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*“साउथ अफ्रीका वाली तक़दीर”*

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ASANSOL DASTAK ONLINE DESK

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*“साउथ अफ्रीका वाली तक़दीर”*

“दिल्ली के मुखर्जी नगर की भीड़ में हर दिन हजारों सपने चलते-फिरते दिखाई देते हैं। किसी की आँखों में आईएएस बनने का सपना होता है, किसी की आँखों में आईपीएस की चमक। यहाँ चाय की दुकानों पर बहसें होती हैं—संविधान, अर्थशास्त्र, इतिहास और समकालीन राजनीति पर। यहाँ किराए के छोटे-छोटे कमरों में बड़े-बड़े सपने पलते हैं।

उसी भीड़ में एक चेहरा ऐसा भी था, जिसे सब “सुमन भैया” कहकर बुलाते थे।
सुबह पाँच बजे जब बाकी शहर अभी नींद में डूबा होता, सुमन भैया की टेबल लैंप जल जाती। मोटी-मोटी किताबें, नोट्स के ढेर, दीवारों पर लगे नक्शे और संविधान की मोटी प्रति—उनका कमरा किसी छोटे पुस्तकालय जैसा लगता था।
सुमन भैया की उम्र 48 साल हो चुकी थी।
लेकिन उनके सपने की उम्र अभी भी 25 साल के किसी युवा जैसी थी।

पिछले 28 वर्षों से उनकी जिंदगी एक ही लक्ष्य के इर्द-गिर्द घूम रही थी—सिविल सर्विसेज।
लोग हैरान रह जाते थे जब उनका रिकॉर्ड सुनते थे।
उन्होंने UPSC और विभिन्न राज्यों की PCS परीक्षाओं को मिलाकर 69 बार प्रीलिम्स पास किया था।
39 बार मेंस परीक्षा क्लियर की थी।
और 19 बार इंटरव्यू तक पहुंचे थे।
लेकिन हर बार, आखिरी सीढ़ी पर जाकर किस्मत उनका साथ छोड़ देती थी।

सुमन भैया का जन्म मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले के एक छोटे से गांव “खजुरी” में हुआ था।
उनके पिता रामनाथ मिश्रा गाँव के स्कूल में शिक्षक थे।
घर में पैसे ज्यादा नहीं थे, लेकिन किताबों की कमी कभी नहीं रही।
रामनाथ मिश्रा हमेशा अपने बेटे से कहते थे—
“बेटा, पढ़ाई सिर्फ डिग्री के लिए मत करना…
ज्ञान के लिए करना।”
गाँव का छोटा स्कूल, मिट्टी की सड़कें, और टिमटिमाते लालटेन की रोशनी में पढ़ाई—इन्हीं सबके बीच सुमन बड़े हुए।
जब उन्होंने पहली बार अखबार में UPSC के बारे में पढ़ा, तो उनके मन में एक सपना जन्मा—
“मैं भी एक दिन बड़ा अफसर बनूँगा।”

दिल्ली आकर उन्होंने मुखर्जी नगर में एक छोटा सा कमरा लिया।
कमरा इतना छोटा था कि एक तरफ बिस्तर था, दूसरी तरफ टेबल।
लेकिन वही कमरा उनके सपनों का महल था।
उनके साथ पढ़ने वाले कई दोस्त धीरे-धीरे सफल होने लगे।
उनका एक दोस्त था—विक्रम सिंह राठौर।
विक्रम और सुमन दोनों एक ही कमरे में रहते थे।
दोनों दिन-रात पढ़ते थे।
लेकिन समय के साथ रास्ते बदल गए।
विक्रम का चयन हो गया।

उसकी कहानी पर बाद में एक फिल्म भी बनी—“द लास्ट अटेम्प्ट।”
पूरे देश ने तालियाँ बजाईं।
लेकिन सुमन उसी कमरे में रह गए।
किताबों के बीच।
खामोश।
संघर्ष करते हुए।
जिंदगी के सबसे कठिन दिन
जिंदगी ने सुमन को सिर्फ इंतजार ही नहीं दिया।
गहरे जख्म भी दिए।
सबसे पहले उनकी छोटी बहन किरण की बीमारी से मौत हो गई।
घर में शोक की लहर दौड़ गई।
कुछ साल बाद दूसरी बहन सविता भी एक दुर्घटना में चली गई।
सुमन का मन टूटने लगा।

लेकिन सबसे बड़ा झटका तब लगा जब उनके पिता को कैंसर हो गया।
इलाज के लिए उन्हें मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल ले जाया गया।
कई महीने इलाज चला।
सुमन ने अपनी सारी बचत लगा दी।
लेकिन एक दिन डॉक्टरों ने कहा—
“हम पूरी कोशिश कर चुके हैं…”
पिता नहीं रहे।
जब सुमन अपने पिता की पार्थिव देह लेकर ट्रेन से गाँव लौट रहे थे, उस रात उन्होंने महसूस किया कि जैसे जिंदगी रुक गई है।
लेकिन पिता की एक बात उनके कानों में गूंजती रही—
“पढ़ने की कभी एक्टिंग मत करना…”
यही वाक्य उन्हें फिर से खड़ा कर गया।

समय बीतता गया।
रिश्तेदार अक्सर पूछते—
“अब शादी कब करोगे?”
सुमन मुस्कुराकर कहते—
“पहले मंजिल, फिर घर बसाऊंगा।”
धीरे-धीरे रिश्तेदारों ने पूछना भी बंद कर दिया।
लेकिन मुखर्जी नगर के छात्र उन्हें प्रेरणा मानने लगे।
कोई उनसे नोट्स लेने आता।
कोई इंटरव्यू की तैयारी पूछता।
कोई बस यह देखने आता कि इतना संघर्ष करने वाला आदमी आखिर दिखता कैसा है।

एक दिन अचानक सुमन ने सोचा—
“शायद मेरी मंजिल कहीं और है।”
उन्होंने निर्णय लिया कि अब वे सिर्फ UPSC पर निर्भर नहीं रहेंगे।
उन्होंने JNU में Political Science में MA के लिए आवेदन किया।
उनका चयन हो गया।
JNU का परिसर उनके लिए एक नई दुनिया था।
यहाँ बहसें थीं।
विचार थे।
राजनीति थी।
और सबसे बड़ी चीज—आज़ादी से सोचने की जगह।
MA के बाद उन्होंने Political Science में PhD भी की।
उनका शोध विषय था—
“भारत में शिक्षा और सामाजिक समानता।”

इसी दौरान दिल्ली की राजनीति में बड़ा बदलाव आ रहा था।
एक राष्ट्रीय पार्टी नई सोच के साथ युवाओं को आगे ला रही थी।
पार्टी के कुछ नेताओं ने सुमन के लेख पढ़े थे।
उन्होंने उन्हें बुलाया।
“आप राजनीति में क्यों नहीं आते?”
सुमन ने हँसते हुए कहा—
“मैं तो बस पढ़ने वाला आदमी हूँ।”
लेकिन नेताओं ने कहा—
“देश को पढ़ने वाले नेताओं की जरूरत है।”

2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी ने सुमन को मेहरौली विधानसभा सीट से टिकट दिया।
कई लोगों ने मजाक उड़ाया—
“जो आदमी UPSC नहीं निकाल पाया, वो चुनाव क्या जीतेगा?”
लेकिन जनता ने कुछ और सोचा।
सुमन घर-घर गए।
उन्होंने बड़े वादे नहीं किए।
बस इतना कहा—
“अगर मौका मिला, तो शिक्षा बदल दूंगा।”
चुनाव का परिणाम आया।
सुमन भारी मतों से जीत गए।
वे दिल्ली के विधायक बन गए।

कुछ ही महीनों बाद उन्हें दिल्ली सरकार का शिक्षा मंत्री बनाया गया।
यहीं से असली कहानी शुरू हुई।
उन्होंने नई शिक्षा नीति बनाई।
सरकारी स्कूलों में—
• स्मार्ट क्लास
• डिजिटल लैब
• स्किल एजुकेशन
• मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग
सब शुरू किया।
सरकारी स्कूलों का चेहरा बदल गया।
देश भर में उनकी चर्चा होने लगी।

कुछ साल बाद लोकसभा चुनाव आया।
पार्टी ने उनके काम से खुश होकर उन्हें साउथ दिल्ली लोकसभा सीट से टिकट दिया।
इस बार मुकाबला और भी कठिन था।
लेकिन जनता ने फिर भरोसा किया।
सुमन जीत गए।
वे संसद पहुँच गए।
देश के शिक्षा मंत्री
कुछ वर्षों बाद केंद्र में उनकी पार्टी की सरकार बनी।
प्रधानमंत्री ने उन्हें बुलाया।
“सुमन जी, आपको देश का केंद्रीय शिक्षा मंत्री बनना होगा।”
यह सुनकर सुमन कुछ देर चुप रहे।
उन्हें अपने मुखर्जी नगर का छोटा कमरा याद आ गया।
उन्होंने कहा—
“सर, मैं कोशिश करूंगा कि कोई भी छात्र अपनी जिंदगी के 20-25 साल सिर्फ एक परीक्षा की तैयारी में न गंवाए।”

उन्होंने UPSC प्रणाली में कई सुधार किए।
• परीक्षा प्रक्रिया को सरल बनाया
• तैयारी की अवधि कम करने के उपाय किए
• स्किल आधारित शिक्षा को बढ़ावा दिया
देश के स्कूल, कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज—सबमें नए सुधार हुए।
भारत की शिक्षा प्रणाली बदलने लगी।

लोग मजाक में कहते थे—
“सुमन की किस्मत साउथ अफ्रीका वाली है।”
क्योंकि जैसे क्रिकेट में दक्षिण अफ्रीका अक्सर अच्छे मौके पर हार जाता है, वैसे ही सुमन हर बार आखिरी चरण में हार जाते थे।
लेकिन उन्होंने हार को अपनी पहचान नहीं बनने दिया।
उन्होंने अपनी तकदीर बदल दी।
और साथ ही देश की तकदीर भी।

आज एक खास दिन है।
आज UPSC का फाइनल रिजल्ट आया है।
सुमन अपने दफ्तर में बैठे है।
रिजल्ट देखकर उनकी आँखें नम हो गईं।
क्योंकि इस बार कई ऐसे छात्रों का चयन हुआ हैं, जो संघर्ष से आए हैं।
उन्होंने सोचा—
“शायद अब किसी को मेरी तरह 25 साल इंतजार नहीं करना पड़ेगा।”

आज एक और बड़ी खबर है।
भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच T-20 वर्ल्ड कप 2026 का फाइनल है।

नरेंद्र मोदी क्रिकेट स्टेडियम, मोटेरा, अहमदाबाद (गुजरात):
भारत 2023 का ODI वर्ल्ड कप हार चुका था।
सुपर-8 में भी एक मैच बुरी तरह हार गया था।
दूसरी तरफ न्यूजीलैंड है —
जो अक्सर बड़े मौकों पर हार जाता है।
मतलब—
दोनों टीमों की तकदीर थोड़ी “साउथ अफ्रीका वाली” ही है, आज।
सुमन मुस्कुराए।
आज वे मैच देखने जा रहे है।
क्योंकि कभी-कभी जिंदगी हमें यही सिखाती है—
तकदीर चाहे जैसी भी हो,
अगर इंसान हार नहीं मानता,
तो आखिर में जीत उसी की होती है।
और ‘सुमन’ की कहानी भी यही कहती है—
कभी-कभी साउथ अफ्रीका वाली तकदीर भी
भारत की तकदीर बदल देती है।”

✍️ सुशील कुमार सुमन
अध्यक्ष, आईओ
सेल आईएसपी, बर्नपुर
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