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*”भूख !..”*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

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*“भूख !..”*

*साल था 1770।*

“गंगा के किनारे बसा पटना, जो कभी व्यापार, संस्कृति और जीवन की चहल-पहल से भरा रहता था, अब एक भयावह सन्नाटे में डूब चुका था।

यह वही वर्ष था जिसे इतिहास ने महाअकाल कहा—जब भूख ने सिर्फ शरीर नहीं, आत्मा तक को चबा लिया।
पटना की गलियों में हवा भी अब जैसे भूखी चलती थी।
घरों के द्वार बंद थे, बाजारों में सन्नाटा था, और मंदिरों के घंटों की आवाज़ भी थकी हुई लगती थी।

इन्हीं गलियों में भटक रहा था एक युवक—
नाम किसी को नहीं पता था।
लोग उसे बस कहते थे—
*“अविनाश”।*

अविनाश लगभग अट्ठाईस वर्ष का था।
चेहरे पर बुद्धि की चमक थी, आँखों में बेचैनी की छाया।
वह कोई साधारण भिखारी नहीं था—उसके भीतर किताबों की दुनिया थी, शब्दों की आग थी, और एक विचित्र आत्मसम्मान भी।

लेकिन पेट…
पेट में तो बस एक खालीपन था, जो हर दिन बढ़ता जा रहा था।

अविनाश सुबह से शाम तक पटना की गलियों में भटकता—
कभी चौक के पास, कभी महेंद्रू घाट, कभी पुराने किले की दीवारों के नीचे।
वह भोजन नहीं माँगता था।
उसके भीतर एक स्वयं का नियम था—

*“मैं दया से नहीं जीऊँगा।”*

लेकिन भूख दया नहीं समझती।
एक दिन उसे सड़क किनारे एक बच्चा मिला, काँपता हुआ।
उसके पास एक फटा हुआ कपड़ा था।
अविनाश ने अपनी आखिरी चादर उसे दे दी।
बच्चा बोला,
“भैया, आप ठंड में मर जाओगे…”
अविनाश मुस्कुरा दिया—
*“मरना तो वैसे भी तय है, बेटा… कम से कम किसी के काम तो आ जाऊँ।”*

चार दिनों की भूख के बाद, एक शाम वह गंगा किनारे बैठा था।
वहीं उसने पहली बार उसे देखा—
मृणालिनी।
एक युवा स्त्री, हल्की-सी मुस्कान, आँखों में करुणा।
उसके हाथ में एक छोटी थैली थी।
वह धीरे से बोली,
“आप कई दिनों से भूखे हैं, है न?”
अविनाश चौंक गया।
उसकी भूख अब चेहरा पढ़ी जा सकती थी।
मृणालिनी ने एक रोटी बढ़ाई।
अविनाश पीछे हट गया।
“नहीं… मैं नहीं ले सकता।”
“क्यों?”
“क्योंकि यह मेरी हार होगी।”
मृणालिनी ने पहली बार उसके चेहरे को ध्यान से देखा—
*“हार भूख से नहीं होती, हार तब होती है जब आदमी भीतर से टूट जाए।”*
उसके शब्द अविनाश के भीतर कहीं उतर गए।
उस शाम दोनों कुछ देर पास बैठे।
उँगलियों का हल्का स्पर्श हुआ—
लेकिन वह स्पर्श प्रेम नहीं था,
वह इंसानियत की आखिरी गर्मी थी।

अविनाश का स्वभाव आत्म-विनाश की ओर झुका हुआ था।
एक दिन भूख ने उसे मजबूर किया।
उसने एक दुकान से छोटा सा चावल का पैकेट उठा लिया।
लेकिन पैकेट हाथ में आते ही उसका शरीर काँप गया।
रात होते-होते वह खुद थाने चला गया।
सिपाही ने पूछा,
“क्यों आया है?”
अविनाश बोला—
“मैंने चोरी की है।”
सिपाही हँस पड़ा—
*“अकाल में चोरी कौन नहीं करता? भाग जा!”*
लेकिन अविनाश ने सिर झुका लिया—
“मैं भूख से मर सकता हूँ, पर अपने भीतर के नियम नहीं तोड़ सकता।”
उसे एक कोठरी में डाल दिया गया।
वहाँ पहली बार उसे गर्मी मिली, छत मिली।
पर सुबह…
जब गरीबों के लिए मुफ्त नाश्ता आया,
अविनाश ने थाली को छुआ तक नहीं।
सिपाही बोला,
“खा ले पागल!”
अविनाश फुसफुसाया—
*“मैं भूखा हूँ… लेकिन इतना भी नहीं कि अपनी सच्चाई स्वीकार कर लूँ।”*

एक दिन, भूख से कांपते हाथों से उसने एक लेख लिखा—
“पटना की भूख और ईश्वर का मौन।”
उस लेख को उसने एक स्थानीय समाचार-पत्र वाले को दे दिया।
तीन दिन बाद…
पहली बार उसे कुछ पैसे मिले।
उस रात उसने भोजन खरीदा।
लेकिन जैसे ही पहला कौर मुँह में रखा—
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
“क्या यही जीवन है?
कागज़ बेचो… और एक दिन और जी लो?”
लेखन अब आसान नहीं रहा।
भूख ने उसकी कल्पना को भी खोखला कर दिया था।

अविनाश समाज से नाराज़ नहीं था।
वह किसी व्यक्ति को दोष नहीं देता।
वह बस ऊपर देखता—
और कहता—
“हे ईश्वर…
यह कैसा विधान है?
भूख तुम्हारी बनाई व्यवस्था है?”
वह प्रण करता—
*“मैं इस व्यवस्था के आगे नहीं झुकूँगा।*
मैं जीवन में एक परदेशी रहूँगा…”
उसकी घबराहट उसे हर समय घेरती।
छोटी-छोटी बातें भी उसे विचलित कर देतीं—
एक गिरती पत्ती,
एक सूखी हड्डी,
एक भूखा कुत्ता…
सब उसे अपना ही प्रतिबिंब लगते।

अकाल अब चरम पर था।
पटना एक जीवित शहर नहीं, एक कब्र बन चुका था।
अविनाश का शरीर टूट चुका था।
उसकी आँखें धँस गई थीं।
एक सुबह उसने गंगा घाट पर एक जहाज देखा—
जो शहर छोड़कर बंगाल की ओर जा रहा था।
उसने कप्तान से कहा—
“मुझे भी रख लो… मैं मजदूरी करूँगा।”
कप्तान ने उसे ऊपर से नीचे देखा।
*“तू तो खुद भूख की हड्डी है…”*
अविनाश मुस्कुरा दिया—
*“भूख के सिवा मेरे पास कुछ नहीं, साहब…”*
पर शायद समंदर में मैं फिर से इंसान बन सकूँ।”
और फिर…
जब जहाज ने पटना को पीछे छोड़ा,
अविनाश ने आखिरी बार शहर की ओर देखा—
जहाँ भूख ने सब कुछ छीन लिया था,
पर उसके भीतर का अजनबीपन अभी भी जीवित था।
वह चला गया…
जीवन का परदेशी बनकर।

*“भूख केवल पेट की नहीं होती,*
*भूख आत्मसम्मान, पहचान और अस्तित्व की भी होती है।”*

1770 का महाअकाल केवल इतिहास नहीं,
मनुष्य की असहायता की सबसे गहरी कविता है।”

*✍️ सुशील कुमार सुमन*
अध्यक्ष, IOA
सेल, आईएसपी, बर्नपुर
*#सुशीलकुमारसुमन*
*#युवा*