शब्दभूमि प्रकाशन द्वारा आयोजित दलित विमर्श पर राष्ट्रीय संगोष्ठी
कोलकाता, 14 अप्रैल 2026 । डॉ. भीमराव अंबेडकर की 135वीं जयंती के उपलक्ष्य में शब्दभूमि प्रकाशन द्वारा एक राष्ट्रीय ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से शिक्षाविद, शोधार्थी और साहित्यकार जुड़े। कार्यक्रम का संचालन शालिनी सिंह द्वारा किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत बाबा साहेब के जीवन और योगदान पर प्रकाश डालते हुए हुई, जिसमें उनके संविधान निर्माण, सामाजिक न्याय, समानता और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए किए गए संघर्ष को याद किया गया।
दिलीप कुमार (आजमगढ़) ने ‘दलित महिलाओं की अदृश्य पीड़ा’ विषय पर बोलते हुए जाति और जेंडर के अंतर्संबंध को रेखांकित किया और बताया कि दलित महिलाओं को तिहरे शोषण का सामना करना पड़ता है। राजीव कुमार (अलीगढ़) ने ‘दलित आंदोलन का बदलता स्वरूप’ पर चर्चा करते हुए बताया कि आंदोलन अब सड़कों से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंच चुका है। डॉ. बी. मल्लिका (तमिलनाडु) ने डॉ. अंबेडकर और संत रामलिंग स्वामी के विचारों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया। आशीष अंबर (दरभंगा) ने न्यायपालिका और दलित अधिकारों के संदर्भ में संवैधानिक प्रावधानों की जमीनी स्थिति पर गंभीर प्रश्न उठाए। डॉ. शिखा (गुरुग्राम) ने ‘आज का दलित भारत’ विषय पर शिक्षा, रोजगार और सामाजिक समानता की चुनौतियों को सामने रखा। संजय शाह (पश्चिम बंगाल) ने हिंदी और बांग्ला साहित्य में दलित विमर्श की उपस्थिति को उदाहरणों सहित समझाया। संगोष्ठी में प्रतिभागिता कर रहे अन्य वक्ताओं राहुल भिवा हातागले (महाराष्ट्र), अमन कुमार (झारखण्ड), नाहिदा गुलामदस्तगीर शेख (मुंबई), सेठी आशा दीनबंधु (गुजरात), सुलताना मुशताक अहमद खान (अहमदनगर), दुर्गावती कुमारी (पटना) इत्यादि ने अपना सुचिंतित वक्तव्य रखा। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि संवैधानिक अधिकारों के बावजूद जमीनी स्तर पर अभी भी भेदभाव, सामाजिक असमानता और हिंसा जैसी समस्याएँ मौजूद हैं। विशेष रूप से दलित महिलाओं, युवाओं और ग्रामीण समाज की चुनौतियों पर गहन चिंता व्यक्त की गई।
अंत में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए गायत्री उपाध्याय ने सभी वक्ताओं, प्रतिभागियों और आयोजकों का आभार व्यक्त किया तथा ऐसे विमर्शों को सामाजिक परिवर्तन के लिए आवश्यक बताया। कार्यक्रम का संयोजन विनोद यादव ने किया।










