटा—
वह समुद्र से बोली—

“यदि कोई पाप है—तो मुझे दंड देना, मेरे पति को नहीं…”

पर समुद्र पुराने पाप नहीं भूलता।

तूफ़ान बढ़ता गया।
लहरें पहाड़ बनकर उठने लगीं।
और किसी को पता भी न चला कि
प्रेमानंद कैसे गहराइयों में समा गया।

सुबह किनारे पर सिर्फ टूटी नाव मिली,
और जाल का बिखरा हुआ हिस्सा।

समुद्र ने अपना फैसला सुना दिया।

उसी रात फ्रांसिस डी’कोस्टा तट से दूर अकेला बैठा रहा—
न रोया, न बोला।
शायद उसका दिल पहले ही मर चुका था।

सुबह वह समुद्र किनारे पड़ा मिला—
निर्जीव, शांत,
और लहरों के नमक से ढका हुआ।

एक प्रेम
जो समाज की बंदिशों में दम तोड़ चुका था।

जब परिणीता को प्रेमानंद का शव मिला,
वह टूट गई।

जब उसे फ्रांसिस डी’कोस्टा की मृत्यु की खबर मिली,
उसकी आत्मा मानो बिखर गई।

वह समुद्र किनारे खड़ी रही—
लहरें उसके पैरों को छूकर लौट जातीं,
जैसे उसकी पीड़ा को पढ़ने का प्रयास करतीं।

उस दिन पूरे गाँव ने समझा—
समुद्र का नियम सिर्फ अंधविश्वास नहीं,
मन की पवित्रता और अपवित्रता का दर्पण है।

परिणीता देर तक क्षितिज को देखती रही।
फिर धीरे-धीरे समुद्र की ओर बढ़ने लगी—

शायद लहरों में उतरने के लिए,
या शायद अपने भीतर की टूट चुकी लहरों में डूब जाने के लिए।

समुद्र शांत था—
पर उसकी लहरें अनगिनत कहानियाँ सुना रही थीं—
प्रेम की,
पाप की,
विश्वास की,
और उन सभी लोगों की
जो ‘पवित्र पापी’ कहलाने वाले विश्वास के नीचे जीते और मरते हैं।

✍️ “सुशील कुमार सुमन”
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*